कोरोना की पुनर्दस्तक
(चौपाई छंद)
दस्तक देत करोना आये। याद महामारी की लाये।।
पल पल फिर से हाथ धुलाये। जन जन का ये दिल दहलाये।।
डरी डरी साँसें चलती थीं। रोज चिता धू धू जलती थीं।।
साथी भी नहिं साथ विचरते। रुख से थे न मास्क उतरते।।
सब्जी भी धुलती कइ बारा। सूनी थीं गलियाँ चौबारा।।
रोज लगाते थे जयकारा। लौट न आये यह दोबारा।।
ताले पड़ गै हाट-माॅल में। फँस ना जाये जान जाल में।।
पहुँचे जो भी हस्पताल में। पता न लौटें कौन हाल में।।
बड़े भयावह दिन थे सारे। राजा रंक सभी बेचारे।।
सब फिरते थे मारे मारे। मुख न उघारे भय के मारे।।
हे रघुनन्दन हम सिरधारे। आप हमारे पालनहारे।।
दया करो हे सिरजनहारे। पुनः करोना नहीं पधारे।।
27/5/25 ~अजय 'अजेय'।
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