Saturday, 20 June 2026
कोरोना की पुनर्दस्तक
Tuesday, 19 May 2026
हमारा भारत
हमारा भारत
(विधाता छंद)
सँवारा है जिसे हमने, निराला देश है मेरा।
निराई कर गुड़ाई कर, सजाया बाग का घेरा।
पतंगे-कीट मारेंगे, अगर आयें हमारे घर।
जमाने अब नहीं देंगे, किसी को हम यहाँ डेरा।।
समझ लें आप भी, सब को,समझ में बात ये आये।
न कोई दे हमें धमकी, न भोली बात फुसलाये।
जिसे भारत सुहाता हो, यहाँ के गीत वो गाये।
नहीं तो बाँध कर बिस्तर, जहाँ भाये वहीं जाये।।
4/10/24 अजय 'अजेय'।
Saturday, 3 May 2025
दीपावली पर्व
दीपावली पर्व
१.(किशोर छंद)
घर के भीतर खूब सफाई, करते हैं।
मोबाइल पर ज्ञान ढेर हम, भरते हैं।
हुई साँझ भरपूर पटाखे, फोड़ेंगे।
पॉलूशन के सारे मानक, तोड़ेंगे।।
२.(रास छंद)
लड़ी सितारे चीनी वाले, झूल गये।
माटी वाला दीपक लाना, भूल गये।
जले नहीं दीपक घर के कुम्भारन के।
चकाचौंध की भेंट मंत्र चढ़, मूल गये।।
31/10/ 24 ~अजय 'अजेय'।
जान मेरी
जान मेरी
(गीतिका छंद)
वो कभी जो गैर से थे, जान मेरी हो गये।
छेड़ कर वे तार मन के, अब कहाँ हैं खो गये।
खोजता फिरता ख़यालों में, सदा रहता उन्हें।
जान मुट्ठी में हमारी, ले दबा कर जो गये।।
24/10/24 ~अजय 'अजेय'।
विसर्जन
(चित्र लेखन)
(दोहा छंद)
विसर्जन
लाये थे घर प्रेम से, फेंका नेह बिसार।
भगवन कैसे आँय फिर, हो जब यह आचार।।
पूजा हो जिसकी प्रथम, सजे प्रथम घर द्वार।
उनकी यह अवहेलना, कैसे है स्वीकार।
भेड़चाल कैसी चली, करिये जरा विचार।
जिनको घर लायें सजा, फेंकें नदी किनार।।
20/10/24 ~अजय 'अजेय'।
सर्दी में स्नान
(आल्हा छंद)
सर्दी में स्नान
कोहरे ने कोहराम मचाया,
नजर न आये गाड़ी-कार।
भई नदारद धूप नगर में,
सर्दी करती चोटिल वार।।
सूख न पाते कपड़े गीले,
भरे पड़े सब रस्सी तार।
दस्तक हुई द्वार पर भोरे,
शायद आया हो अखबार।।
तजें रजाई कंबल कैसे,
जुटे न हिम्मत इतनी यार।
इक-दूजे का चेहरा ताकें,
खोले कौन बाहरी द्वार।।
जैसे तैसे हाथ धो रहे,
मुख को हल्का लिए पखार।
राह देखते सूरज की अब,
आय गया खिचड़ी त्यौहार।।
हिम्मत कर के पहुँच भी गये,
तन को कैसे करें उघार।
डुबकी कैसे लगे गंग में,
सोच रहा मन बारम्बार।।
एक हाथ से नाक दबाई,
हर हर गंगे लई पुकार।
आलस गायब, सर्दी गायब,
हो जब गंगा की जयकार।।
14/1/25 ~अजय 'अजेेेय'।
छठि माई
छठि माई
(दिक्पाल छंद)
मिलि करत चची ताई, पावन नहाइ खाई।
कोसी भराय माई, रहना सदा सहाई।।
फल मूल अरु मिठाई, भरि घाट भोर जाई।
सूरज दिये दिखाई, तब अर्घ फिर बिदाई।।
आशीष से नवाजो, बिगड़ी हमार साजो।
कल थी सहाय तुमही, छठि माँ सहाय आजो।।
पहिला अरघ तिहारा, अब होय रही साँझो।
उपवास हुआ निर्जल, घर आनि माँ बिराजो।
31/10/22 ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 13 March 2025
त्यौहारी भाईचारा
त्यौहारी भाईचारा
(निश्चल छंद)
भाईचारे का भइया जी, गाढ़ा रंग।
दिखलाओ ऐसे दुनिया रह, जाए दंग।।
मजहबियों अब मत छेड़ो तुम, विषधर राग।
आओ मिलजुल कर सब खेलें, गायें फाग।।
पाक अगर ईदी सेवई व, है इफ्तार।
तो फिर होली के रंगों से, कैसा खार।।
बने नहीं अब पर्व हमारे, जंगी गंज।
इक दूजे का मान रखें हम, ना हो रंज।।
13/3/25 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 5 March 2025
मेरे जानम
