Wednesday, 16 August 2023
बुढ़ापा
चित्र-लेखन
(घनाक्षरी छंद)
चित्र-लेखन
(घनाक्षरी छंद)
बुढ़ापा
बिखरे हैं केश तन में न बल शेष पर,
जीने की ललक कभी साथ नहीं छोड़ती।
मन में जलन नहीं तन पे वसन नहीं,न
पर आँख आशाओं की डोर नहीं तोड़ती।
राशन की बँटनी में सबसे हैं आगे बाबा,
बहू घर बैठ ऐंठ के चाभी मरोड़ती,
बैठे बैठे घर खाली तोड़ रहे रोटियों को,
कर्कश सुर पति से है बात जोड़ती।
23/9/22 ~अजय 'अजेय'।
Saturday, 12 August 2023
रोजगार
चित्र-लेखन
(मदिरा सवैया छंद)
रोजगार
भार उठावन हो सिर या फिर गोबर हो कर-पाथन को।
भोजन खातिर राह लखैं कछु काम मिले जन हाथन को।।
राज किसी दल के बल हो पर साथ बराबर शासन हो।
भूख पियासन जान तजें उससे पहिले घर राशन हो।।
22/9/22 ~अजय 'अजेय'।
छंद विधान : निश्चल छंद
निश्चल छंद
(छंद विधान)
कल की खातिर मिला आज जब छंद विधान।
निश्चल में लिख डालो साथी अपनी बान।।
याद रहे यति षोडश सप्तम पायें मान।
तेइस मात्रिक निश्चल को तुम लो पहचान।।
3/9/22 ~अजय 'अजेय'।
मेरे (फौजी) सनम
(चित्र लेखन)
मेरे (फौजी) सनम
बैठ माँ की गोद में भोजन किया करते सनम।
प्रेम हमसे फोन पर ही कर लिया करते सनम।
देश को आगे सदा रख कर रहे सेवा अहम्।
मैं हृदय मुमताज उनकी, ताज हैं सर के सनम।
03/9/22 ~अजय 'अजेय'।
कारगिल दिवस : 2022
करगिल दिवस
(चौपई छंद)
हो नवाज़ या हो इमरान।
जारी झूठे रोज बयान।।
काँटे भरा पड़ोसी जान।
धोखे करता पाकिस्तान।।
हर कीमत पर ध्वज का मान।
रखते हैं सैनिक, श्रीमान।
वीरों ने ले, दे कर जान।
करगिल को दी है पहचान।।
भारत मेरा देश महान।
सैनिक भारत की हैं शान।।
सदा खड़े जो सीना तान।
करें सभी इनका सम्मान।।
26/7/22 ~अजय 'अजेय'।
सबका साथ : सबका विकास
सबका साथ : सबका विकास
(चौपई छंद)
पंजा कहीं न फटके पास।
बिखरा दीखे तिनका घास।।
परिजन ही जब खासम-खास।
कैसे सबका होय विकास।।
कहते खरी खरी हैं बात।
देते हैं जो सबका साथ।।
उतरे जैसे ही कोविन्द।
मुर्मू ने पायी सौगात।।
पूरण होती सबकी आस।
सब मिलकर जब करें प्रयास।।
घोर विरोधी बने मुरीद।
मन की बातें आती रास।।
25/7/22 ~अजय 'अजेय'।
सूखा - ग्रेटर नोएडा
(चौपाई छंद)
ग्रेटर नोएडा:सूखा-सूखा
कहीं बहें सरिता तूफ़ानी, कहीं न एक बूँद भी पानी।
कहीं बही छत कहीं पलानी¹, कहीं डूबते नाना-नानी।।
सेक्टर चाई जल को तरसे, बीटा गामा पानी-पानी।
हमने कैसी नादानी की, करें वरुण हमसे बइमानी।।
21/7/22 ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 14 July 2022
शेर पर बवाल
शेर पर बवाल
(विधाता छंद)
कभी वह मुस्कुराता था, तभी वह शेर होता था।
मक्खियाँ छेड़ जाती थीं, गुफ़ा में बैठ रोता था।।
दहाड़ा है गर्जना कर, वतन का शेर जागा है।
गर्जना से दहल जागा, नयन मूँदे जो* सोता था।।
13/7/22 ~अजय 'अजेय'।
पानी पानी
(रुचिरा व ताटंक छंद के मिश्रणयुक्त रचना का एक प्रयास)
पानी पानी
जिधर देखिये उधर नगर में,खाली पानी पानी है।
बदहाली के मंजर सच हैं,दावा सब बेमानी है।।
हुये करोड़ों खर्च साल भर,ये सरकारी बानी है।
आई अब बरसात शहर में,पोल सभी खुल जानी है।।
उफ़न रहा है नदियों का जल,नये बने वे बाँध बहे।
कहाँ बह गये संसाधन सब,जिसके बदले नोट गहे।।
किसकी जेब हो गई मोटी,किस पर हैं इल्ज़ाम ढहे।
सरकारी दफ़्तर की फ़ाइल,कितने झूठे बोझ सहे।।
12/7/22 ~अजय 'अजेय' ।
Thursday, 5 May 2022
बेटी के विवाहोपरांत
पड़ा जो डाका मुझ पे, पाई-पाई ले गये,
कुछ केश सँवारे थे, जो नाई ले गये।।
बहूरानी लाये थे, बेटी के भाई ले गये,
बिटिया थी पली नाज से, जँवाई ले गये।।
अब टूटे-फूटे घर में, बस मान बचा है,
पूरे हुए सभी, न अब अरमान बचा है।।
धड़कते दिल संग, तनिक जान बचा है,
एक प्यारा सा खिलौना, ईवान बचा है।।
04/05/22 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 23 March 2022
युद्ध व्यवसायी
(घनाक्षरी छंद)
युद्ध व्यवसायी नीति
दंश करोना का अभी गया भी नहीं कि देखो,
साये युद्ध वाले नभ पर दिखने लगे।
बंद किए बैठे थे दुकान हथियारों वाले,
झाड़ पोंछ कर बही-खाते लिखने लगे।
धूल फाँकने लगी थीं मँडियां करोना में जो,
थोप कर युद्ध बोल बोल चीखने लगे।
खुद तो न लड़ें पर पीछे हम खड़े कहें,
भरती तिजोरियों के मंत्र सीखने लगे।
23/3/22 ~अजय 'अजेय'।
गिरगिटी सपने
(चौपई छंद)
गिरगिटी सपने
कुछ दिन पहले की है बात।
छोड़ गये थे गिरगिट साथ।।
कोई सइकिल पर चढ़ जात।
कोई चला थामने हाथ।।
बदले थे गिरगिट जो रंग।
देख रहे, जनमत हो दंग।।
बहस रहे थे कसते व्यंग।
हुये मुँगेरी सपने भंग।।
10/3/22 ~अजय 'अजेय'।
<10>10>
होलिका दहन
<(कुण्डलिया छंद)>
होलिका दहन
<होली का हैप्पी हुई,जल गै जिसके बाल।
साजिश सब चौपट भई,फेल दुष्ट की चाल।।
फेल दुष्ट की चाल,जल गई बहिना प्यारी।
जली बुराई संग श्रृंगारी गहना धारी।।
कह अजेय कविराय,न चढ़िये छद्मी डोली।
जल जायेंगे ऐसे, जैसे जलती होली।।
<18/3/22 ~अजय 'अजेय'।>
Monday, 21 March 2022
ग्रामीण संस्कार
चित्र लेखन
(विष्णुपद छंद)
ग्रामीण संस्कार
आते जाते राही का भी, मान बढ़ाते हैं,
कुटिया को ही हम तो अपने, महल बनाते हैं।।
कौन पूछता है किसको अब, शहरी महलों में,
हम अंजानों को भी दिल से, गले लगाते हैं।।
12/3/22 ~अजय 'अजेय'।
Monday, 10 January 2022
ओमीक्राॅन लहर
<ओमीक्राॅन लहर>
<(भुजंगी छंद)>
<नहीं हो रहा है हमें कुछ असर,
बिना मुख ढके घूमते हैं निडर,
गये भूल बीती हुई वो लहर,
तभी भान होता गिरें जब गटर।
जरा छूट पाई लगे झूमने,
पहाड़ी समंदर लगे घूमने,
भुला के सिखाये सभी कायदे,
लगा कर गले से लगे चूमने।
करोना दुबारा पलट आ गया,
खतरनाक 'ओमी' कहा है गया,
बड़ी तेज गति से कहर ढा रहा,
न जाने किधर से किलर आ रहा।
10/1/22 ~अजय'अजेय'।>
Sunday, 26 December 2021
किसान और आंदोलन
(रुचिरा छंद)
किसान और आंदोलन
थे किसान पर सड़कों पर ही,
खेती करते साल गया।
किसे पता है इसके पीछे,
किस बंदे का माल गया।
कितना डीज़ल जला रात दिन,
कितना धन बरबाद हुआ।
कोई तो बतलाओ यारों,
किसका चावल-दाल गया।
कौन कौन थे किसके पीछे,
खेल कौन था चाल गया।
21/12/21 ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 23 December 2021
बदले भाव-आये चुनाव
(महाश्रृंगार छंद)
बदले भाव - आये चुनाव
देख कर के बदले ये भाव।
हैं उठते जन-मन में सवाल।
क्या हो नहीं सकते चुनाव।
हर साल और साल-दर-साल।
याद आ गये गाँव देहात।
भुलाई सारी बिगड़ी बात।
हो रही सौगाती बरसात।
बँट रही है खुल के खैरात।
23/12/21 ~अजय'अजेय'।
कोरोना (ओमीक्राॅन) की दस्तक
कोरोना(ओमीक्राॅन) की दस्तक
(ककुंभ छंद)लहर तीसरी आने वाली,
है, अब ऐसा लगता है।
जनता की आँखों पर पर्दा,
छाया जैसा लगता है।
घूम रहे सब ऐसे जैसे,
छुट्टा भैंसा लगता है।
भूल गये जब अपना कोई,
जाये कैसा लगता है।
21/12/21 ~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 16 November 2021
रैलियाँ व महामारी
गीतिका छंद
रैलियाँ और महामारी
रोक देनी थीं मगर ये, रोकते नहिं रैलियाँ।
जुट रहे हैं लोग लाखों, बढ़ रही नित टैलियाँ।।
संविधानिक विवशता की आड़ में सब मौन हैं।
ताक पर रख दी गयी हैं ज्ञान की सब थैलियाँ।।
है कहाँ परवाह किसको, इस सियासी खेल में।
कौन बीमारी लिये है, आज धक्कम-पेल में।।
चुटकियों में बदल सकती, हैं जहाँ धारा कई।
हो रहे हैं खेल घाती वहाँ रेलम-रेल में।।
मौन हैं कानूनविद सब, मौन हैं सब कचहरी।
बाज सी हैं नजर पद पर, बने हैं सब गिलहरी।।
