(चित्र-लेखन)
हाथ की रोटियाँ
तीस बत्तिस सेंकती थीं, माँ हमारी गाँव में।
अब नहीं सिंकतीं शहर में, आठ मन से चाव में।
बाहरी खाने की सब को, लत बुरी है लग रही।
दिन-ब-दिन घर की बनी अब, सिमटतीं दुर्भाव में।
25/4/26 ~अजय 'अजेय'।
(चित्र-लेखन)
हाथ की रोटियाँ
तीस बत्तिस सेंकती थीं, माँ हमारी गाँव में।
अब नहीं सिंकतीं शहर में, आठ मन से चाव में।
बाहरी खाने की सब को, लत बुरी है लग रही।
दिन-ब-दिन घर की बनी अब, सिमटतीं दुर्भाव में।
25/4/26 ~अजय 'अजेय'।
(कुण्डलिया छंद)
ईंधन की किल्लत
ईंधन की किल्लत भई,
मिले न डीजल तेल,
बचे खेत कैसे जुतें,
मिलें नहीं हल-बैल।
मिले नहीं हल-बैल,
किसानी होये कैसे।
बैल नदारद हुए,
नहीं अब पलते भैंसे।
खुद काँधे पर लिये,
उठा हल भाई झिंगन।
बनना ही था बैल,
नहीं जब मिलता ईंधन।।
6/6/26 ~अजय 'अजेय'।
*अमरीका के तुरुप*
(रास छंद)
है लड़ना तो आपस में तुम, लड़ो मरो।
हम पर काहे बेमतलब के वजन धरो।
बंद करो यह खूनी खेला आपस का।
अपने चारागाहों की बस घास चरो।।
शाँतिदूत के दावे कोरे झूठ रहे।
बदली बातों से सबके मन टूट रहे।
रण-विराम कह-कह कर करते वार रहे।
अब तक जो साथी थे वे भी फूट रहे।।
कर का बोझ दिखा सबको भयभीत करो।
दुनिया के आतंकी को तुम मीत करो।
लिये कटोरा जो दर-दर को भटक रहे।
कुछ सिक्के देकर भूखों को शीत करो।।
इन सिक्कों के बल पर दादा बने हुए।
भीतर से आहत हो बाहर तने हुए।
दुनिया को भी तुमने आहत किया हुआ।
खुद भी आफत की माटी में सने हुए।
4/6/26 अजय 'अजेय'।
(पद्मिनी छंद)
एनकाउंटर या हत्या
(भरत तिवारी)
फेंक दी गन तभी भी चलीं गोलियाँ।
पूछते हैं सभी बंद हैं बोलियाँ।
थम गयी साँस वो अब चलेगी नहीं।
था गलत या सही पर बँटी टोलियाँ।।
बात की बात में बात बढ़ने लगी।
घात दोनों तरफ़ पाठ पढ़ने लगी।
माथ पर जब चढ़ी राजनीतिक सनक।
मौत के दृष्य स्वयमेव गढ़ने लगी।
26/6/26 ~अजय 'अजेय'।
युद्धविराम पर प्रश्न ?
(दोहा छंद)
रुके युद्ध पर मच रहा, भारी बड़ा बवाल।
जिसको देखो कर रहा, हम से यही सवाल।।
काहे रोका वेग को, करते मटियामेट।
आया था मौका सही, अब तक जिसका वेट।।
बात सही है आपकी, सबको यही सुहाय।
लेकिन कुछ बातें यहीं, मेरी समझ न आय।।
जीत मिले तो साथ में, मिलता है कुछ रोग।
माटी पर कब्जा मिले, साथ मिलें कुछ लोग।।
साथ मिलेंगे जो हमें, क्या तुमको मंजूर ?
आधे भूखे पेट के, आधे भूखे हूर।।
हुये अलग थे चाह कर, हमसे पाले बैर।
आज मिलेंगे जब हमें, चाहेंगे वे खैर ?
पाल सकोगे साँप तुम, घर में लाकर आज ?
रोज खुजाते फिरेंगे, लेकर खुजली खाज ?