मेरे जानम
(विष्णुपद छंद)
बड़े सुरीले बड़े रसीले, हैं मेरे जानम।
उनके गाने से सजती हैं, गीतों की सरगम।।
उनको सुनने को कानों की, आस तरसती है।
होंठों से उनके हर पल रस धार बरसती है।।
3/3/25 ~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 4 March 2025
न्यू ईयर
*न्यू ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'। ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'।
नोट बनाम वोट
(प्रदीप छंद)
*नोट बनाम वोट*
ऐरे गैरे नत्थू खैरे, सारे लगे दिखाने नोट।
आसमान के तारे देंगे, दे दो बस तुम हमको वोट।।
समझ बूझ कर चलना भइया, मिलती कदम कदम पर चोट।
इनके झाँसे में मत आना, इनकी नीयत में है खोट।।
17/1/25 ~अजय 'अजेय'।
Friday, 28 February 2025
काठ की हाँडी (दिल्ली चुनाव)
*काठ की हाँडी*
(पीयूष निर्झर छंद)
सो गया सपना बिचारे केजरी का।
चढ़ गया ताला हरीसन टेजरी का।
कब तलक ये काठ की हाँड़ी चलाते।
कब तलक ये झूठ की दालें गलाते।।
हैं नहीं पकतीं खिचड़ियाँ बाँस लटकी।
टाँग कर के बीरबल सी दाल मटकी।
खोखले वादे कहाँ तक काम आते।
तीर कब तक गैर के काँधे चलाते।।
10/2/25 ~अजय 'अजेय।
Saturday, 15 February 2025
खेल-तमाशा
चित्र लेखन
*खेल-तमाशा*
(महाश्रृंगार छंद)
हिम्मती बाला करती खेल,
सामने इसके लड़के फेल,
समन्वय का है अद्भुत मेल,
संतुलन की यह रस्सी रेल।।
व्यक्ति खास हो या हो आम,
मेहनत से ही बनता काम,
बिन मेहनत के मिले न धाम,
मेहनत से जीवन आराम।।
खोले हाथ जो माँगें भीख,
बाला उन्हें सिखाती सीख,
मेहनत की ही राह सटीक,
मेहनत की तुम धारो लीक।।
13/2/25 ~अजय 'अजेय'।
Friday, 8 November 2024
गलत-सही
गलत-सही
(गगनांगना छंद)
गलत बात तो गलत बात है, हम भी मानते।
लेकिन सच्चाई तब है जब, सच्ची छानते।।
जात पात से ऊपर उठकर, ताने तानते।
मेरा-तेरा भाव छोड़कर, सबको सानते।।
तब हम कहते सही बात है, इनकी मानिये।
ये नेता जी सही कह रहे, यारों जानिये।।
लेकिन ऐसी बात नहीं जब, उनकी बात में।
ऐसों पर तो तीर नुकीले, भइया तानिये।।
6/11/24 ~अजय 'अजेय'।
Sunday, 13 October 2024
चक्रव्यूह : घेरा
(चित्र लेखन)
चक्रव्यूह का घेरा
राग अलापें गर्दभ सारे, ये सिंहासन मेरा है।
ये दे दूँगा वो दे दूँगा, नित नव चित्र उकेरा है।।
फेर रहे जो माला समझो, ये वोटों का फेरा है।
झाँसे में मत आना यारों, चक्रव्यूह का घेरा है।।
24/5/24 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 25 September 2024
नेता जी : विदेशी बोल
नेता जी : विदेशी बोल
(विधाता छंद)
कभी कन्याकुमारी तो, कभी
आसाम जाते हैं।
दुकानें भी मुहब्बत की, गली में वो लगाते हैं।
पहुँचते ही विदेशों में, मगर घर को भुलाते हैं।
भरे मुख से बुराई देश की गा कर सुनाते हैं।।
न जाने कौन सी नजरों से, नेता वो कहाते हैं।
पड़ोसी के यहाँ जाकर, खयाली जो पकाते हैं।
नहीं थकते झुकाने में, घरेलू देश की अस्मत।
घरों से दूर जाकर, झूठ के आँसू बहाते हैं।।
25/9/24 ~अजय 'अजेय'।
Saturday, 31 August 2024
मतदान
मतदान आ गया
(शैल छंद)
आ गया।
आज है, छा गया।
है नशा, है नहीं, जो नया।
वोट की बात है नोट की है दया।
राम हो नाम हो काम के जोर पर हो जया।
15/4/24 ~अजय 'अजेय'।
Sunday, 31 March 2024
करगिल विजय दिवस
करगिल विजय दिवस पर...