हैं कबूतर से बने बैठे सियासी भेड़िये।
नैन में पाले हुए हैं, ख़ाब सारे सुनहरी।।
29/4/21 ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 11 November 2021
छठ पूजा पर
(दुर्मिल सवैया छंद)
(1) छठ पूजा पर
पत्नी पति से कहतीं सजना, कब आवत हो छठ आय गयी।
तुम आ न सके पछिले हफ्ते, मन दीपक जोत जराय गयी।
छठ पूजन में नहिं छूट तुहें, दउरा फल, सूप मँगाय लयी।
फटही सरिया नहिं घाट चलूँ, नवकी सरिया ह किनाय लयी।।
10/11/21 ~अजय 'अजेय'।
(2) बिरह निवेदन
पत्नी पति से कहती सुनिये, अब आप घरे कब आय रहे।
जस भूलि गए अपने जन को, हमको अस खूब सताय रहे।
जब आय रहे पिछले बरिसौं, मनको तुम खूब लुभाय रहे।
कुछ भूल भई हमसे जदि तो, अब माफ करो सिर नाय रहे।।
मन आकुल है अब लौटि परो, हम कान धरै लखते रहिया।
करि याद रहे बचवा-बचिया, मन भाय न दूध न ही दहिया।
तुमसे हमरी मुस्कान सजे, तुमसे हरषाय हमार जिया।
तुम जीवन के इन्जन सम हो, हम हैं जिसके पन्चर पहिया।।
11/11/21 ~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 5 October 2021
भटकन
(कामिनी/पद्मिनी छंद)
*भटकन*
लोग भटका गये तुम भटकने लगे,
राह में रोज रोड़े अटकने लगे।
जो पता ही न हो फासलों की वजह,
सामने बैठकर बात हो किस तरह।
हाल में तुम सभी रोटियाँ सेंक लो,
जो बने हैं नियम फाड़कर फेंक दो।
बात होगी तभी मान लोगे जभी,
जो न भाये वही राग तुम रेंक दो।
बात कैसे बने सोचते भी नहीं,
बीज कैसे उगे सींचते ही नहीं।
फौज के कारवाँ की कदर ना करो,
पीसफुल आन्दोलन दिखावा करो।
4/10/21 ~अजय 'अजेय'।
तुमने जो होंठों से लगाए थे
तुमने जो होंठों से लगाए थे,
हमने वो कप सम्भाल रखे हैं।
भेजे जिनमें खत तुमने हमको,
लिफाफे सब सम्भाल रखे हैं।
पोंछा था माथे के पसीने को,
हमने वो सारे रूमाल रखे हैं।
और किस तरह इज़हार करें,
शौक हमने भी कमाल रखे हैं।
सोचा सीधे मुलाकात हो जाये,
मगर जालिम ने दलाल रखे हैं।
~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 31 August 2021
रात ! तू भी न सहारा देगी
*रात ! तू भी न सहारा देगी*
न फ़लक पर कोई चाँद, न ही तारा देगी,
बुरे वक्त में ऐ रात ! तू भी न सहारा देगी।
माना कि आज आँधियों का दौर है जारी,
कल की सहर यकीनन खुश-नजारा देगी।
23/8/21 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 4 August 2021
नाटकबाज
नाटकबाज
(चौपाई छंद)
तर्क नहीं जब आता करना,
सबसे बढ़िया दे दें धरना।
बिना बात के भाषण करना,
छननी में जस पानी भरना।।
बुनते रहते ताना-बाना,
इनको बस इल्ज़ाम लगाना।
झाँकें कभी न घर के भीतर,
मान देश का सदा गिराना।।
पल में बहियाँ गले डारते,
भरी सभा में आँख मारते।
मर्यादा की फिकर न इनको,
छीन हाथ से 'मान' फारते।।
सरकारी खरचा करवा दें,
पर संसद को चलने ना दें।
बैठ सायकिल फिरें सड़क पर,
नाटक करने चढ़ें ट्रैक्टर।।
3/8/21 ~अजय 'अजेय'।
Monday, 19 July 2021
गाँव में आपसी सहभागिता
चित्र-लेखन
(घनाक्षरी छंद)
*_गाँव की सहभागिता_*
खेत-खलिहान हल बैल व किसान संग,
खुशी भरपूर कभी वो भी तो जमाना था।
घर घर पशु-धन मेहनत वाले तन,
गोबर के खाद वाला देसी कारखाना था।
बसता था भाई-चारा गाँव में ही ढेर सारा,
एक दूसरे के घर खूब आना जाना था।
दु:ख-सुख सब कुछ मिल जुल बाँटते थे,
एक दूसरे का बोझ मिल के उठाना था।
19/7/21 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 23 June 2021
लापरवाही
लापरवाही
(चौपाई छंद)
छूट मिली तो बाहर आने,
केतनो कहिये बात न मानें।
मुख पर सही मास्क न डारें,
घूमें खुल्ला दाँत चियारें।।
सुने न कोई टोकें कैसे,
लहर तीसरी रोकें कैसे।
बैद-विशारद सब समझावें,
तब्बौ जनता सब बिसरावें।।
आयी थी जब दुसर लहरिया,
मरत रहें जन घरै-दुअरिया।
त्राहि-त्राहि हम करन लगे थे,
गाँठ बाँधि सब धरन लगे थे।।
मिली ढिलाई रास न आवै,
मना करौ पर भीर लगावैं।
आँखें मूँद करें मनमानी,
तीजी लहर बुलाना ठानी।।
23/6/21 ~अजय 'अजेय'।
Monday, 21 June 2021
*पलायन*
चित्र लेखन
(लावणी छंद)
*पलायन*
अगर अकेले हम होते तो,रुक भी जाते बात न थी।
बच्चे थे घरवाली भी थी,रुपयों की सौगात न थी।।
अपने रूठे सपने टूटे,टूटा ताना-बाना जी।
जिसको हम अपना कहते थे,नगर वही बेगाना जी।।
बहुत हुआ अब रोना-धोना,यहाँ-वहाँ का खाना जी।
अब ना रोको नहीं रुकेंगे,हमको है घर जाना जी।।
जान लगा कर करी चाकरी,नहीं मिला हर्जाना जी।
जीना हुआ मुहाल शहर में,मिले न मेहनताना जी।।
23/4/21 ~अजय 'अजेय'।
पूँछ कुत्ते की
(विधाता छंद)
*पूँछ कुत्ते की*
बढ़ रही रोज है गिनती, करोना के मरीजों की।
उठ रही हैं नयी अरथी, पलों पल में अजीजों की।।
मगर कुछ लोग ऐसे हैं, कि जैसे पूँछ कुत्ते की।
खुले मुख हैं निकल आते, नहीं चिन्ता नतीजों की।।
फँसा के पाँव को चलिए, रकाबों का चलन गर है।
ढके रुख ही निकलिये जी, नकाबों का चलन गर है।।
न ही ईनाम ना तमगा, जिसे हासिल करोगे तुम।
वहाँ बचना जरूरी है, उकाबों का चलन गर है।।
(रकाब=घुड़सवार का पायदान, उकाब=हिंसक पक्षी बाज/चील)
19/4/21 ~अजय 'अजेय'।
योग
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मेरा योगदान
(श्रृंगार छंद)
*योग*
बनाता है मन को नीरोग।
भगाता है जो तन से रोग।।
नहीं है किसी धर्म का योग।
करें नित इसका सब उपयोग।।
न इससे अपना नाता तोड़।
योग को नहीं धर्म से जोड़।।
योग का तो मतलब ही जोड़।
अपना कर इसको रस निचोड़।।
21/6/21 ~अजय 'अजेय'।
Monday, 3 May 2021
सिपाही
चित्र लेखन
(निश्चल छंद)
सिपाही
जल हो या थल करते कभी न, वे परवाह।
सीमाओं पर डटे रोक कर, अरि की राह।।
देखो कैसे छिप कर के हैं, वे तैनात।
झेल रहे खतरे चाहे हो, दिन या रात।।
25/3/21 ~अजय 'अजेय'।
होली दोहावली
सभी को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें----
होली-दोहावली
दहन कीजिए भेद सब, इस होली के संग।
मिट जायें शिकवे गिले,मिटे आपसी जंग।।
प्रेम-रंग रंग दीजिए, सारा भारत देश।
बसे स्नेह हर हृदय में, रहे न कोई द्वेष।।
28 मार्च 21 ~अजय 'अजेय '।
महाशिवरात्रि के शिव
*_महाशिवरात्रि के शिव_*
(सरसी छंद)
मंदिर मंदिर भीर लगी है, शिव जी रहे नहाय।
कोई जल से नहलाता है, कोई दूध चढ़ाय।
दही लिपाये कोई लेकर, कोई बेर खिलाय।
कोई लाया भाँग-धतूरा, कोई शहद चटाय।
भोले-भाले भोले बाबा, सबको रहे लुभाय।
राजा रंक सभी के भोले, पल में जात रिझाय।
सबसे अलग देवता मेरो, अड़भंगी कहलाय।
सर पर गंगा चाँद भाल पर, साँप गले लटकाय।
10/03/21 ~अजय 'अजेय'।
मौसम परिवर्तन
कुण्डलिया छंद
मौसम परिवर्तन
सर्द हवायें कम हुईं, कंबल नहीं सहात।
स्वेटर दस्ताने हटे, दोहर लागै रात।।
दोहर लागै रात, रजाई धूप सेंकतीं।
तेज चाल पर देह,पसीने बूंद फेंकतीं।।
मौसम का बदलाव, उड़ाती गर्द बतायें।
फागुन में अलोपित, होती शीत हवायें।।
02/03/21 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 24 March 2021
मुंबई के रखवाले
मुंबई के रखवाले
(घनाक्षरी छंद)
भर कर जिलेटिन कार खड़ी कर गए,
रखवाले घर के ही घर को उड़ाने को।
पकड़े गए हैं सब जान फँस गई तब,
झूठ पर झूठ अब गढ़े हैं सुनाने को।
पद से निकल गए अब हैं बिफ़र गए,
डीजीपी जी चले अब राज ये बताने को।
एक सौ करोड़ प्रति माह लाओ कहते थे,
मजबूर हम भए पद को बचाने को।
23/3/21 अजय 'अजेय'।
Sunday, 17 January 2021
सौगात-ए-मरक़ज
*_रूपमाला छंद_*
सौगात-ए-मरक़ज़
देश-हित को ताक पर रख, कर रहे हैं घात।
देश-हित की नीतियों पर, कर रहे आघात।।
बोलिए जी हम उतारें, आरती ले दीप ?
