(पद्मिनी छंद)
एनकाउंटर या हत्या
(भरत तिवारी)
फेंक दी गन तभी भी चलीं गोलियाँ।
पूछते हैं सभी बंद हैं बोलियाँ।
थम गयी साँस वो अब चलेगी नहीं।
था गलत या सही पर बँटी टोलियाँ।।
बात की बात में बात बढ़ने लगी।
घात दोनों तरफ़ पाठ पढ़ने लगी।
माथ पर जब चढ़ी राजनीतिक सनक।
मौत के दृष्य स्वयमेव गढ़ने लगी।
26/6/26 ~अजय 'अजेय'।
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