(कुण्डलिया छंद)
आ धमके नापाक अरि, करि करगिल में घात।
उन्निस सौ निन्यानबे, बात हुई यह ज्ञात।।
बात हुई यह ज्ञात, इरादे नेक न उनके।
छेंके आ कर बँकर, छल से ताने बुनके।।
भागे पूँछ दबाय, गिरे जब गोले जमके।
धर दोज़ख की राह, गये जो थे आ धमके।।
26/7/23 ~अजय 'अजेय'।
चंद्रयान-3
सफल भारतीय अभियान : तीसरा चंद्रयान
(चंद्रयान-3)
आज देश ने लिखी चाँद पर,
स्वर्णिम एक इबारत है।
"मामा" के कंधे पर चढ़ कर,
खेल रहा नव-भारत है।।
"सोमनाथ" के निर्देशन में,
भारत ने इतिहास रचा।
चंद्रयान-3 के लैंडर,
"विक्रम" ने पद चाँद रखा।।
हर्ष लहर में झूम उठा है,
भारत का कोना कोना।
नगर-नगर में धूम मची है,
बँटे मिठाई का दोना।।
सफल सिद्ध वैज्ञानिक अपने,
चाँद तिरंगा गाड़ दिया।
विश्व-पटल पर स्वाभिमान संग,
भारत को जय-बाण दिया।।
निकल चुका रोवर "प्रज्ञानी",
अपना खेल दिखाने को।
विचरेगा चंदा-तल पर वह,
जानकारियाँ लाने को।।
चौदह दिन के पखवाड़े भर,
घूमेगा यह विज्ञानी।
संभव कि वह तलाश ले,
प्राण-वायु, तल पर पानी।।
अंत नहीं, आरंभ हुआ यह,
दबे खजाने पाने का।
यह सुरंग का दरवाजा है,
बहुत बचा है आने का।।
23/8/23 ~अजय 'अजेय'।
मामा के घर भान्जा
मामा के घर भान्जा
(मनोरम छंद)
साँझ को जब चाँद आया,
चाँदनी पर तिलमिलाया।
लाल पीला कह रहा वह,
बोल किसको घर बुलाया।।
चाँदनी ने देख माया,
नेह से उसको बताया।
देख लो खुद ही बुलाकर,
भान्जा ननिहाल आया।।
*ज्ञान 'अवनी' ने मँगाया,*
यान पर है बैठ आया।
नाम 'विक्रम' कह रहा है,
*"भारती" का पूत पाया।।*
*चाँद मामा मुस्कुराया,*
चाँदनी को उर लगाया।
भान्जे को काँध पर ले,
घूम सारा घर दिखाया।।
1/9/23 ~अजय 'अजेय'।
कोहरे का कोहराम
कोहरे का कोहराम
सर्दी ने सिरदर्दी दे दी,
कोहरे ने कोहराम,
घर से न तुम बाहर निकलो,
वर्ना धरे जुखाम।
बचना घोर कहर से तो,
फिर सुनलो यह पैगाम,
ओढ़ि चदरिया घर में बैठो,
बोलो जय श्रीराम....