या कि उनकी फितरतों को, दें करारी मात।।
करी विनती और देखा, जोड़ कर के हाथ।
समझते थे हम कि देंगे, वे हमारा साथ।।
तोड़ कर विश्वास भागे, मजहबी हज़रात।
बाँटते वे फिर रहे हैं, मौत की सौगात।।
२१/४/२०। ~अजय 'अजेय'।
Monday, 30 March 2020
लाॅकडाउन का असर
लॉकडाउन इंपैक्ट...
(भोजपूरी रचना)
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम घरे पोचा लगा लs।
पोचा लगा लs, बाबु पोचा लगा लs ...
कोरोना से सबके बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कहेलें मोदीजी तनी राखs हो सफ़ाई,
एकइस दिन ले कौनों बाई नाहीं आई।
पानी में डिटोलवा मिला लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
बहियाँ पिराता, हमरी गोड़े आइल मोचा,
लाॅकडाउन कइ दिहलस बड़हन लोचा।
घरे तनि हाथ तूँ बटा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
करफू लगल बंद भईली बजरिया,
मिली फल, रासन, दवा, दूध, तरकरिया।
फ़ोनवे से सउदा मँगा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
केहू से ना मिलs, मति हथवा मिलावs,
हमहूँ से दूरे रहs, नियरे न आव आवs।
साबुन से हाथ गजुआ लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
घरहीं में रहs, जनि निकलs तू बहरा।
गली-गली बइठल बा पुलिसे के पहरा।।
हाथ-गोड़ आपन तूँ बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कोरोना से जान तूँ बचा लs...
बलम घरे पोचा लगा लs...
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम जी पोचा लगा लs।
३०/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
(भोजपूरी रचना)
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम घरे पोचा लगा लs।
पोचा लगा लs, बाबु पोचा लगा लs ...
कोरोना से सबके बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कहेलें मोदीजी तनी राखs हो सफ़ाई,
एकइस दिन ले कौनों बाई नाहीं आई।
पानी में डिटोलवा मिला लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
बहियाँ पिराता, हमरी गोड़े आइल मोचा,
लाॅकडाउन कइ दिहलस बड़हन लोचा।
घरे तनि हाथ तूँ बटा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
करफू लगल बंद भईली बजरिया,
मिली फल, रासन, दवा, दूध, तरकरिया।
फ़ोनवे से सउदा मँगा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
केहू से ना मिलs, मति हथवा मिलावs,
हमहूँ से दूरे रहs, नियरे न आव आवs।
साबुन से हाथ गजुआ लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
घरहीं में रहs, जनि निकलs तू बहरा।
गली-गली बइठल बा पुलिसे के पहरा।।
हाथ-गोड़ आपन तूँ बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।
कोरोना से जान तूँ बचा लs...
बलम घरे पोचा लगा लs...
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम जी पोचा लगा लs।
३०/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
Wednesday, 25 March 2020
कोरोना का क्रोध
दोहावली...
झेल रहा जो विश्व है, कोरोना का दंश।
वह कोरोना और ना, है 'करुणा' का अंश।।
मूक जंतुओं को रहे, मानव-दानव भक्ष।
कोरोना बन आ गये, करने 'करुणा' रक्ष।।
चूहे चिमगादड़ रहे, बनते जिनके भोज।
'करुणा' उनको खा गए , पकरि पकरि के रोज।।
रेत रहे थे मुर्ग़ियाँ, नोच रहे थे पाँख।
छट-पट करती आत्मा, रोती भरि-भरि आँख।।
बंद हुये धंधे सभी, जहाँ पके था माँस।
मुख से जब रोटी छिनी, तभी भया अहसास।।
मिल-जुल सब जंतू गये, संत करोना धाम ।
तप करने सब लग गये, त्राहि त्राहि करि माम्।।
तिलचट्टे दादुर झिंगुर, मूषक मछरी श्वान।
नतमस्तक होकर खड़े, धारित मन भगवान।।
'करुणा' तब परगट भये, हर्षित होकर नाथ।
वर मुद्रा में उठ गये, माथ जंतु धरि हाथ।।
बोले माँगो वत्स वर, कहहु पीर समुझाय।
हर लूँगा तव पीर सब, होकर अभी सहाय।।
बिलखि कहें सब जन्तु-जन, मानव भूला रीत।
कॉंच चबायें जंतु को, हुए नाथ भयभीत।।
करुणा जी ने वर दिया, होकर निर्भय शेष।
जाओ घर मैं आ रहा, धरि 'कोरोना' भेष।।
हमने मानव को दिया, जीव-दया का भाव।
वह अभिमानी हो गया, रखने लगा दुराव।।
मानव गर 'मद' चूर है, खाता दुर्बल जीव।
नहिं उसकी अब खैर है, हिल जायेगी नीव।।
अमरीका हो रूस हो, या हो इटली, चीन।
अब उतरुँगा मैं धरा, मानव होगा दीन।।
भारत को भी ज्ञात हो, चेतेगा तो ठीक।
दया-भाव मन में रहे, भोजन राखे नीक।।
पश्चिम पीछे भाग मत, खोकर सकल विवेक।
उनकी अपनी सोच है, तेरी अपनी नेक।।
जीवों पर मत जुल्म कर, मत बन झूठा बीर।
भोजन तो भरपूर है, धार जीभ पर धीर।।
आया हूँ बन त्रासदी, ले ले मेरी सीख।
नवरात्री से बीस दिन, बाहर ना तू दीख।।
२५/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
झेल रहा जो विश्व है, कोरोना का दंश।
वह कोरोना और ना, है 'करुणा' का अंश।।
मूक जंतुओं को रहे, मानव-दानव भक्ष।
कोरोना बन आ गये, करने 'करुणा' रक्ष।।
चूहे चिमगादड़ रहे, बनते जिनके भोज।
'करुणा' उनको खा गए , पकरि पकरि के रोज।।
रेत रहे थे मुर्ग़ियाँ, नोच रहे थे पाँख।
छट-पट करती आत्मा, रोती भरि-भरि आँख।।
बंद हुये धंधे सभी, जहाँ पके था माँस।
मुख से जब रोटी छिनी, तभी भया अहसास।।
मिल-जुल सब जंतू गये, संत करोना धाम ।
तप करने सब लग गये, त्राहि त्राहि करि माम्।।
तिलचट्टे दादुर झिंगुर, मूषक मछरी श्वान।
नतमस्तक होकर खड़े, धारित मन भगवान।।
'करुणा' तब परगट भये, हर्षित होकर नाथ।
वर मुद्रा में उठ गये, माथ जंतु धरि हाथ।।
बोले माँगो वत्स वर, कहहु पीर समुझाय।
हर लूँगा तव पीर सब, होकर अभी सहाय।।
बिलखि कहें सब जन्तु-जन, मानव भूला रीत।
कॉंच चबायें जंतु को, हुए नाथ भयभीत।।
करुणा जी ने वर दिया, होकर निर्भय शेष।
जाओ घर मैं आ रहा, धरि 'कोरोना' भेष।।
हमने मानव को दिया, जीव-दया का भाव।
वह अभिमानी हो गया, रखने लगा दुराव।।
मानव गर 'मद' चूर है, खाता दुर्बल जीव।
नहिं उसकी अब खैर है, हिल जायेगी नीव।।
अमरीका हो रूस हो, या हो इटली, चीन।
अब उतरुँगा मैं धरा, मानव होगा दीन।।
भारत को भी ज्ञात हो, चेतेगा तो ठीक।
दया-भाव मन में रहे, भोजन राखे नीक।।
पश्चिम पीछे भाग मत, खोकर सकल विवेक।
उनकी अपनी सोच है, तेरी अपनी नेक।।
जीवों पर मत जुल्म कर, मत बन झूठा बीर।
भोजन तो भरपूर है, धार जीभ पर धीर।।
आया हूँ बन त्रासदी, ले ले मेरी सीख।
नवरात्री से बीस दिन, बाहर ना तू दीख।।
२५/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।
Sunday, 8 March 2020
Saturday, 11 January 2020
हिन्दी हमारी
विश्व हिन्दी दिवस-१० जनवरी पर मेरी रचना राष्ट्रभाषा को समर्पित
हिन्दी हमारी...
जुड़े नहीं जो तार वही, मैं आज मिलाने आया हूँ।
अब तक नहीं पढ़े जो तुम, अखबार पढ़ाने आया हूँ।।
"दिवस विश्व-हिन्दी" का मैं, त्यौहार मनाने आया हूँ।
चलो मातृभाषा का मैं रखवार बनाने आया हूँ।।
अंग्रेजी बस गिट-पिट गिट-पिट, हिन्दी घर की भाषा है।
घरवाले ही भूले इसको, कैसा खेल-तमाशा है।।
किसको दें हम दोष यहाँ पर, गहरी बढ़ी निराशा है।
लेकिन कैसे हार मान लूँ, मुझको अब भी आशा है।।
योगदान यदि करो जरा तुम,परचम ये लहरायेगी।
पाँच मात्रा वालों को यह, पल में धूल चटायेगी।।
मातृभूमि में माता-भाषा जब दुलार पा जायेगी।
है सशक्त यह भाषा मेरी, "विश्व-भाष" बन जायेगी।।
१०/०१/२० ~अजय 'अजेय'।
हिन्दी हमारी...
