(चित्र-लेखन)
(पीयूष निर्झर छंद)
वक्त का कहर
कल महल था आज यह इक खण्डहर है।
वक्त ने इस शहर पर ढाया कहर है।
शाम हँसती थी कभी, अब दोपहर है।
जिन्दगी का भी यही चौथा पहर है।
15/6/26 ~अजय 'अजेय'।
*अमरीका के तुरुप*
(रास छंद)
है लड़ना तो आपस में तुम, लड़ो मरो।
हम पर काहे बेमतलब के वजन धरो।
बंद करो यह खूनी खेला आपस का।
अपने चारागाहों की बस घास चरो।।
शाँतिदूत के दावे कोरे झूठ रहे।
बदली बातों से सबके मन टूट रहे।
रण-विराम कह-कह कर करते वार रहे।
अब तक जो साथी थे वे भी फूट रहे।।
कर का बोझ दिखा सबको भयभीत करो।
दुनिया के आतंकी को तुम मीत करो।
लिये कटोरा जो दर-दर को भटक रहे।
कुछ सिक्के देकर भूखों को शीत करो।।
इन सिक्कों के बल पर दादा बने हुए।
भीतर से आहत हो बाहर तने हुए।
दुनिया को भी तुमने आहत किया हुआ।
खुद भी आफत की माटी में सने हुए।
4/6/26 अजय 'अजेय'।