बोलो राम राम राम,
बोलो राम राम राम,
बोलो राम राम राम,
जै सियाराम जै जै सियाराम।।
13/1/24 ~अजय 'अजेय'।
सौ पर भारी एक
सौ पर भारी एक
(कुण्डलिया छंद)
कोशिश में सारे लगे, रोक न पायें एक।
सौ पर भारी एक है, लिये इरादे नेक।।
लिये इरादे नेक, बढ़े वह गज के जैसे।
भौंकत चलते श्वान, दूर से डरते वैसे।।
कहें अजय कविराय, रोज पीते हैं वो विष।
पाना मुश्किल पार, करें कितनी भी कोशिश।।
~अजय 'अजेय'।
हे मतदाता
हे मतदाता
(रास छंद)
एक तार से गुँथे हुये तुम रहो जरा।
संगी-साथी कथा जीत की कहो जरा।।
जीव भयानक इस दरिया के वासी हैं।
धार सरित की नाप तोल कर बहो जरा।।
राजनीति के गलियारे ये जंगल हैं।
इस में पग पग पर आयोजित दंगल हैं।।
नीति-हीन दल और अनगिनत निर्दल हैं।
सोम गुरू रवि आज, वही कल मंगल हैं।।
नींव बिना ही चलें उठाने महल यहाँ।
इनकी माटी उनकी टाटी जुटे कहाँ।।
साड़ी टोपी सूट-बूट सब वेष अलग।
बिखरीं गठबंधन की ईँटें जहाँ-तहाँ।।
15/3/24 ~अजय 'अजेय'।
Saturday, 30 March 2024
पलक बिछाये
Wednesday, 27 December 2023
माँ की मिहनत
(विधाता छंद)
Saturday, 25 November 2023
पटाखे बजाना
Wednesday, 6 September 2023
ईश्वर
प्रेयसी
Tuesday, 29 August 2023
किस्मत के मारे
Thursday, 24 August 2023
चंद्रयान-3 : सफल अभियान
Thursday, 17 August 2023
चाटुकार
बुरे कर्म का नतीजा
चौपाई छंद - सत्ता का उपयोग
Wednesday, 16 August 2023
चौपाई छंद
मतलबपुर
पारस्परिक सहयोग
कर्मफल
बाहुबली
सड़क के नियम - देश बनाम विदेश
बाबा - पोता
कारगिल विजय दिवस (2023) पर
आम का बागीचा
बिरहन
सहज बालपन
चौपाई छंद विधान
सहृदय पुलिस वाले
बुढ़ापा
Saturday, 12 August 2023
रोजगार
छंद विधान : निश्चल छंद
मेरे (फौजी) सनम
कारगिल दिवस : 2022
सबका साथ : सबका विकास
सूखा - ग्रेटर नोएडा
Thursday, 14 July 2022
शेर पर बवाल
पानी पानी
Thursday, 5 May 2022
बेटी के विवाहोपरांत
Wednesday, 23 March 2022
युद्ध व्यवसायी
गिरगिटी सपने
होलिका दहन
Monday, 21 March 2022
ग्रामीण संस्कार
Monday, 10 January 2022
ओमीक्राॅन लहर
Sunday, 26 December 2021
किसान और आंदोलन
Thursday, 23 December 2021
बदले भाव-आये चुनाव
कोरोना (ओमीक्राॅन) की दस्तक
Tuesday, 16 November 2021
रैलियाँ व महामारी
Thursday, 11 November 2021
छठ पूजा पर
Tuesday, 5 October 2021
भटकन
तुमने जो होंठों से लगाए थे
Tuesday, 31 August 2021
रात ! तू भी न सहारा देगी
Wednesday, 4 August 2021
नाटकबाज
Monday, 19 July 2021
गाँव में आपसी सहभागिता
Wednesday, 23 June 2021
लापरवाही
Monday, 21 June 2021
*पलायन*
पूँछ कुत्ते की
योग
Monday, 3 May 2021
सिपाही
होली दोहावली
महाशिवरात्रि के शिव
मौसम परिवर्तन
Wednesday, 24 March 2021
मुंबई के रखवाले
Sunday, 17 January 2021
सौगात-ए-मरक़ज
*_रूपमाला छंद_*
सौगात-ए-मरक़ज़
देश-हित को ताक पर रख, कर रहे हैं घात।
देश-हित की नीतियों पर, कर रहे आघात।।
बोलिए जी हम उतारें, आरती ले दीप ?