जुड़े नहीं जो तार वही, मैं आज मिलाने आया हूँ।
अब तक नहीं पढ़े जो तुम, अखबार पढ़ाने आया हूँ।।
"दिवस विश्व-हिन्दी" का मैं, त्यौहार मनाने आया हूँ।
चलो मातृभाषा का मैं रखवार बनाने आया हूँ।।
अंग्रेजी बस गिट-पिट गिट-पिट, हिन्दी घर की भाषा है।
घरवाले ही भूले इसको, कैसा खेल-तमाशा है।।
किसको दें हम दोष यहाँ पर, गहरी बढ़ी निराशा है।
लेकिन कैसे हार मान लूँ, मुझको अब भी आशा है।।
योगदान यदि करो जरा तुम,परचम ये लहरायेगी।
पाँच मात्रा वालों को यह, पल में धूल चटायेगी।।
मातृभूमि में माता-भाषा जब दुलार पा जायेगी।
है सशक्त यह भाषा मेरी, "विश्व-भाष" बन जायेगी।।
१०/०१/२० ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 8 January 2020
गीतिका छंद
गीतिका छंद
१. जै जवान जै किसान...
पूस की शीतल हवा से, हाड़ हिलने लग गये।
बर्फ की चादर बिछी, लीहाफ़ सिलने लग गये।।
जै किसानों जै जवानों, तुम डटे जो काम पर।
आमजन से आपको आदाब मिलने लग गये।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
२. विद्या संस्थान के हंगामे...
पाट कर के खाइयाँ गर, साथ दो तो राह है।
हाथ हाथों में रहें ये,आम जन की चाह है।।
बात सब ने आप की थी, आपको कहने दिया।
लाठियों ने कब किसी को, चैन से रहने दिया।
८/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
३. जे एन यू के शिक्षार्थी से...
याद है जब तुम गये थे गाँव घर को छोड़कर।
छोड़कर के ज्ञान राहें खो गये किस मोड़ पर।।
भूल मत जाना पिता जी के सजाये खाब को।
फीस के पैसे भिजाए हड्डियों कोै तोड़कर।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
१. जै जवान जै किसान...
पूस की शीतल हवा से, हाड़ हिलने लग गये।
बर्फ की चादर बिछी, लीहाफ़ सिलने लग गये।।
जै किसानों जै जवानों, तुम डटे जो काम पर।
आमजन से आपको आदाब मिलने लग गये।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
२. विद्या संस्थान के हंगामे...
पाट कर के खाइयाँ गर, साथ दो तो राह है।
हाथ हाथों में रहें ये,आम जन की चाह है।।
बात सब ने आप की थी, आपको कहने दिया।
लाठियों ने कब किसी को, चैन से रहने दिया।
८/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
३. जे एन यू के शिक्षार्थी से...
याद है जब तुम गये थे गाँव घर को छोड़कर।
छोड़कर के ज्ञान राहें खो गये किस मोड़ पर।।
भूल मत जाना पिता जी के सजाये खाब को।
फीस के पैसे भिजाए हड्डियों कोै तोड़कर।।
८/१/२० ~अजय 'अजेय'।
लावणी छंद
शिक्षा का राजनीतिकरण...
लावणी छंद
शिक्षा का राजनीतिकरण
विद्यालय में पढ़ने आये, या हंगामा करने को।
तख्ती लेकर निकल पड़े हो, सारे गा मा करने को।।
माता और पिता ने भेजा, तुमको विद्या पाने को।
तुम लक्ष्यों को दरकिनार कर, निकलें ड्रामा करने को।।
कोई कर में डण्डा थामे, चेहरा ढक कर निकला है।
मार कुटाई मची हुई है, जाने कैसा घपला है।।
किसने किसका हाथ मरोड़ा, कौन बन गया अबला है।
किसने किसके सर को फोड़ा, राजनीति का मसला है।।
७/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
लावणी छंद
शिक्षा का राजनीतिकरण
विद्यालय में पढ़ने आये, या हंगामा करने को।
तख्ती लेकर निकल पड़े हो, सारे गा मा करने को।।
माता और पिता ने भेजा, तुमको विद्या पाने को।
तुम लक्ष्यों को दरकिनार कर, निकलें ड्रामा करने को।।
कोई कर में डण्डा थामे, चेहरा ढक कर निकला है।
मार कुटाई मची हुई है, जाने कैसा घपला है।।
किसने किसका हाथ मरोड़ा, कौन बन गया अबला है।
किसने किसके सर को फोड़ा, राजनीति का मसला है।।
७/१/२० ~~~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 31 December 2019
सार छंद
सार छंद...
(१) हैपी क्रिसमस
मदिरा की मस्ती में खोकर, डोल रहे मतवारे।
हैपी होकर हैपी *क्रिसमस, बोल रहे हैं सारे।।
केक बिचारा पूछ रहा है, मेरी ग़लती का रे ?
खुद ख़ुश होकर काट देत हो, मेरी गरदन वा रे !
(२)बे बात की बात
क़ौम-धरम का जाम चखा कर, बहका रहे उवैसी।
ममता 'छी-छी' करती घूमे, हालत होती कैसी।।
पत्थर मारो, आग लगाओ, कैसी डेमोक्रैसी।
बे बातों की बात बनायें, उनकी ऐसी-तैसी ।।
२६/१२/१९ ~~~ अजय 'अजेय'।
(१) हैपी क्रिसमस
मदिरा की मस्ती में खोकर, डोल रहे मतवारे।
हैपी होकर हैपी *क्रिसमस, बोल रहे हैं सारे।।
केक बिचारा पूछ रहा है, मेरी ग़लती का रे ?
खुद ख़ुश होकर काट देत हो, मेरी गरदन वा रे !
(२)बे बात की बात
क़ौम-धरम का जाम चखा कर, बहका रहे उवैसी।
ममता 'छी-छी' करती घूमे, हालत होती कैसी।।
पत्थर मारो, आग लगाओ, कैसी डेमोक्रैसी।
बे बातों की बात बनायें, उनकी ऐसी-तैसी ।।
२६/१२/१९ ~~~ अजय 'अजेय'।
Tuesday, 24 December 2019
दोहा छंद
दोहा छंद...
सुनो सी यम जी...
पी यम अपना कर रहे, तुम को अपना काज।
हाथ खुजाते रहो गर, नहीं करोगे आज।।
पी यम के सर देश है, शेष तिहारे नाम।
साया उसका छोड़कर, खुद भी कर लो काम।।
कहाँ-कहाँ वह खड़ा हो, कहाँ-कहाँ दे साथ।
तेरे अपने पाँव हैं, तेरे भी हैं हाथ।।
कब तक ढुलमुल चलोगे, थामे मोदी हाथ।
अपने पाँव बढ़ाइए, मजबूती के साथ।।
मोदी बैठे बीच में, दिखा रहे हैं राह।
गाँवन के तुम रहनुमा, जीतो जन की वाह।।
सेंगर जैसों से परे, रखिये सोच विचार।
यूँ लगाम कसिये तनिक, होय न अत्याचार।।
२३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय' ।
सुनो सी यम जी...
पी यम अपना कर रहे, तुम को अपना काज।
हाथ खुजाते रहो गर, नहीं करोगे आज।।
पी यम के सर देश है, शेष तिहारे नाम।
साया उसका छोड़कर, खुद भी कर लो काम।।
कहाँ-कहाँ वह खड़ा हो, कहाँ-कहाँ दे साथ।
तेरे अपने पाँव हैं, तेरे भी हैं हाथ।।
कब तक ढुलमुल चलोगे, थामे मोदी हाथ।
अपने पाँव बढ़ाइए, मजबूती के साथ।।
मोदी बैठे बीच में, दिखा रहे हैं राह।
गाँवन के तुम रहनुमा, जीतो जन की वाह।।
सेंगर जैसों से परे, रखिये सोच विचार।
यूँ लगाम कसिये तनिक, होय न अत्याचार।।
२३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय' ।
Saturday, 14 December 2019
चौपई छंद - दिशा की बात
'दिशा' की बात...
(चौपई छंद)
आज उठेगी फिर से लाश।
जीवन है या सूखी घास ?
जिन्ह मर्जी तेहिं फूँक दिया।
हाथ सेंकने की धरि आस।।
तुमको भेजा था उस *द्वार।
पहना कर वोटों का हार।।
बतलाना तुम मेरी बात।
तुम तो भूल गये सब यार।।
बेटी मेरी रोई आज।
पूछे कैसा है यह राज।।
निकली मैं जब घर से पापा।
देखे ताक लगाए 'बाज'।।
बिटिया मुझसे बोली बात।
उस दिन जो अंकल थे साथ।।
उनको पूछो चुप क्यों हैं।
बैठे धरे हाथ पर हाथ।।
१४/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(चौपई छंद)
आज उठेगी फिर से लाश।
जीवन है या सूखी घास ?