जल्दीबाजी मत करो, नहीं बिगाड़ो काम।
ऋतु आये फल मिलेंगे, मिर्ची केला आम।।
थोड़ी थोड़ी चोट दो, रुक रुक सीमा पार।
मौत मरेंगे आप ही, सब हूरों के यार।।
खेल नहीं यह युद्ध है, नियम न जैसे खेल।
दर्द न मिटते साल तक, मलते रहिये तेल।।
19/5/25 ~अजय 'अजेेेय'।
हमारा भारत
(विधाता छंद)
सँवारा है जिसे हमने, निराला देश है मेरा।
निराई कर गुड़ाई कर, सजाया बाग का घेरा।
पतंगे-कीट मारेंगे, अगर आयें हमारे घर।
जमाने अब नहीं देंगे, किसी को हम यहाँ डेरा।।
समझ लें आप भी, सब को,समझ में बात ये आये।
न कोई दे हमें धमकी, न भोली बात फुसलाये।
जिसे भारत सुहाता हो, यहाँ के गीत वो गाये।
नहीं तो बाँध कर बिस्तर, जहाँ भाये वहीं जाये।।
4/10/24 अजय 'अजेय'।
दीपावली पर्व
१.(किशोर छंद)
घर के भीतर खूब सफाई, करते हैं।
मोबाइल पर ज्ञान ढेर हम, भरते हैं।
हुई साँझ भरपूर पटाखे, फोड़ेंगे।
पॉलूशन के सारे मानक, तोड़ेंगे।।
२.(रास छंद)
लड़ी सितारे चीनी वाले, झूल गये।
माटी वाला दीपक लाना, भूल गये।
जले नहीं दीपक घर के कुम्भारन के।
चकाचौंध की भेंट मंत्र चढ़, मूल गये।।
31/10/ 24 ~अजय 'अजेय'।
जान मेरी
(गीतिका छंद)
वो कभी जो गैर से थे, जान मेरी हो गये।
छेड़ कर वे तार मन के, अब कहाँ हैं खो गये।
खोजता फिरता ख़यालों में, सदा रहता उन्हें।
जान मुट्ठी में हमारी, ले दबा कर जो गये।।
24/10/24 ~अजय 'अजेय'।
(दोहा छंद)
विसर्जन
लाये थे घर प्रेम से, फेंका नेह बिसार।
भगवन कैसे आँय फिर, हो जब यह आचार।।
पूजा हो जिसकी प्रथम, सजे प्रथम घर द्वार।
उनकी यह अवहेलना, कैसे है स्वीकार।
भेड़चाल कैसी चली, करिये जरा विचार।
जिनको घर लायें सजा, फेंकें नदी किनार।।
20/10/24 ~अजय 'अजेय'।
(आल्हा छंद)
सर्दी में स्नान
कोहरे ने कोहराम मचाया,
नजर न आये गाड़ी-कार।
भई नदारद धूप नगर में,
सर्दी करती चोटिल वार।।
सूख न पाते कपड़े गीले,
भरे पड़े सब रस्सी तार।
दस्तक हुई द्वार पर भोरे,
शायद आया हो अखबार।।
तजें रजाई कंबल कैसे,
जुटे न हिम्मत इतनी यार।
इक-दूजे का चेहरा ताकें,
खोले कौन बाहरी द्वार।।
जैसे तैसे हाथ धो रहे,
मुख को हल्का लिए पखार।
राह देखते सूरज की अब,
आय गया खिचड़ी त्यौहार।।
हिम्मत कर के पहुँच भी गये,
तन को कैसे करें उघार।
डुबकी कैसे लगे गंग में,
सोच रहा मन बारम्बार।।
एक हाथ से नाक दबाई,
हर हर गंगे लई पुकार।
आलस गायब, सर्दी गायब,
हो जब गंगा की जयकार।।
14/1/25 ~अजय 'अजेेेय'।
छठि माई
(दिक्पाल छंद)
मिलि करत चची ताई, पावन नहाइ खाई।
कोसी भराय माई, रहना सदा सहाई।।
फल मूल अरु मिठाई, भरि घाट भोर जाई।
सूरज दिये दिखाई, तब अर्घ फिर बिदाई।।
आशीष से नवाजो, बिगड़ी हमार साजो।
कल थी सहाय तुमही, छठि माँ सहाय आजो।।
पहिला अरघ तिहारा, अब होय रही साँझो।
उपवास हुआ निर्जल, घर आनि माँ बिराजो।
31/10/22 ~अजय 'अजेय'।
त्यौहारी भाईचारा
(निश्चल छंद)
भाईचारे का भइया जी, गाढ़ा रंग।
दिखलाओ ऐसे दुनिया रह, जाए दंग।।
मजहबियों अब मत छेड़ो तुम, विषधर राग।
आओ मिलजुल कर सब खेलें, गायें फाग।।