या कि उनकी फितरतों को, दें करारी मात।।
करी विनती और देखा, जोड़ कर के हाथ।
समझते थे हम कि देंगे, वे हमारा साथ।।
तोड़ कर विश्वास भागे, मजहबी हज़रात।
बाँटते वे फिर रहे हैं, मौत की सौगात।।
२१/४/२०। ~अजय 'अजेय'।
Monday, 30 March 2020
लाॅकडाउन का असर
(भोजपूरी रचना)
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम घरे पोचा लगा लs।
पोचा लगा लs, बाबु पोचा लगा लs ...
कोरोना से सबके बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कहेलें मोदीजी तनी राखs हो सफ़ाई,
एकइस दिन ले कौनों बाई नाहीं आई।
पानी में डिटोलवा मिला लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
बहियाँ पिराता, हमरी गोड़े आइल मोचा,
लाॅकडाउन कइ दिहलस बड़हन लोचा।
घरे तनि हाथ तूँ बटा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
करफू लगल बंद भईली बजरिया,
मिली फल, रासन, दवा, दूध, तरकरिया।
फ़ोनवे से सउदा मँगा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
केहू से ना मिलs, मति हथवा मिलावs,
हमहूँ से दूरे रहs, नियरे न आव आवs।
साबुन से हाथ गजुआ लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
घरहीं में रहs, जनि निकलs तू बहरा।
गली-गली बइठल बा पुलिसे के पहरा।।
हाथ-गोड़ आपन तूँ बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कोरोना से जान तूँ बचा लs...
बलम घरे पोचा लगा लs...
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम जी पोचा लगा लs।
३०/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
Wednesday, 25 March 2020
कोरोना का क्रोध
झेल रहा जो विश्व है, कोरोना का दंश।
वह कोरोना और ना, है 'करुणा' का अंश।।
मूक जंतुओं को रहे, मानव-दानव भक्ष।
कोरोना बन आ गये, करने 'करुणा' रक्ष।।
चूहे चिमगादड़ रहे, बनते जिनके भोज।
'करुणा' उनको खा गए , पकरि पकरि के रोज।।
रेत रहे थे मुर्ग़ियाँ, नोच रहे थे पाँख।
छट-पट करती आत्मा, रोती भरि-भरि आँख।।
बंद हुये धंधे सभी, जहाँ पके था माँस।
मुख से जब रोटी छिनी, तभी भया अहसास।।
मिल-जुल सब जंतू गये, संत करोना धाम ।
तप करने सब लग गये, त्राहि त्राहि करि माम्।।
तिलचट्टे दादुर झिंगुर, मूषक मछरी श्वान।
नतमस्तक होकर खड़े, धारित मन भगवान।।
'करुणा' तब परगट भये, हर्षित होकर नाथ।
वर मुद्रा में उठ गये, माथ जंतु धरि हाथ।।
बोले माँगो वत्स वर, कहहु पीर समुझाय।
हर लूँगा तव पीर सब, होकर अभी सहाय।।
बिलखि कहें सब जन्तु-जन, मानव भूला रीत।
कॉंच चबायें जंतु को, हुए नाथ भयभीत।।
करुणा जी ने वर दिया, होकर निर्भय शेष।
जाओ घर मैं आ रहा, धरि 'कोरोना' भेष।।
हमने मानव को दिया, जीव-दया का भाव।
वह अभिमानी हो गया, रखने लगा दुराव।।
मानव गर 'मद' चूर है, खाता दुर्बल जीव।
नहिं उसकी अब खैर है, हिल जायेगी नीव।।
अमरीका हो रूस हो, या हो इटली, चीन।
अब उतरुँगा मैं धरा, मानव होगा दीन।।
भारत को भी ज्ञात हो, चेतेगा तो ठीक।
दया-भाव मन में रहे, भोजन राखे नीक।।
पश्चिम पीछे भाग मत, खोकर सकल विवेक।
उनकी अपनी सोच है, तेरी अपनी नेक।।
जीवों पर मत जुल्म कर, मत बन झूठा बीर।
भोजन तो भरपूर है, धार जीभ पर धीर।।
आया हूँ बन त्रासदी, ले ले मेरी सीख।
नवरात्री से बीस दिन, बाहर ना तू दीख।।
२५/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
Sunday, 8 March 2020
Saturday, 11 January 2020
हिन्दी हमारी
हिन्दी हमारी...