जिन्ह मर्जी तेहिं फूँक दिया।
हाथ सेंकने की धरि आस।।
तुमको भेजा था उस *द्वार।
पहना कर वोटों का हार।।
बतलाना तुम मेरी बात।
तुम तो भूल गये सब यार।।
बेटी मेरी रोई आज।
पूछे कैसा है यह राज।।
निकली मैं जब घर से पापा।
देखे ताक लगाए 'बाज'।।
बिटिया मुझसे बोली बात।
उस दिन जो अंकल थे साथ।।
उनको पूछो चुप क्यों हैं।
बैठे धरे हाथ पर हाथ।।
१४/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
Monday, 9 December 2019
चौपई छंद
चौपई छंद
*_(ना)पाकी _* खेल
(१)
चले न उनके कोई दाँव।
जहाँ जाँय खायें बेभाव।।
दिखा रहे अब झूठे ताव।
कहीं डूब ना जाये नाव।।
(२)
बना दिया तुझको परधान।
अब तू दे मुझको वरदान।।
मैंने पीठ खुजा दी ख़ान।
तेरी बारी है तू जान।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(३)
सुनो सुनो आई आवाज।
मौनी बाबा बोले आज।।
नरसिम्हा पर ठेली गाज।
दबे दबे कुछ खोले राज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(४)
पप्पू जी को उभरी खाज।
चले खुजाने फिर से आज।
कर डाला भारत को नँग।
बलत्कार का देकर ताज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
*_(ना)पाकी _* खेल
(१)
चले न उनके कोई दाँव।
जहाँ जाँय खायें बेभाव।।
दिखा रहे अब झूठे ताव।
कहीं डूब ना जाये नाव।।
(२)
बना दिया तुझको परधान।
अब तू दे मुझको वरदान।।
मैंने पीठ खुजा दी ख़ान।
तेरी बारी है तू जान।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(३)
सुनो सुनो आई आवाज।
मौनी बाबा बोले आज।।
नरसिम्हा पर ठेली गाज।
दबे दबे कुछ खोले राज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
(४)
पप्पू जी को उभरी खाज।
चले खुजाने फिर से आज।
कर डाला भारत को नँग।
बलत्कार का देकर ताज।।
०८/१२/१९ ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 5 December 2019
एक बेटी फिर मरी (रजनी छंद)
एक बेटी फिर मरी
(रजनी छंद)
हाल ऐसा हो गया हम सह नहीं पाते।
चाहते हैं हम मगर चुप रह नहीं पाते।
रोज लुटती बेटियों की अस्मिता देखी।
वेदना हिय की किसी से कह नहीं पाते।
निर्भया के पीर से पैदा हुई थी वो।
आन्दोलित हो गयी माँ भारती थी जो।
भूल कर के पीर अपनी वह गयी फिर सो।
कुंभकरणी नींद कैसे आ गयी उसको।
फिर सियासत में जरा सी सुगबुगाहट है।
हैं दिशायें सड़क पर तो भुनभुनाहट है।
एक बेटी फिर मरी तब बौखलाहट है।
सख्त होने में न जाने *क्या रुकावट है।
आ गयी है वो घड़ी जब फैसला हो ये।
जो करें अपराध उनको देश न ढोये।
हों फटाफट फैसले उनके गुनाहों पे।
दोषियों की सूलियों पर देश न रोये।
फाँसियों की डोर झट बँध जाय गरदन में।
हो नहीं देरी विधिक या व्यर्थ क्रंदन में।
पकड़ लायें आसमाँ से या जहाँ भी हों।
हो मुखर संदेश सारा विश्व-बँधन में।
०३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
(रजनी छंद)
हाल ऐसा हो गया हम सह नहीं पाते।
चाहते हैं हम मगर चुप रह नहीं पाते।
रोज लुटती बेटियों की अस्मिता देखी।
वेदना हिय की किसी से कह नहीं पाते।
निर्भया के पीर से पैदा हुई थी वो।
आन्दोलित हो गयी माँ भारती थी जो।
भूल कर के पीर अपनी वह गयी फिर सो।
कुंभकरणी नींद कैसे आ गयी उसको।
फिर सियासत में जरा सी सुगबुगाहट है।
हैं दिशायें सड़क पर तो भुनभुनाहट है।
एक बेटी फिर मरी तब बौखलाहट है।
सख्त होने में न जाने *क्या रुकावट है।
आ गयी है वो घड़ी जब फैसला हो ये।
जो करें अपराध उनको देश न ढोये।
हों फटाफट फैसले उनके गुनाहों पे।
दोषियों की सूलियों पर देश न रोये।
फाँसियों की डोर झट बँध जाय गरदन में।
हो नहीं देरी विधिक या व्यर्थ क्रंदन में।
पकड़ लायें आसमाँ से या जहाँ भी हों।
हो मुखर संदेश सारा विश्व-बँधन में।
०३/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 4 December 2019
दिशा का अंत (दुर्मिल सवैया)
दिशा का अंत
(दुर्मिल सवैया)
टुकड़े-टुकड़े कर के दिल के, मन को, तन को, झुलसाय गये।
इनसान नहीं, बलवान नहीं, भगवानहुँ को बिसराय गये।
छण की, पल की, तन की खुशियाँ, हथियावन को पगलाय गये।
खिलती, हँसती, उड़ती चिड़िया, धरि आगहि भूनि के ढाय गये।।
०४/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
(दुर्मिल सवैया)
टुकड़े-टुकड़े कर के दिल के, मन को, तन को, झुलसाय गये।
इनसान नहीं, बलवान नहीं, भगवानहुँ को बिसराय गये।
छण की, पल की, तन की खुशियाँ, हथियावन को पगलाय गये।
खिलती, हँसती, उड़ती चिड़िया, धरि आगहि भूनि के ढाय गये।।
०४/१२/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
Sunday, 1 December 2019
चित्र लेखन (दोहे) - एकता में बल
चित्र लेखन - एकता में बल...
👉🏻
(दोहे) (१)
जरा सहारा जो दिया, छप्पर लिया छवाय।
तिनका तिनका जब जुटे, शक्तिमान हो जाय।।
एक अंगुरिया देखि के, दुश्मन डरे न भाय।
पाँच जोरि मुक्का बने, जो देखे भय खाय।।
बूंँद अकेली नीर की, प्यास बुझा न पाय।
बू्ँद-बूँद एकत्र हो, लोटा भरि-भरि जाय।।
२९/११/१९। ~~~अजय'अजेय'।
चित्र-लेखन - माटी कहे कुँहार से...
(दोहे)
माटी कहे कुँहार से, बंद करो ये झाम।
जीना है यदि चैन से, पकड़ो दूजा काम।।
कहाँ पकाओगे मुझे, ना महुआ ना आम।
बाग बगीचे कट गये, देखन मिले न घाम।।
दीये कौन खरीदता, चीनी लड़ियाँ आम।
रखो चाक यह ताक पर, सुमिरो रक्षक राम।।
तीसी-सरसों न दिखें, खेत बन रहे धाम।
कौन जराये तेल जब, घी से मँहगा पाम।।
ऐ मालिक तज नेह मम्, लो मेरा पैगाम।
मेरी चिंता छोड़कर, कर लो शहर पयाम।।
मैं तो रज इस गाँव की, जी लूँगी हर दाम।
तुमको बालक पालने, लखो आप परिणाम।।
२/२/२०२० ~अजय 'अजेय'
👉🏻
(दोहे) (१)
जरा सहारा जो दिया, छप्पर लिया छवाय।
तिनका तिनका जब जुटे, शक्तिमान हो जाय।।
एक अंगुरिया देखि के, दुश्मन डरे न भाय।
पाँच जोरि मुक्का बने, जो देखे भय खाय।।
बूंँद अकेली नीर की, प्यास बुझा न पाय।
बू्ँद-बूँद एकत्र हो, लोटा भरि-भरि जाय।।
२९/११/१९। ~~~अजय'अजेय'।
चित्र-लेखन - माटी कहे कुँहार से...
(दोहे)
माटी कहे कुँहार से, बंद करो ये झाम।
जीना है यदि चैन से, पकड़ो दूजा काम।।
कहाँ पकाओगे मुझे, ना महुआ ना आम।
बाग बगीचे कट गये, देखन मिले न घाम।।
दीये कौन खरीदता, चीनी लड़ियाँ आम।
रखो चाक यह ताक पर, सुमिरो रक्षक राम।।
तीसी-सरसों न दिखें, खेत बन रहे धाम।
कौन जराये तेल जब, घी से मँहगा पाम।।
ऐ मालिक तज नेह मम्, लो मेरा पैगाम।
मेरी चिंता छोड़कर, कर लो शहर पयाम।।
मैं तो रज इस गाँव की, जी लूँगी हर दाम।
तुमको बालक पालने, लखो आप परिणाम।।
२/२/२०२० ~अजय 'अजेय'
Thursday, 28 November 2019
घनाक्षरी छंद - तमाशा-ए-महाराष्ट्र
(घनाक्षरी छंद में एक प्रयास)
*तमाशा-ए-महाराष्ट्र*
खतम उठा-पटक हुई महाराष्ट्र में,
कृष्ण बन ऊधो जी को कुरसी थमाई है।
देवइन्द्र-कोशियारी जी की होशियारी वाली,
जुगति-जुगाड़ कोई काम नहीं आयी है।
नट-बोल्ट कस कर तीन चक्के फंँस कर,
भेद भाव भूल सरकार बनवाई है।
सचल रहेगी ये आघाड़ी पूरे पाँच साल,
या कि इस गाड़ी ने उमर लघु पाई है।
२८/११/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
कृष्ण बन ऊधो जी को कुरसी थमाई है।
देवइन्द्र-कोशियारी जी की होशियारी वाली,
जुगति-जुगाड़ कोई काम नहीं आयी है।
नट-बोल्ट कस कर तीन चक्के फंँस कर,
भेद भाव भूल सरकार बनवाई है।
सचल रहेगी ये आघाड़ी पूरे पाँच साल,
या कि इस गाड़ी ने उमर लघु पाई है।
२८/११/१९ ~~~अजय 'अजेय'।
Monday, 25 November 2019
मधु छंद - वायु विषैली
"मधु" छंद में एक प्रयास :-
वायु विषैल भई इंह भारी।
साँझ सबेर भखैं नर नारी।
दोष कहाँ इसमें सरकारी।
मानत नाहिं, जराइ पुआरी।
रोय रहे शहरी घर-बारी।
पाथर ईंट पिसे धुंइधारी।
साँस न खींच सकैं अब सारी।
खाँसत-ठाँसत बढै़ बिमारी।
25/11/19 ~अजय 'अजेय'।
वायु विषैल भई इंह भारी।
साँझ सबेर भखैं नर नारी।
दोष कहाँ इसमें सरकारी।
मानत नाहिं, जराइ पुआरी।
रोय रहे शहरी घर-बारी।
पाथर ईंट पिसे धुंइधारी।
साँस न खींच सकैं अब सारी।
खाँसत-ठाँसत बढै़ बिमारी।
25/11/19 ~अजय 'अजेय'।
चित्र लेखन (मधुमालती छंद) - रंगीन बिस्तर

चित्र लेखन
(मधुमालती छंद)
रंगीन बिस्तर लग गया।
है गाँव में उत्सव नया।
महमान आयेंगे नये।
लो गाँव सारा सज गया।।
२३/११/१९ ~अजय 'अजेय'।
*विधाता छंद* में एक प्रयास:-
बिछाकर चादरें तकिया,लुभाने की तयारी है।
बिगड़ती बात बनने की, सभी को इंतजारी है।।
लगे जो देर तो बढ़ने लगी है, मन की आशंका।
बने सरकार या फिर से, वही बेरोजगारी है।।
२४/११/१९ ~अजय 'अजेय'।
Sunday, 13 October 2019
Wednesday, 9 October 2019
शिकायतों का दौर
शिकवों का दौर...
