Sunday, 2 August 2026
बालपन के खेल
Wednesday, 29 July 2026
बेमानी जंग
(विधाता छंद)
बेमानी जंग
न ये माने न वो माने, हुए बेतौर मनमाने।
छिड़ी है जंग सागर में, पिट रहे देश बेगाने।
करे कोई भरे कोई, परेशानी गजब की है।
समंदर जो सभी के थे, लगे हैं लोग कब्जाने।
जहाजों को डराते हैं, बमों की बारिशें करके।
रुका है तेल का जाना, बमों की मार से डर के।
बढ़े हैं भाव मनमाने, टंकियाँ तेल की सूखी।
न जाने कब रुकेंगे बम, रुकेंगे शाम या तड़के ।।
18/7/26 ~अजय 'अजेय'।
कर्तव्यनिष्ठ
(चित्र-लेखन)
(मनोरम छंद)
कर्तव्यनिष्ठ
माथ पर गट्ठर उठाते।
पाँव में पत्थर चुभाते।
जिंदगीकी दौड़ बाबा।
जिंदगी भर हैं लगाते।।
है यही बस आस मन की।
पूत की बन जाय जिनगी।
पूर कर दूँ लिख पढ़ा कर।
जान है जब तलक तन की।।
25/7/26 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 1 July 2026
हाथ की रोटियाँ
(चित्र-लेखन)
हाथ की रोटियाँ
तीस बत्तिस सेंकती थीं, माँ हमारी गाँव में।
अब नहीं सिंकतीं शहर में, आठ मन से चाव में।
बाहरी खाने की सब को, लत बुरी है लग रही।
दिन-ब-दिन घर की बनी अब, सिमटतीं दुर्भाव में।
25/4/26 ~अजय 'अजेय'।
ईंधन की किल्लत
(चित्र-लेखन)
(कुण्डलिया छंद)
ईंधन की किल्लत
ईंधन की किल्लत भई,
मिले न डीजल तेल,
बचे खेत कैसे जुतें,
मिलें नहीं हल-बैल।
मिले नहीं हल-बैल,
किसानी होये कैसे।
बैल नदारद हुए,
नहीं अब पलते भैंसे।
खुद काँधे पर लिये,
उठा हल भाई झिंगन।
बनना ही था बैल,
नहीं जब मिलता ईंधन।।
6/6/26 ~अजय 'अजेय'।
अमरीका के तुरुप
*अमरीका के तुरुप*
(रास छंद)
है लड़ना तो आपस में तुम, लड़ो मरो।
हम पर काहे बेमतलब के वजन धरो।
बंद करो यह खूनी खेला आपस का।
अपने चारागाहों की बस घास चरो।।
शाँतिदूत के दावे कोरे झूठ रहे।
बदली बातों से सबके मन टूट रहे।
रण-विराम कह-कह कर करते वार रहे।
अब तक जो साथी थे वे भी फूट रहे।।
कर का बोझ दिखा सबको भयभीत करो।
दुनिया के आतंकी को तुम मीत करो।
लिये कटोरा जो दर-दर को भटक रहे।
कुछ सिक्के देकर भूखों को शीत करो।।
इन सिक्कों के बल पर दादा बने हुए।
भीतर से आहत हो बाहर तने हुए।
दुनिया को भी तुमने आहत किया हुआ।
खुद भी आफत की माटी में सने हुए।
4/6/26 अजय 'अजेय'।
Tuesday, 30 June 2026
एनकाउंटर या हत्या
(पद्मिनी छंद)
एनकाउंटर या हत्या
(भरत तिवारी)
फेंक दी गन तभी भी चलीं गोलियाँ।
पूछते हैं सभी बंद हैं बोलियाँ।
थम गयी साँस वो अब चलेगी नहीं।
था गलत या सही पर बँटी टोलियाँ।।
बात की बात में बात बढ़ने लगी।
घात दोनों तरफ़ पाठ पढ़ने लगी।
माथ पर जब चढ़ी राजनीतिक सनक।
मौत के दृष्य स्वयमेव गढ़ने लगी।
26/6/26 ~अजय 'अजेय'।
Saturday, 20 June 2026
युद्धविराम पर प्रश्न ?