जुड़े नहीं जो तार वही, मैं आज मिलाने आया हूँ।
अब तक नहीं पढ़े जो तुम, अखबार पढ़ाने आया हूँ।।
"दिवस विश्व-हिन्दी" का मैं, त्यौहार मनाने आया हूँ।
चलो मातृभाषा का मैं रखवार बनाने आया हूँ।।
अंग्रेजी बस गिट-पिट गिट-पिट, हिन्दी घर की भाषा है।
घरवाले ही भूले इसको, कैसा खेल-तमाशा है।।
किसको दें हम दोष यहाँ पर, गहरी बढ़ी निराशा है।
लेकिन कैसे हार मान लूँ, मुझको अब भी आशा है।।
योगदान यदि करो जरा तुम,परचम ये लहरायेगी।
पाँच मात्रा वालों को यह, पल में धूल चटायेगी।।
मातृभूमि में माता-भाषा जब दुलार पा जायेगी।
है सशक्त यह भाषा मेरी, "विश्व-भाष" बन जायेगी।।
१०/०१/२० ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 8 January 2020
गीतिका छंद
१. जै जवान जै किसान...
पूस की शीतल हवा से, हाड़ हिलने लग गये।
बर्फ की चादर बिछी, लीहाफ़ सिलने लग गये।।
जै किसानों जै जवानों, तुम डटे जो काम पर।
आमजन से आपको आदाब मिलने लग गये।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
२. विद्या संस्थान के हंगामे...
पाट कर के खाइयाँ गर, साथ दो तो राह है।
हाथ हाथों में रहें ये,आम जन की चाह है।।
बात सब ने आप की थी, आपको कहने दिया।
लाठियों ने कब किसी को, चैन से रहने दिया।
८/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
३. जे एन यू के शिक्षार्थी से...
याद है जब तुम गये थे गाँव घर को छोड़कर।
छोड़कर के ज्ञान राहें खो गये किस मोड़ पर।।
भूल मत जाना पिता जी के सजाये खाब को।
फीस के पैसे भिजाए हड्डियों कोै तोड़कर।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
लावणी छंद
लावणी छंद
शिक्षा का राजनीतिकरण
विद्यालय में पढ़ने आये, या हंगामा करने को।
तख्ती लेकर निकल पड़े हो, सारे गा मा करने को।।
माता और पिता ने भेजा, तुमको विद्या पाने को।
तुम लक्ष्यों को दरकिनार कर, निकलें ड्रामा करने को।।
कोई कर में डण्डा थामे, चेहरा ढक कर निकला है।
मार कुटाई मची हुई है, जाने कैसा घपला है।।
किसने किसका हाथ मरोड़ा, कौन बन गया अबला है।
किसने किसके सर को फोड़ा, राजनीति का मसला है।।
७/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 31 December 2019
सार छंद
(१) हैपी क्रिसमस
मदिरा की मस्ती में खोकर, डोल रहे मतवारे।
हैपी होकर हैपी *क्रिसमस, बोल रहे हैं सारे।।
केक बिचारा पूछ रहा है, मेरी ग़लती का रे ?
खुद ख़ुश होकर काट देत हो, मेरी गरदन वा रे !
(२)बे बात की बात
क़ौम-धरम का जाम चखा कर, बहका रहे उवैसी।
ममता 'छी-छी' करती घूमे, हालत होती कैसी।।
पत्थर मारो, आग लगाओ, कैसी डेमोक्रैसी।
बे बातों की बात बनायें, उनकी ऐसी-तैसी ।।
२६/१२/१९ ~~~ अजय 'अजेय'।
Tuesday, 24 December 2019
दोहा छंद
सुनो सी यम जी...