(संशोधित ९/१०/१९)
शब भर लिखी हमने, शिकवा-ए-फे़हरिश्त,
और होश में आते आते, सहर हो गयी।
फिर टूट के गिरे वो, बाहों में मेरे इस कदर,
फेहरिश्त खुद ही धुल के, बेनज़र हो गयी।।
०९ अक्तूबर १३ ~अजय 'अजेय'।
(संशोधित ९/१०/१९)
शब भर लिखी हमने, शिकवा-ए-फे़हरिश्त,
और होश में आते आते, सहर हो गयी।
फिर टूट के गिरे वो, बाहों में मेरे इस कदर,
फेहरिश्त खुद ही धुल के, बेनज़र हो गयी।।
०९ अक्तूबर १३ ~अजय 'अजेय'।
Sunday, 6 October 2019
चित्र लेखन (विधाता छंद) - दिखावा
विधाता छंद - दिखावा... 👉
(१)
जहाँ सब साफ़ होता है,वहाँ झाड़ू घुमाते हो,
सिर्फ फोटो खिंचाने के,लिए नाटक रचाते हो।
सही करनी सफाई हो,चले आओ पटरियों पर,
लगा अंबार कूड़े का,यहाँ हरगिज़ न आते हो।।
(२)
तमाशा,खेल, ये सारा,दिखाकर फूट लेते हैं,
हिला कर झूठ की कूँची,प्रशंसा लूट लेते हैं।
नहीं हमको शिकायत है किसी की नेक नीयत से,
मगर झूठे को* अदरक की तरह भी कूट देते हैं।।
(*मात्रा पतन)
०५/१०/१९ ~अजय 'अजेय'।
(१)
जहाँ सब साफ़ होता है,वहाँ झाड़ू घुमाते हो,
सिर्फ फोटो खिंचाने के,लिए नाटक रचाते हो।
सही करनी सफाई हो,चले आओ पटरियों पर,
लगा अंबार कूड़े का,यहाँ हरगिज़ न आते हो।।
(२)
तमाशा,खेल, ये सारा,दिखाकर फूट लेते हैं,
हिला कर झूठ की कूँची,प्रशंसा लूट लेते हैं।
नहीं हमको शिकायत है किसी की नेक नीयत से,
मगर झूठे को* अदरक की तरह भी कूट देते हैं।।
(*मात्रा पतन)
०५/१०/१९ ~अजय 'अजेय'।
गीतिका छंद - बात अब कहना जरूरी
बात अब कहना जरूरी...
(लाललाला, लाललाला, लाललाला, लालला)
[१]
नासमझ बन आज तक, पुचकारते जिनको रहे,
देख तो लो चाहते वे, राज से किसको रहे।
नींद से जगना जरूरी, हो गया अब दोस्तों,
बात अब कहना जरूरी, हो गया है दोस्तों।।
[२]
नैन जब उनके झुके तो, छूरियाँ दिल पर चलीं,
होंठ होंठों से मिले तो, खिल गयी दिल की कली।
छू गयी थी जो हवा, उस रोज उनकी देह को,
लौट फिर आती, मचा जाती, जहन में खलबली।।
०६/१०/१९. ~अजय 'अजेय'।
(लाललाला, लाललाला, लाललाला, लालला)
[१]
नासमझ बन आज तक, पुचकारते जिनको रहे,
देख तो लो चाहते वे, राज से किसको रहे।
नींद से जगना जरूरी, हो गया अब दोस्तों,
बात अब कहना जरूरी, हो गया है दोस्तों।।
[२]
नैन जब उनके झुके तो, छूरियाँ दिल पर चलीं,
होंठ होंठों से मिले तो, खिल गयी दिल की कली।
छू गयी थी जो हवा, उस रोज उनकी देह को,
लौट फिर आती, मचा जाती, जहन में खलबली।।
०६/१०/१९. ~अजय 'अजेय'।
दोहा-यातायात बनाम मोबाइलाचार
यातायात बनाम मोबाइलाचार...एक मित्र द्वारा भेजे गए एक विडियो को देख कर मन में कुछ भाव जगे जिन्हें कुछ दोहों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ ...
(दोहा)
मोबाइल को जेब धर, घर से निकलो यार।
चलत-चलत ना बात हो, चीख रही सरकार।।
ऐसी आफ़त कौन सी, रुकते नहीं सवार।
टेढ़ी मुंडी करि करें, बात, घात, बेकार ।।
रख विधान सब ताक पर, लाँघत हैं आचार।
अपने भी घाती बनें, सहचर पर भी वार।।
बेवकूफ हैं कम नहीं, है इनकी भरमार।
खोजत निकलो एक को, मिल जायेंगे चार।।
२३-८-१९ ~~~अजय 'अजेय'।
Friday, 19 July 2019
बदलू भैया।
बदलू भैया...
मौसम आया बिकने का अब, तुम भी बदलो बोल।
कल तक जिनको गरियाते थे, पीटो उनके ढोल।।
लाल मिर्च को दफ़न करा लो, मुख में मिश्री घोल।
जीत हुई तो पा जाओगे, तुम भी अपना मोल।।
साढ़े चार बरस तक खाना, मुर्गा मछरी-झोल।
कुर्सी बैठ बनाना जी भर, बातें गोल मटोल।।
तब तक फिर नियरा जायेंगे, नये सत्र के पोल।
दिखला देना तुम फिर से तब, नये फिल्म का रोल।।
15 अप्रैल 2019 ~~~ अजय 'अजेय'।
Friday, 24 May 2019
दौर चुनावी
दौर चुनावी ...
तीर चल रहे आरोपों के,
सीना छलनी करते हैं।
सच्चाई का पता नहीं है,
नये नये नित गढ़ते हैं।।
जनता भी गूंँगी बहरी सी,
सब कुछ ही सह लेती है।
जैसे राग बजा दे टीवी,
वैसे ही बह लेती है।।
कौन सही है कौन गलत है,
किस पर हम विश्वास करें।
हर चेहरा यूँ ब-नकाब है,
किससे कैसी आस करें।।
हर मतदाता उलझन में है,
किस पर अपना हाथ धरे।
किसको वह विजयी भव बोले,
मन से किसका साथ धरे।।
आओ मैं उलझन सुलझा दूँ,
मोहर वहीं लगाना तुम।
जो भारत के हित की सोचे,
विजयी उसे बनाना तुम।।
अपनी अपनी गाय रहे सब,
सच्चे की पहचान करो।
जाति धर्म का भेद भुलाकर,
देशी को मतदान करों।।
20मई 19 ~~~ अजय 'अजेय'।
तीर चल रहे आरोपों के,
सीना छलनी करते हैं।
सच्चाई का पता नहीं है,
नये नये नित गढ़ते हैं।।
जनता भी गूंँगी बहरी सी,
सब कुछ ही सह लेती है।
जैसे राग बजा दे टीवी,
वैसे ही बह लेती है।।
कौन सही है कौन गलत है,
किस पर हम विश्वास करें।
हर चेहरा यूँ ब-नकाब है,
किससे कैसी आस करें।।
हर मतदाता उलझन में है,
किस पर अपना हाथ धरे।
किसको वह विजयी भव बोले,
मन से किसका साथ धरे।।
आओ मैं उलझन सुलझा दूँ,
मोहर वहीं लगाना तुम।
जो भारत के हित की सोचे,
विजयी उसे बनाना तुम।।
अपनी अपनी गाय रहे सब,
सच्चे की पहचान करो।
जाति धर्म का भेद भुलाकर,
देशी को मतदान करों।।
20मई 19 ~~~ अजय 'अजेय'।
Saturday, 27 April 2019
आ गये चुनाव
आ गये चुनाव...
भाग रहे गाँव-गांँव, नेताजी चुनाव में,
चढ़ हेलिकप्टर, कभी रेल कभी नाव में,
भूले सब सुख, साँस लेते नहीं छाँव में,
दुःख नहीं देते, कुछ छाले पड़े पाँव में।
आ गये चुनाव तब, दावतें हैं गाँव में
मलहम पोत रहे, छोटे-छोटे घाव में,
याद करो जिये हम, कितने अभाव में,
देश-हित सर्वोपरि, रखना चुनाव में।
27 अप्रैल 2019 ~~~ अजय 'अजेय'।
भाग रहे गाँव-गांँव, नेताजी चुनाव में,
चढ़ हेलिकप्टर, कभी रेल कभी नाव में,
भूले सब सुख, साँस लेते नहीं छाँव में,
दुःख नहीं देते, कुछ छाले पड़े पाँव में।
कभी गोल टोपी,कभी क्रॉस झलकाते हैं,
मीठी-मीठी गोलियों से मन ललचाते हैं,
सच नहीं हो सकें, वो सपने दिखाते हैं,
गिनती न जाने, उसे गणित पढ़ाते हैं।
मीठी-मीठी गोलियों से मन ललचाते हैं,
सच नहीं हो सकें, वो सपने दिखाते हैं,
गिनती न जाने, उसे गणित पढ़ाते हैं।
राम को न मानें, हनुमान गढ़ी चढ़ते,
रूठे को मनाने, कैलाश तक बढ़ते,
अलिफ़ न जाने, तो भी पाँच बार पढ़ते,
अपने भी इल्ज़ाम, दूसरों पे मढ़ते।
रूठे को मनाने, कैलाश तक बढ़ते,
अलिफ़ न जाने, तो भी पाँच बार पढ़ते,
अपने भी इल्ज़ाम, दूसरों पे मढ़ते।
हर कोई इनमें है, कुर्सी की ताक में,
खाते खुल जायें, स्विस, थाई- बैंकॉक में,
कोई धाये अमरीका, कोई चीन-पाक में,
जोड़-तोड़ हो रहे हैं, आँख डाल आँख में।
खाते खुल जायें, स्विस, थाई- बैंकॉक में,
कोई धाये अमरीका, कोई चीन-पाक में,
जोड़-तोड़ हो रहे हैं, आँख डाल आँख में।
रहना है तुम्हें-हमें साथ साथ गांव में,
बहक न जाना किसी, भेद भरे भाव में,
फँस मत जाना, इन पेंच वाले दांँव में,
समझ से कर लेना, भेद 'गीत' 'काँव' में।
आ गये चुनाव तब, दावतें हैं गाँव में
मलहम पोत रहे, छोटे-छोटे घाव में,
याद करो जिये हम, कितने अभाव में,
देश-हित सर्वोपरि, रखना चुनाव में।
27 अप्रैल 2019 ~~~ अजय 'अजेय'।
Friday, 28 December 2018
फ़र्ज निभाओ
फ़र्ज निभाओ ...
