Wednesday, 1 July 2026

हाथ की रोटियाँ

 

(चित्र-लेखन)

हाथ की रोटियाँ


तीस बत्तिस सेंकती थीं, माँ हमारी गाँव में। 

अब नहीं सिंकतीं शहर में, आठ मन से चाव में।

बाहरी खाने की सब को, लत  बुरी है लग रही।

दिन-ब-दिन घर की बनी अब, सिमटतीं दुर्भाव में।

25/4/26           ~अजय 'अजेय'।

ईंधन की किल्लत


(चित्र-लेखन)

(कुण्डलिया छंद)


ईंधन की किल्लत

ईंधन की किल्लत भई,

मिले  न डीजल तेल,

बचे खेत कैसे जुतें,

मिलें नहीं हल-बैल।

मिले नहीं हल-बैल,

किसानी होये कैसे।

बैल नदारद हुए,

नहीं अब पलते भैंसे।

खुद काँधे पर लिये,

उठा हल भाई झिंगन।

बनना ही था बैल,

नहीं जब मिलता ईंधन।।

6/6/26          ~अजय 'अजेय'।


(चित्र-लेखन)

(पीयूष निर्झर छंद)


वक्त का कहर


कल महल था आज यह इक खण्डहर है।

वक्त ने इस शहर पर ढाया कहर है।

शाम हँसती थी कभी, अब दोपहर है।

जिन्दगी का भी यही चौथा पहर है।

15/6/26           ~अजय 'अजेय'।

अमरीका के तुरुप

 *अमरीका के तुरुप*

(रास छंद)


है लड़ना तो आपस में तुम, लड़ो मरो।

हम पर काहे बेमतलब के वजन धरो।

बंद करो यह खूनी खेला आपस का।

अपने चारागाहों की बस घास चरो।।


शाँतिदूत के दावे कोरे झूठ रहे।

बदली बातों से सबके मन टूट रहे।

रण-विराम कह-कह कर करते वार रहे।

अब तक जो साथी थे वे भी फूट रहे।।


कर का बोझ दिखा सबको भयभीत करो।

दुनिया के आतंकी को तुम मीत करो।

लिये कटोरा जो दर-दर को भटक रहे।

कुछ सिक्के देकर भूखों को शीत करो।।

 

इन सिक्कों के बल पर दादा बने हुए। 

भीतर से आहत हो बाहर तने हुए।

दुनिया को भी तुमने आहत किया हुआ।

खुद भी आफत की माटी में सने हुए। 

4/6/26                अजय 'अजेय'।

Tuesday, 30 June 2026

एनकाउंटर या हत्या

(पद्मिनी छंद)

एनकाउंटर या  हत्या

  (भरत तिवारी)


फेंक दी गन तभी भी चलीं गोलियाँ।

पूछते हैं सभी बंद हैं बोलियाँ।

थम गयी साँस वो अब चलेगी नहीं।

था गलत या सही पर बँटी टोलियाँ।।


बात की बात में बात बढ़ने लगी।

घात दोनों तरफ़ पाठ पढ़ने लगी।

माथ पर जब चढ़ी राजनीतिक सनक।

मौत के दृष्य स्वयमेव गढ़ने लगी।

26/6/26        ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 20 June 2026

युद्धविराम पर प्रश्न ?

 युद्धविराम पर प्रश्न ? 

(दोहा छंद)


रुके युद्ध पर मच रहा, भारी बड़ा बवाल।

जिसको देखो कर रहा, हम से  यही सवाल।।


काहे रोका वेग को, करते मटियामेट।

आया था मौका सही, अब तक जिसका वेट।।


बात सही है आपकी, सबको यही सुहाय।

लेकिन कुछ बातें यहीं, मेरी समझ न आय।।


जीत मिले तो साथ में, मिलता है कुछ रोग।

माटी पर कब्जा मिले, साथ मिलें कुछ लोग।।


साथ मिलेंगे जो हमें, क्या तुमको मंजूर ?

आधे भूखे पेट के, आधे भूखे हूर।।


हुये अलग थे चाह कर, हमसे पाले बैर। 

आज मिलेंगे जब हमें, चाहेंगे वे खैर ?


पाल सकोगे साँप तुम, घर में लाकर आज ?

रोज खुजाते फिरेंगे, लेकर खुजली खाज ?


जल्दीबाजी मत करो, नहीं बिगाड़ो काम। 

ऋतु आये फल मिलेंगे, मिर्ची केला आम।। 


थोड़ी थोड़ी चोट दो, रुक रुक सीमा पार।

मौत मरेंगे आप ही, सब हूरों के यार।। 


खेल नहीं यह युद्ध है, नियम न जैसे खेल।

दर्द न मिटते साल तक, मलते रहिये तेल।। 

19/5/25                      ~अजय 'अजेेेय'।

कोरोना की पुनर्दस्तक

कोरोना की पुनर्दस्तक 
(चौपाई छंद)

दस्तक देत करोना आये। याद महामारी की लाये।।
पल पल फिर से हाथ धुलाये। जन जन का ये दिल दहलाये।।

डरी डरी साँसें चलती थीं। रोज चिता धू धू जलती थीं।।
साथी भी नहिं साथ विचरते। रुख से थे न मास्क उतरते।।

सब्जी भी धुलती कइ बारा। सूनी थीं गलियाँ चौबारा।।
रोज लगाते थे जयकारा। लौट न आये यह दोबारा।।

ताले पड़ गै हाट-माॅल में। फँस ना जाये जान जाल में।।
पहुँचे जो भी हस्पताल में। पता न लौटें कौन हाल में।।

बड़े भयावह दिन थे सारे। राजा रंक सभी बेचारे।।
सब फिरते थे मारे मारे। मुख न उघारे भय के मारे।।

हे रघुनन्दन हम सिरधारे। आप हमारे पालनहारे।।
दया करो हे सिरजनहारे। पुनः करोना नहीं पधारे।।

27/5/25                                 ~अजय 'अजेय'

Tuesday, 19 May 2026

हमारा भारत

हमारा भारत

(विधाता छंद)


सँवारा है जिसे हमने, निराला देश है मेरा।

निराई कर गुड़ाई कर, सजाया बाग का घेरा।

पतंगे-कीट मारेंगे, अगर आयें हमारे घर।

जमाने अब नहीं देंगे, किसी को हम यहाँ डेरा।।

समझ लें आप भी, सब को,समझ में बात ये आये।

न कोई दे हमें धमकी, न भोली बात फुसलाये। 

जिसे भारत सुहाता हो, यहाँ के गीत वो गाये। 

नहीं तो बाँध कर बिस्तर, जहाँ भाये वहीं जाये।।

4/10/24                      अजय 'अजेय'।