Wednesday, 1 July 2026

वक्त का कहर


(चित्र-लेखन)

(पीयूष निर्झर छंद)


वक्त का कहर


कल महल था आज यह इक खण्डहर है।

वक्त ने इस शहर पर ढाया कहर है।

शाम हँसती थी कभी, अब दोपहर है।

जिन्दगी का भी यही चौथा पहर है।

15/6/26           ~अजय 'अजेय'।

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