खाया है नमक देश का, अब फ़र्ज निभाओ,
हाथ रख के अपने दिल पे, जरा ये भी बताओ।
आया था लुटेरा तब, क्या साथ लाया था,
लाव-ए-लश्कर में क्या था, जरा पढ़ के बताओ।
साथ थी किसी की अम्मा,कोई बेटी या बहू,
जो कुछ भी था, फ़ेहरिस्त में, वह बांच तो आओ।
क्रूर उन आतताइयों का, युद्ध जब थमा,
कितने गए थे लौट के, तुम गिन के बताओ।
वे टिक गए यहीं थे, व्यभिचार के बूते,
उनसे पहले यह इस्लाम कहाँ था, ये बताओ।
संतान हो उस माँ की जिसने जुल्म सब सहे,
वह 'उफ़्फ़' न कर सकी, जरा यह जान भी जाओ।
थीं बेटियाँ इस घर की, जो डरा दी गयीं,
उनके मौन की पीड़ा को, जरा ज़हन में लाओ।
सहती रहीं, कहतीं किसे, जो पीर थी उनकी,
अब समझ जाओ, फ़क़त अपना राग मत गाओ।
तुम हो हमारे भाई, यह हमको यकीन है,
तुम हिन्द की संतान हो, नीयत से दिखलाओ।
तुमसे हमारा भेद कोई था नहीं, ना है,
तुम भी तो अपने भेद, हम से आज मिटाओ।
क्यों लड़ रहे हो राम से, ज़मीन के लिए,
बाबर के वालिदैन की, वसीयत तो दिखाओ।
28 दिसंबर 2018 ~~~ अजय 'अजेय'।
खाया है नमक देश का, अब फ़र्ज निभाओ,
हाथ रख के अपने दिल पे, जरा ये भी बताओ।
आया था लुटेरा तब, क्या साथ लाया था,
लाव-ए-लश्कर में क्या था, जरा पढ़ के बताओ।
साथ थी किसी की अम्मा,कोई बेटी या बहू,
जो कुछ भी था, फ़ेहरिस्त में, वह बांच तो आओ।
क्रूर उन आतताइयों का, युद्ध जब थमा,
कितने गए थे लौट के, तुम गिन के बताओ।
वे टिक गए यहीं थे, व्यभिचार के बूते,
उनसे पहले यह इस्लाम कहाँ था, ये बताओ।
संतान हो उस माँ की जिसने जुल्म सब सहे,
वह 'उफ़्फ़' न कर सकी, जरा यह जान भी जाओ।
थीं बेटियाँ इस घर की, जो डरा दी गयीं,
उनके मौन की पीड़ा को, जरा ज़हन में लाओ।
सहती रहीं, कहतीं किसे, जो पीर थी उनकी,
अब समझ जाओ, फ़क़त अपना राग मत गाओ।
तुम हो हमारे भाई, यह हमको यकीन है,
तुम हिन्द की संतान हो, नीयत से दिखलाओ।
तुमसे हमारा भेद कोई था नहीं, ना है,
तुम भी तो अपने भेद, हम से आज मिटाओ।
क्यों लड़ रहे हो राम से, ज़मीन के लिए,
बाबर के वालिदैन की, वसीयत तो दिखाओ।
28 दिसंबर 2018 ~~~ अजय 'अजेय'।
Tuesday, 20 November 2018
ऐ वक़्त
ऐ वक़्त...
हो ले जितना भी कठिन,
ऐ वक़्त, मैं हारा नहीं हूँ,
साँस अब भी चल रही है,
मौत को, प्यारा नहीं हूँ।
मत समझ मुझको मृतक-सम,
ईंट या गारा नहीं हूँ,
सूर्य से डर कर छिपूं क्यों,
ताप हूँ, तारा नहीं हूँ।
साथ गर दोगे मेरा तुम,
राह कुछ आसान होगी,
जल हूँ मैं मीठा, नदी का,
जलधि सा, खारा नहीं हूँ।
सांझ हो रही तो भय क्या ?
हूँ दीप, अँधियारा नहीं हूँ,
साथ देना हो तो दो.......,
मोहताज, तुम्हारा नहीं हूँ।
गढ़ूँगा मैं राह अपनी,
मैं स्थिर धारा नहीं हूँ,
पद मेरे जमीन पर हैं,
मद से मैं, ज्वारा नहीं हूँ।
लिखूंगा तकदीर अपनी,
"कर-कलम" के जोर से,
शक्ति से परिपूर्ण हूँ,
तकदीर का, मारा नहीं हूँ।
20 नवंबर 2018 ~~~अजय।
हो ले जितना भी कठिन,
ऐ वक़्त, मैं हारा नहीं हूँ,
साँस अब भी चल रही है,
मौत को, प्यारा नहीं हूँ।
मत समझ मुझको मृतक-सम,
ईंट या गारा नहीं हूँ,
सूर्य से डर कर छिपूं क्यों,
ताप हूँ, तारा नहीं हूँ।
साथ गर दोगे मेरा तुम,
राह कुछ आसान होगी,
जल हूँ मैं मीठा, नदी का,
जलधि सा, खारा नहीं हूँ।
सांझ हो रही तो भय क्या ?
हूँ दीप, अँधियारा नहीं हूँ,
साथ देना हो तो दो.......,
मोहताज, तुम्हारा नहीं हूँ।
गढ़ूँगा मैं राह अपनी,
मैं स्थिर धारा नहीं हूँ,
पद मेरे जमीन पर हैं,
मद से मैं, ज्वारा नहीं हूँ।
लिखूंगा तकदीर अपनी,
"कर-कलम" के जोर से,
शक्ति से परिपूर्ण हूँ,
तकदीर का, मारा नहीं हूँ।
20 नवंबर 2018 ~~~अजय।
Friday, 16 November 2018
भावना की शक्ति
भावना की शक्ति...
मैंने शब्द को, ओठों में सिमटते देखा है,
भाव में डूबे हुए, दिल को सिसकते देखा है,
भावना को कसौटी पर तौलना सीखो यारों,
मैंने भावना से भरे, नयनों को बरसते देखा है।
मैंने भावना में, पाषाण भी पिघलते देखा है,
भाव-शून्यता में, रिश्तों को चटकते देखा है,
भावनाओं की कद्र करना सीख लो यारों,
भावना से, सूखती तुलसी को, पनपते देखा है।
भाव-पूर्ण भक्त को भगवन से लिपटते देखा है,
भाव-हीन दुष्ट को भी संतों से उलझते देखा है,
भावना का भाव समझने से मत चूकना दोस्तों,
भावना के बल तूफाँ से कश्तियाँ निकलते देखा है।
16 नवंबर 2018 ~~~ अजय।
मैंने शब्द को, ओठों में सिमटते देखा है,
भाव में डूबे हुए, दिल को सिसकते देखा है,
भावना को कसौटी पर तौलना सीखो यारों,
मैंने भावना से भरे, नयनों को बरसते देखा है।
मैंने भावना में, पाषाण भी पिघलते देखा है,
भाव-शून्यता में, रिश्तों को चटकते देखा है,
भावनाओं की कद्र करना सीख लो यारों,
भावना से, सूखती तुलसी को, पनपते देखा है।
भाव-पूर्ण भक्त को भगवन से लिपटते देखा है,
भाव-हीन दुष्ट को भी संतों से उलझते देखा है,
भावना का भाव समझने से मत चूकना दोस्तों,
भावना के बल तूफाँ से कश्तियाँ निकलते देखा है।
16 नवंबर 2018 ~~~ अजय।
Tuesday, 6 November 2018
हाल-ए-दिल्ली
हाल-ए-दिल्ली...
जैसे कि हाँफता हुआ, दफ़्तर गया हूँ,
आज फिर, मुश्किल से अपने घर गया हूँ।
बिखरे बमों के बीच,कई दफ़े गुजरा,
मत समझो, बारूद से मैं डर गया हूँ।
है अभी ताज़ी, ...हवाओं की कहानी,
टहलने मैं........ बाग़ के भीतर गया हूँ।
बात करता था मैं, हँसकर लताओं से,
सिसकता उनको भी देख कर गया हूँ।
सिसकता उनको भी देख कर गया हूँ।
वर्ष भर पहले भी आई थी, .....दिवाली,
इस दिवाली वाकई, मैं डर गया हूँ।
दीप के जलने की मुझको है खुशी पर,
सुन पटाखों की मगर, ...सिहर गया हूँ।
क्यों जलाई खेत में बाकी पराली?
देख कर लपटें यहाँ ठहर गया हूँ।
अन्नदाता हम कहा करते हैं तुमको,
प्राण-घाता अब तुम्हें उच्चर गया हूँ।
क्या जलाने में पटाखे, ही, ख़ुशी है?
प्रश्न मैं तुमसे ये आख़िर कर गया हूँ।
ख़ुशियाँ मनाओ ख़ूब, जग रोशन कर दो,
दीये खोजता हुआ, अक्सर गया हूँ।
मैं हूँ पर्यावरण, मैं आहत हूँ बेहद,
अब तो बख्शो जान, आधा मर गया हूँ।
ऐ इंसानों, है नहीं यह युद्ध, धर्मी,
सोचना ! ... मैं क्या निवेदन कर गया हूँ।
06 नवंबर 2018. ~~~अजय।
Saturday, 3 November 2018
अँखिया के पुतरी
अँखिया के पुतरी...
(अँखियों पर एक प्रयास भोजपूरी में भी....)
अपने हियवा में हमके, बसा लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी, बना लs गोरिया।
दरपन निरेखबू त, हमहीं देखाइब,
पलक झुकईबू त, हमहूँ लुकाइब...
अपने गरवा में 'सुतरी' बन्हा लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी बना लs गोरिया।
तोरे आँखी बसेला, हमार ज़िंदगानी,
देखि नाहीं सकीं तोहरे, नयना में पानी,
अपनी देहींया के चुनरी, बना लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी, बना लs गोरिया।
०२ नवम्बर २०१५ ~~~ अजय।
(अँखियों पर एक प्रयास भोजपूरी में भी....)
अपने हियवा में हमके, बसा लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी, बना लs गोरिया।
दरपन निरेखबू त, हमहीं देखाइब,
पलक झुकईबू त, हमहूँ लुकाइब...
अपने गरवा में 'सुतरी' बन्हा लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी बना लs गोरिया।
तोरे आँखी बसेला, हमार ज़िंदगानी,
देखि नाहीं सकीं तोहरे, नयना में पानी,
अपनी देहींया के चुनरी, बना लs गोरिया,
हमके अँखिया के पुतरी, बना लs गोरिया।
०२ नवम्बर २०१५ ~~~ अजय।
Thursday, 11 October 2018
सँवरिया हमार हो गईल
सँवरिया हमार हो गईल...