युद्धविराम पर प्रश्न ?
(दोहा छंद)
रुके युद्ध पर मच रहा, भारी बड़ा बवाल।
जिसको देखो कर रहा, हम से यही सवाल।।
काहे रोका वेग को, करते मटियामेट।
आया था मौका सही, अब तक जिसका वेट।।
बात सही है आपकी, सबको यही सुहाय।
लेकिन कुछ बातें यहीं, मेरी समझ न आय।।
जीत मिले तो साथ में, मिलता है कुछ रोग।
माटी पर कब्जा मिले, साथ मिलें कुछ लोग।।
साथ मिलेंगे जो हमें, क्या तुमको मंजूर ?
आधे भूखे पेट के, आधे भूखे हूर।।
हुये अलग थे चाह कर, हमसे पाले बैर।
आज मिलेंगे जब हमें, चाहेंगे वे खैर ?
पाल सकोगे साँप तुम, घर में लाकर आज ?
रोज खुजाते फिरेंगे, लेकर खुजली खाज ?
जल्दीबाजी मत करो, नहीं बिगाड़ो काम।
ऋतु आये फल मिलेंगे, मिर्ची केला आम।।
थोड़ी थोड़ी चोट दो, रुक रुक सीमा पार।
मौत मरेंगे आप ही, सब हूरों के यार।।
खेल नहीं यह युद्ध है, नियम न जैसे खेल।
दर्द न मिटते साल तक, मलते रहिये तेल।।
19/5/25 ~अजय 'अजेेेय'।
कोरोना की पुनर्दस्तक
Tuesday, 19 May 2026
हमारा भारत
हमारा भारत
(विधाता छंद)
सँवारा है जिसे हमने, निराला देश है मेरा।
निराई कर गुड़ाई कर, सजाया बाग का घेरा।
पतंगे-कीट मारेंगे, अगर आयें हमारे घर।
जमाने अब नहीं देंगे, किसी को हम यहाँ डेरा।।
समझ लें आप भी, सब को,समझ में बात ये आये।
न कोई दे हमें धमकी, न भोली बात फुसलाये।
जिसे भारत सुहाता हो, यहाँ के गीत वो गाये।
नहीं तो बाँध कर बिस्तर, जहाँ भाये वहीं जाये।।
4/10/24 अजय 'अजेय'।
Saturday, 3 May 2025
दीपावली पर्व
दीपावली पर्व
१.(किशोर छंद)
घर के भीतर खूब सफाई, करते हैं।
मोबाइल पर ज्ञान ढेर हम, भरते हैं।
हुई साँझ भरपूर पटाखे, फोड़ेंगे।
पॉलूशन के सारे मानक, तोड़ेंगे।।
२.(रास छंद)
लड़ी सितारे चीनी वाले, झूल गये।
माटी वाला दीपक लाना, भूल गये।
जले नहीं दीपक घर के कुम्भारन के।
चकाचौंध की भेंट मंत्र चढ़, मूल गये।।
31/10/ 24 ~अजय 'अजेय'।
जान मेरी
जान मेरी
(गीतिका छंद)
वो कभी जो गैर से थे, जान मेरी हो गये।
छेड़ कर वे तार मन के, अब कहाँ हैं खो गये।
खोजता फिरता ख़यालों में, सदा रहता उन्हें।
जान मुट्ठी में हमारी, ले दबा कर जो गये।।
24/10/24 ~अजय 'अजेय'।
विसर्जन
(चित्र लेखन)
(दोहा छंद)
विसर्जन
लाये थे घर प्रेम से, फेंका नेह बिसार।
भगवन कैसे आँय फिर, हो जब यह आचार।।
पूजा हो जिसकी प्रथम, सजे प्रथम घर द्वार।
उनकी यह अवहेलना, कैसे है स्वीकार।
भेड़चाल कैसी चली, करिये जरा विचार।
जिनको घर लायें सजा, फेंकें नदी किनार।।
20/10/24 ~अजय 'अजेय'।
सर्दी में स्नान
(आल्हा छंद)
सर्दी में स्नान
कोहरे ने कोहराम मचाया,
नजर न आये गाड़ी-कार।
भई नदारद धूप नगर में,
सर्दी करती चोटिल वार।।
