वक्त का कहर
कल महल था आज यह इक खण्डहर है।
वक्त ने इस शहर पर ढाया कहर है।
शाम हँसती थी कभी, अब दोपहर है।
जिन्दगी का भी यही चौथा पहर है।
15/6/26 ~अजय 'अजेय'।
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