अँगुरी में डारि के मुंदरिया,
सँवरिया हमार हो गईल।
कवनों काम-काजे,अब मनवां न लागे,
उड़ि मन-तोतवा, उनहिं लगे भागे,
दिनवां न बीते, राति नीनियो न भावे,
केतनो सहेजीं, जिया क़ाबू नाहीं आवे,
जान मारे, चाँद के अँजोरिया,
बैरी....... बयार हो गईल।
बैरनि लागे हमके, फूलवा के बगिया,
जियरा सतावेला, कोईलिया के रगिया,
पूजा में न ध्यान, नाहीं भावे हमरा जगिया,
चादरा,बिछावन, नीक लागे नाहीं तकिया,
गावे लगलीं, सावन में कजरिया,
सँवरिया से प्यार हो गईल।
लिखल-पढ़ल फ़ेल, कवनों बात ना बुझाला,
फिरि-फिरि हियवा का, पियवे सोहाला,
सखियन के साथ, भारी बोझ बनि जाला,
मनवां हमार अब, मने-मन लजाला,
झूकि-झूकि, जाले ई नजरिया,
नयनवा के वार हो गईल।
अंगुरी में डारि के मुंदरिया,
सँवरिया हमार हो गईल।
11 अक्टूबर 2018 ~~~ अजय।
11 अक्टूबर 2018 ~~~ अजय।
Wednesday, 15 August 2018
ये कैसी आज़ादी यारों
ये कैसी आज़ादी यारों...
ये कैसी आज़ादी यारों,
साँस आ रही, पहरों में,
ख़ौफ़ के मंज़र चप्पे-चप्पे,
गली, मुहल्ले, शहरों में।
जुबाँ बधाई बाँट रहीं हैं,
ऊँचे, नीचे, मंचों से,
भय के साये झलक रहे हैं,
जाने अंजाने चेहरों में।
वह यह कह कर अलग हुआ,
मैं नही रहूँगा संग तुम्हारे,
क्यों दावे करता फिरता है,
अब हिम, गिरि, जल, नहरों में।
सीधे-सीधे सामने आकर,
युद्ध नहीं लड़ सकता वह,
तीर चलाता रहता है वो,
बुझे हुये कुछ, ज़हरों में।
सीमाओं पर खड़ा सिपाही,
किस पर किस पर, नज़र रखे,
अपनों में से मिले हुये हैं,
वीभीषण, कुछ ग़ैरों में।
पा सकते हैं हम आज़ादी,
अगर ज़रा कुछ, हम भी कर लें,
"प्रहरी" की नैया को बल दें,
उतरें जब, वे लहरों में।
"काली भेड़ों" के डेरे हैं,
आस हमारे, पास हमारे,
करें उजागर उन डेरों को,
"रखवालों" की नज़रों में।
चाह रहे हो आज़ादी तो,
प्रकट करो "काली भेड़ों" को
कान की ठेपी, चुप्पी तोड़ो,
खड़े हो क्यों, चुप, बहरों में।
15 अगस्त 2018. ~~~ अजय।
ये कैसी आज़ादी यारों,
साँस आ रही, पहरों में,
ख़ौफ़ के मंज़र चप्पे-चप्पे,
गली, मुहल्ले, शहरों में।
जुबाँ बधाई बाँट रहीं हैं,
ऊँचे, नीचे, मंचों से,
भय के साये झलक रहे हैं,
जाने अंजाने चेहरों में।
वह यह कह कर अलग हुआ,
मैं नही रहूँगा संग तुम्हारे,
क्यों दावे करता फिरता है,
अब हिम, गिरि, जल, नहरों में।
सीधे-सीधे सामने आकर,
युद्ध नहीं लड़ सकता वह,
तीर चलाता रहता है वो,
बुझे हुये कुछ, ज़हरों में।
सीमाओं पर खड़ा सिपाही,
किस पर किस पर, नज़र रखे,
अपनों में से मिले हुये हैं,
वीभीषण, कुछ ग़ैरों में।
पा सकते हैं हम आज़ादी,
अगर ज़रा कुछ, हम भी कर लें,
"प्रहरी" की नैया को बल दें,
उतरें जब, वे लहरों में।
"काली भेड़ों" के डेरे हैं,
आस हमारे, पास हमारे,
करें उजागर उन डेरों को,
"रखवालों" की नज़रों में।
चाह रहे हो आज़ादी तो,
प्रकट करो "काली भेड़ों" को
कान की ठेपी, चुप्पी तोड़ो,
खड़े हो क्यों, चुप, बहरों में।
15 अगस्त 2018. ~~~ अजय।
Sunday, 5 August 2018
और प्यार हो तो...
और प्यार हो तो...
यदि जंग हो तो जंग का आचार होना चाहिये,
हो प्यार तो फिर प्यार का इज़हार होना चाहिये,
बहक सकती हैं कभी भी, कश्तियाँ मजधार में,
माँझियों के हाथ में, पतवार होना चाहिये।
रणभूमि की तैयारियों में ढाल ही काफ़ी नहीं,
सूरमा के हाथ में तलवार होना चाहिये।
लड़ रहा है यह सिपाही जान पर भी खेल कर,
साथ इसके देश का परिवार होना चाहिये।
गुलों के ख़ुशबू की चाहत है नहीं किसको भला,
पर गुलों के साथ में कुछ खार होना चाहिये।
मसलने को जो उठें, गर हाथ, कोई पंखुड़ी,
फूल की आवाज़ भी फुफ़कार होना चाहिये।
लूटने को आमादा जो अस्मतें मासूम की,
मुकदमें उनके त्वरित निपटार होना चाहिये।
बेटियाँ सरस्वती, लक्ष्मी, महाकाली बनें,
उनपर न कभी कोई अत्याचार होना चाहिये।
हाथ में जिसने थमा रक्खे हैं पत्थर घात के,
उनके डेरों पर करारा वार होना चाहिये।
सुधर सकती हैं बड़ी से बड़ी भी कुछ ग़लतियाँ,
शर्त ये कि हृदय से इकरार होना चाहिये।
गँठबंधन के भार से झुकने लगे अब बादशाह,
मुल्क का मज़बूत ही सरदार होना चाहिये।
मिमियाती बकरी की सुनता है कहाँ कोई कभी,
मुखिया की आवाज़ में हुंकार होना चाहिये।
ये देश मेरा था, मेरा है, और मेरा रहे,
साज़िश रचने वालों का संहार होना चाहिये।
बालकों तुमसे मेरा अनुरोध है कर ज़ोर कर,
भारत का भारतीय, संस्कार होना चाहिये।
भटकते हैं मन कहीं और तन कहीं ब्यभिचार में
मेरी मुट्ठी में मेरा, संसार होना चाहिये।
पढ़ रहे हैं रोज़ हम हृदय-विदारक सुर्ख़ियाँ,
साफ़ सुथरा अब तो यह अख़बार होना चाहिये।
जातियों में बाँटना और मज़हबों में छाँटना,
आज से ही बंद यह व्यापार होना चाहिये।
अल्पसंख्यक मानते हो, अल्प रहना लाजमीं,
देश-हित में अल्प ही, परिवार होना चाहिये।
देश का क़ानून है तो व्यक्तिगत क़ानून क्यों,
न्याय हर दम, व्यक्तिगत से पार होना चाहिये।
एक देश, एक धर्म - सिर्फ़ हिन्दुस्तानियत,
'एक नियम' का चलन स्वीकार होना चाहिये।
05 अगस्त 18 ~~~ अजय।
यदि जंग हो तो जंग का आचार होना चाहिये,
हो प्यार तो फिर प्यार का इज़हार होना चाहिये,
बहक सकती हैं कभी भी, कश्तियाँ मजधार में,
माँझियों के हाथ में, पतवार होना चाहिये।
रणभूमि की तैयारियों में ढाल ही काफ़ी नहीं,
सूरमा के हाथ में तलवार होना चाहिये।
लड़ रहा है यह सिपाही जान पर भी खेल कर,
साथ इसके देश का परिवार होना चाहिये।
गुलों के ख़ुशबू की चाहत है नहीं किसको भला,
पर गुलों के साथ में कुछ खार होना चाहिये।
मसलने को जो उठें, गर हाथ, कोई पंखुड़ी,
फूल की आवाज़ भी फुफ़कार होना चाहिये।
लूटने को आमादा जो अस्मतें मासूम की,
मुकदमें उनके त्वरित निपटार होना चाहिये।
बेटियाँ सरस्वती, लक्ष्मी, महाकाली बनें,
उनपर न कभी कोई अत्याचार होना चाहिये।
हाथ में जिसने थमा रक्खे हैं पत्थर घात के,
उनके डेरों पर करारा वार होना चाहिये।
सुधर सकती हैं बड़ी से बड़ी भी कुछ ग़लतियाँ,
शर्त ये कि हृदय से इकरार होना चाहिये।
गँठबंधन के भार से झुकने लगे अब बादशाह,
मुल्क का मज़बूत ही सरदार होना चाहिये।
मिमियाती बकरी की सुनता है कहाँ कोई कभी,
मुखिया की आवाज़ में हुंकार होना चाहिये।
ये देश मेरा था, मेरा है, और मेरा रहे,
साज़िश रचने वालों का संहार होना चाहिये।
बालकों तुमसे मेरा अनुरोध है कर ज़ोर कर,
भारत का भारतीय, संस्कार होना चाहिये।
भटकते हैं मन कहीं और तन कहीं ब्यभिचार में
मेरी मुट्ठी में मेरा, संसार होना चाहिये।
पढ़ रहे हैं रोज़ हम हृदय-विदारक सुर्ख़ियाँ,
साफ़ सुथरा अब तो यह अख़बार होना चाहिये।
जातियों में बाँटना और मज़हबों में छाँटना,
आज से ही बंद यह व्यापार होना चाहिये।
अल्पसंख्यक मानते हो, अल्प रहना लाजमीं,
देश-हित में अल्प ही, परिवार होना चाहिये।
देश का क़ानून है तो व्यक्तिगत क़ानून क्यों,
न्याय हर दम, व्यक्तिगत से पार होना चाहिये।
एक देश, एक धर्म - सिर्फ़ हिन्दुस्तानियत,
'एक नियम' का चलन स्वीकार होना चाहिये।
05 अगस्त 18 ~~~ अजय।
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