(चित्र-लेखन)
हाथ की रोटियाँ
तीस बत्तिस सेंकती थीं, माँ हमारी गाँव में।
अब नहीं सिंकतीं शहर में, आठ मन से चाव में।
बाहरी खाने की सब को, लत बुरी है लग रही।
दिन-ब-दिन घर की बनी अब, सिमटतीं दुर्भाव में।
25/4/26 ~अजय 'अजेय'।
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