पी यम अपना कर रहे, तुम को अपना काज।
हाथ खुजाते रहो गर, नहीं करोगे आज।।
पी यम के सर देश है, शेष तिहारे नाम।
साया उसका छोड़कर, खुद भी कर लो काम।।
कहाँ-कहाँ वह खड़ा हो, कहाँ-कहाँ दे साथ।
तेरे अपने पाँव हैं, तेरे भी हैं हाथ।।
कब तक ढुलमुल चलोगे, थामे मोदी हाथ।
अपने पाँव बढ़ाइए, मजबूती के साथ।।
मोदी बैठे बीच में, दिखा रहे हैं राह।
गाँवन के तुम रहनुमा, जीतो जन की वाह।।
सेंगर जैसों से परे, रखिये सोच विचार।
यूँ लगाम कसिये तनिक, होय न अत्याचार।।
२३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय' ।
Saturday, 14 December 2019
चौपई छंद - दिशा की बात
(चौपई छंद)
आज उठेगी फिर से लाश।
जीवन है या सूखी घास ?
जिन्ह मर्जी तेहिं फूँक दिया।
हाथ सेंकने की धरि आस।।
तुमको भेजा था उस *द्वार।
पहना कर वोटों का हार।।
बतलाना तुम मेरी बात।
तुम तो भूल गये सब यार।।
बेटी मेरी रोई आज।
पूछे कैसा है यह राज।।
निकली मैं जब घर से पापा।
देखे ताक लगाए 'बाज'।।
बिटिया मुझसे बोली बात।
उस दिन जो अंकल थे साथ।।
उनको पूछो चुप क्यों हैं।
बैठे धरे हाथ पर हाथ।।
१४/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
Monday, 9 December 2019
चौपई छंद
*_(ना)पाकी _* खेल
(१)
चले न उनके कोई दाँव।
जहाँ जाँय खायें बेभाव।।
दिखा रहे अब झूठे ताव।
कहीं डूब ना जाये नाव।।
(२)
बना दिया तुझको परधान।
अब तू दे मुझको वरदान।।
मैंने पीठ खुजा दी ख़ान।
तेरी बारी है तू जान।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(३)
सुनो सुनो आई आवाज।
मौनी बाबा बोले आज।।
नरसिम्हा पर ठेली गाज।
दबे दबे कुछ खोले राज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(४)
पप्पू जी को उभरी खाज।
चले खुजाने फिर से आज।
कर डाला भारत को नँग।
बलत्कार का देकर ताज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 5 December 2019
एक बेटी फिर मरी (रजनी छंद)
(रजनी छंद)
हाल ऐसा हो गया हम सह नहीं पाते।
चाहते हैं हम मगर चुप रह नहीं पाते।
रोज लुटती बेटियों की अस्मिता देखी।
वेदना हिय की किसी से कह नहीं पाते।
निर्भया के पीर से पैदा हुई थी वो।
आन्दोलित हो गयी माँ भारती थी जो।
भूल कर के पीर अपनी वह गयी फिर सो।
कुंभकरणी नींद कैसे आ गयी उसको।
फिर सियासत में जरा सी सुगबुगाहट है।
हैं दिशायें सड़क पर तो भुनभुनाहट है।
एक बेटी फिर मरी तब बौखलाहट है।
सख्त होने में न जाने *क्या रुकावट है।
आ गयी है वो घड़ी जब फैसला हो ये।
जो करें अपराध उनको देश न ढोये।
हों फटाफट फैसले उनके गुनाहों पे।
दोषियों की सूलियों पर देश न रोये।
फाँसियों की डोर झट बँध जाय गरदन में।
हो नहीं देरी विधिक या व्यर्थ क्रंदन में।
पकड़ लायें आसमाँ से या जहाँ भी हों।
हो मुखर संदेश सारा विश्व-बँधन में।
०३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 4 December 2019
दिशा का अंत (दुर्मिल सवैया)
(दुर्मिल सवैया)
टुकड़े-टुकड़े कर के दिल के, मन को, तन को, झुलसाय गये।
इनसान नहीं, बलवान नहीं, भगवानहुँ को बिसराय गये।
छण की, पल की, तन की खुशियाँ, हथियावन को पगलाय गये।
खिलती, हँसती, उड़ती चिड़िया, धरि आगहि भूनि के ढाय गये।।
०४/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।