पाक अगर ईदी सेवई व, है इफ्तार।
तो फिर होली के रंगों से, कैसा खार।।
बने नहीं अब पर्व हमारे, जंगी गंज।
इक दूजे का मान रखें हम, ना हो रंज।।
13/3/25 ~अजय 'अजेय'।
मेरे जानम
(विष्णुपद छंद)
बड़े सुरीले बड़े रसीले, हैं मेरे जानम।
उनके गाने से सजती हैं, गीतों की सरगम।।
उनको सुनने को कानों की, आस तरसती है।
होंठों से उनके हर पल रस धार बरसती है।।
3/3/25 ~अजय 'अजेय'।
*न्यू ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'। ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'।
(प्रदीप छंद)
*नोट बनाम वोट*
ऐरे गैरे नत्थू खैरे, सारे लगे दिखाने नोट।
आसमान के तारे देंगे, दे दो बस तुम हमको वोट।।
समझ बूझ कर चलना भइया, मिलती कदम कदम पर चोट।
इनके झाँसे में मत आना, इनकी नीयत में है खोट।।
17/1/25 ~अजय 'अजेय'।
*काठ की हाँडी*
(पीयूष निर्झर छंद)
सो गया सपना बिचारे केजरी का।
चढ़ गया ताला हरीसन टेजरी का।
कब तलक ये काठ की हाँड़ी चलाते।
कब तलक ये झूठ की दालें गलाते।।
हैं नहीं पकतीं खिचड़ियाँ बाँस लटकी।
टाँग कर के बीरबल सी दाल मटकी।
खोखले वादे कहाँ तक काम आते।
तीर कब तक गैर के काँधे चलाते।।
10/2/25 ~अजय 'अजेय।
चित्र लेखन
*खेल-तमाशा*
(महाश्रृंगार छंद)
हिम्मती बाला करती खेल,
सामने इसके लड़के फेल,
समन्वय का है अद्भुत मेल,
संतुलन की यह रस्सी रेल।।
व्यक्ति खास हो या हो आम,
मेहनत से ही बनता काम,
बिन मेहनत के मिले न धाम,
मेहनत से जीवन आराम।।
खोले हाथ जो माँगें भीख,
बाला उन्हें सिखाती सीख,
मेहनत की ही राह सटीक,
मेहनत की तुम धारो लीक।।
13/2/25 ~अजय 'अजेय'।
गलत-सही
(गगनांगना छंद)
गलत बात तो गलत बात है, हम भी मानते।
लेकिन सच्चाई तब है जब, सच्ची छानते।।
जात पात से ऊपर उठकर, ताने तानते।
मेरा-तेरा भाव छोड़कर, सबको सानते।।
तब हम कहते सही बात है, इनकी मानिये।
ये नेता जी सही कह रहे, यारों जानिये।।
लेकिन ऐसी बात नहीं जब, उनकी बात में।
ऐसों पर तो तीर नुकीले, भइया तानिये।।
6/11/24 ~अजय 'अजेय'।
चक्रव्यूह का घेरा
राग अलापें गर्दभ सारे, ये सिंहासन मेरा है।
ये दे दूँगा वो दे दूँगा, नित नव चित्र उकेरा है।।
फेर रहे जो माला समझो, ये वोटों का फेरा है।
झाँसे में मत आना यारों, चक्रव्यूह का घेरा है।।
24/5/24 ~अजय 'अजेय'।
नेता जी : विदेशी बोल
(विधाता छंद)
कभी कन्याकुमारी तो, कभी
आसाम जाते हैं।
दुकानें भी मुहब्बत की, गली में वो लगाते हैं।
पहुँचते ही विदेशों में, मगर घर को भुलाते हैं।
भरे मुख से बुराई देश की गा कर सुनाते हैं।।
न जाने कौन सी नजरों से, नेता वो कहाते हैं।
पड़ोसी के यहाँ जाकर, खयाली जो पकाते हैं।
नहीं थकते झुकाने में, घरेलू देश की अस्मत।
घरों से दूर जाकर, झूठ के आँसू बहाते हैं।।
25/9/24 ~अजय 'अजेय'।
मतदान आ गया
(शैल छंद)
आ गया।
आज है, छा गया।
है नशा, है नहीं, जो नया।
वोट की बात है नोट की है दया।
राम हो नाम हो काम के जोर पर हो जया।
15/4/24 ~अजय 'अजेय'।
करगिल विजय दिवस पर...
