Tuesday, 30 June 2026

एनकाउंटर या हत्या

(पद्मिनी छंद)

एनकाउंटर या  हत्या

  (भरत तिवारी)


फेंक दी गन तभी भी चलीं गोलियाँ।

पूछते हैं सभी बंद हैं बोलियाँ।

थम गयी साँस वो अब चलेगी नहीं।

था गलत या सही पर बँटी टोलियाँ।।


बात की बात में बात बढ़ने लगी।

घात दोनों तरफ़ पाठ पढ़ने लगी।

माथ पर जब चढ़ी राजनीतिक सनक।

मौत के दृष्य स्वयमेव गढ़ने लगी।

26/6/26        ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 20 June 2026

युद्धविराम पर प्रश्न ?

 युद्धविराम पर प्रश्न ? 

(दोहा छंद)


रुके युद्ध पर मच रहा, भारी बड़ा बवाल।

जिसको देखो कर रहा, हम से  यही सवाल।।


काहे रोका वेग को, करते मटियामेट।

आया था मौका सही, अब तक जिसका वेट।।


बात सही है आपकी, सबको यही सुहाय।

लेकिन कुछ बातें यहीं, मेरी समझ न आय।।


जीत मिले तो साथ में, मिलता है कुछ रोग।

माटी पर कब्जा मिले, साथ मिलें कुछ लोग।।


साथ मिलेंगे जो हमें, क्या तुमको मंजूर ?

आधे भूखे पेट के, आधे भूखे हूर।।


हुये अलग थे चाह कर, हमसे पाले बैर। 

आज मिलेंगे जब हमें, चाहेंगे वे खैर ?


पाल सकोगे साँप तुम, घर में लाकर आज ?

रोज खुजाते फिरेंगे, लेकर खुजली खाज ?


जल्दीबाजी मत करो, नहीं बिगाड़ो काम। 

ऋतु आये फल मिलेंगे, मिर्ची केला आम।। 


थोड़ी थोड़ी चोट दो, रुक रुक सीमा पार।

मौत मरेंगे आप ही, सब हूरों के यार।। 


खेल नहीं यह युद्ध है, नियम न जैसे खेल।

दर्द न मिटते साल तक, मलते रहिये तेल।। 

19/5/25                      ~अजय 'अजेेेय'।

कोरोना की पुनर्दस्तक

कोरोना की पुनर्दस्तक 
(चौपाई छंद)

दस्तक देत करोना आये। याद महामारी की लाये।।
पल पल फिर से हाथ धुलाये। जन जन का ये दिल दहलाये।।

डरी डरी साँसें चलती थीं। रोज चिता धू धू जलती थीं।।
साथी भी नहिं साथ विचरते। रुख से थे न मास्क उतरते।।

सब्जी भी धुलती कइ बारा। सूनी थीं गलियाँ चौबारा।।
रोज लगाते थे जयकारा। लौट न आये यह दोबारा।।

ताले पड़ गै हाट-माॅल में। फँस ना जाये जान जाल में।।
पहुँचे जो भी हस्पताल में। पता न लौटें कौन हाल में।।

बड़े भयावह दिन थे सारे। राजा रंक सभी बेचारे।।
सब फिरते थे मारे मारे। मुख न उघारे भय के मारे।।

हे रघुनन्दन हम सिरधारे। आप हमारे पालनहारे।।
दया करो हे सिरजनहारे। पुनः करोना नहीं पधारे।।

27/5/25                                 ~अजय 'अजेय'