(कुण्डलिया छंद)
आ धमके नापाक अरि, करि करगिल में घात।
उन्निस सौ निन्यानबे, बात हुई यह ज्ञात।।
बात हुई यह ज्ञात, इरादे नेक न उनके।
छेंके आ कर बँकर, छल से ताने बुनके।।
भागे पूँछ दबाय, गिरे जब गोले जमके।
धर दोज़ख की राह, गये जो थे आ धमके।।
26/7/23 ~अजय 'अजेय'।
सफल भारतीय अभियान : तीसरा चंद्रयान
(चंद्रयान-3)
आज देश ने लिखी चाँद पर,
स्वर्णिम एक इबारत है।
"मामा" के कंधे पर चढ़ कर,
खेल रहा नव-भारत है।।
"सोमनाथ" के निर्देशन में,
भारत ने इतिहास रचा।
चंद्रयान-3 के लैंडर,
"विक्रम" ने पद चाँद रखा।।
हर्ष लहर में झूम उठा है,
भारत का कोना कोना।
नगर-नगर में धूम मची है,
बँटे मिठाई का दोना।।
सफल सिद्ध वैज्ञानिक अपने,
चाँद तिरंगा गाड़ दिया।
विश्व-पटल पर स्वाभिमान संग,
भारत को जय-बाण दिया।।
निकल चुका रोवर "प्रज्ञानी",
अपना खेल दिखाने को।
विचरेगा चंदा-तल पर वह,
जानकारियाँ लाने को।।
चौदह दिन के पखवाड़े भर,
घूमेगा यह विज्ञानी।
संभव कि वह तलाश ले,
प्राण-वायु, तल पर पानी।।
अंत नहीं, आरंभ हुआ यह,
दबे खजाने पाने का।
यह सुरंग का दरवाजा है,
बहुत बचा है आने का।।
23/8/23 ~अजय 'अजेय'।
मामा के घर भान्जा
(मनोरम छंद)
साँझ को जब चाँद आया,
चाँदनी पर तिलमिलाया।
लाल पीला कह रहा वह,
बोल किसको घर बुलाया।।
चाँदनी ने देख माया,
नेह से उसको बताया।
देख लो खुद ही बुलाकर,
भान्जा ननिहाल आया।।
*ज्ञान 'अवनी' ने मँगाया,*
यान पर है बैठ आया।
नाम 'विक्रम' कह रहा है,
*"भारती" का पूत पाया।।*
*चाँद मामा मुस्कुराया,*
चाँदनी को उर लगाया।
भान्जे को काँध पर ले,
घूम सारा घर दिखाया।।
1/9/23 ~अजय 'अजेय'।
कोहरे का कोहराम
सर्दी ने सिरदर्दी दे दी,
कोहरे ने कोहराम,
घर से न तुम बाहर निकलो,
वर्ना धरे जुखाम।
बचना घोर कहर से तो,
फिर सुनलो यह पैगाम,
ओढ़ि चदरिया घर में बैठो,
बोलो जय श्रीराम....
बोलो राम राम राम,
बोलो राम राम राम,
बोलो राम राम राम,
जै सियाराम जै जै सियाराम।।
13/1/24 ~अजय 'अजेय'।
सौ पर भारी एक
(कुण्डलिया छंद)
कोशिश में सारे लगे, रोक न पायें एक।
सौ पर भारी एक है, लिये इरादे नेक।।
लिये इरादे नेक, बढ़े वह गज के जैसे।
भौंकत चलते श्वान, दूर से डरते वैसे।।
कहें अजय कविराय, रोज पीते हैं वो विष।
पाना मुश्किल पार, करें कितनी भी कोशिश।।
~अजय 'अजेय'।
हे मतदाता
(रास छंद)
एक तार से गुँथे हुये तुम रहो जरा।
संगी-साथी कथा जीत की कहो जरा।।
जीव भयानक इस दरिया के वासी हैं।
धार सरित की नाप तोल कर बहो जरा।।
राजनीति के गलियारे ये जंगल हैं।
इस में पग पग पर आयोजित दंगल हैं।।
नीति-हीन दल और अनगिनत निर्दल हैं।
सोम गुरू रवि आज, वही कल मंगल हैं।।
नींव बिना ही चलें उठाने महल यहाँ।
इनकी माटी उनकी टाटी जुटे कहाँ।।
साड़ी टोपी सूट-बूट सब वेष अलग।
बिखरीं गठबंधन की ईँटें जहाँ-तहाँ।।
15/3/24 ~अजय 'अजेय'।
(विधाता छंद)