सूख न पाते कपड़े गीले,
भरे पड़े सब रस्सी तार।
दस्तक हुई द्वार पर भोरे,
शायद आया हो अखबार।।
तजें रजाई कंबल कैसे,
जुटे न हिम्मत इतनी यार।
इक-दूजे का चेहरा ताकें,
खोले कौन बाहरी द्वार।।
जैसे तैसे हाथ धो रहे,
मुख को हल्का लिए पखार।
राह देखते सूरज की अब,
आय गया खिचड़ी त्यौहार।।
हिम्मत कर के पहुँच भी गये,
तन को कैसे करें उघार।
डुबकी कैसे लगे गंग में,
सोच रहा मन बारम्बार।।
एक हाथ से नाक दबाई,
हर हर गंगे लई पुकार।
आलस गायब, सर्दी गायब,
हो जब गंगा की जयकार।।
14/1/25 ~अजय 'अजेेेय'।
छठि माई
छठि माई
(दिक्पाल छंद)
मिलि करत चची ताई, पावन नहाइ खाई।
कोसी भराय माई, रहना सदा सहाई।।
फल मूल अरु मिठाई, भरि घाट भोर जाई।
सूरज दिये दिखाई, तब अर्घ फिर बिदाई।।
आशीष से नवाजो, बिगड़ी हमार साजो।
कल थी सहाय तुमही, छठि माँ सहाय आजो।।
पहिला अरघ तिहारा, अब होय रही साँझो।
उपवास हुआ निर्जल, घर आनि माँ बिराजो।
31/10/22 ~अजय 'अजेय'।
Thursday, 13 March 2025
त्यौहारी भाईचारा
त्यौहारी भाईचारा
(निश्चल छंद)
भाईचारे का भइया जी, गाढ़ा रंग।
दिखलाओ ऐसे दुनिया रह, जाए दंग।।
मजहबियों अब मत छेड़ो तुम, विषधर राग।
आओ मिलजुल कर सब खेलें, गायें फाग।।
पाक अगर ईदी सेवई व, है इफ्तार।
तो फिर होली के रंगों से, कैसा खार।।
बने नहीं अब पर्व हमारे, जंगी गंज।
इक दूजे का मान रखें हम, ना हो रंज।।
13/3/25 ~अजय 'अजेय'।
Wednesday, 5 March 2025
मेरे जानम
मेरे जानम
(विष्णुपद छंद)
बड़े सुरीले बड़े रसीले, हैं मेरे जानम।
उनके गाने से सजती हैं, गीतों की सरगम।।
उनको सुनने को कानों की, आस तरसती है।
होंठों से उनके हर पल रस धार बरसती है।।
3/3/25 ~अजय 'अजेय'।
Tuesday, 4 March 2025
न्यू ईयर
*न्यू ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'। ईयर*
न जाने इसमें नया क्या है।
एक नंगा नाच, हया क्या है।।
पागल हुए जा रहे सब क्यूँ है।
क्या आया और गया क्या है।।
शबाबोशराब भर गिलास है।
किस बात का ये उल्लास है।।
शोर में कौन किसको सुनता है।
ये अपनी वो,अपनी धुनता है।।
न जाने क्या हो जाता आधी रात को।
समझता कोई भी नहीं इस बात को।।
बस कुछ अंक भर बदल जाते हैं।
सुबह हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं।।
दरअसल कल और आज में
कुछ भी नहीं नया है।
वहम है ये हमारे मन का, वरना नया क्या भया है।
....कुछ भी तो नहीं
31/12/24 अजय 'अजेय'।
नोट बनाम वोट
(प्रदीप छंद)
*नोट बनाम वोट*
ऐरे गैरे नत्थू खैरे, सारे लगे दिखाने नोट।
आसमान के तारे देंगे, दे दो बस तुम हमको वोट।।
समझ बूझ कर चलना भइया, मिलती कदम कदम पर चोट।
इनके झाँसे में मत आना, इनकी नीयत में है खोट।।
17/1/25 ~अजय 'अजेय'।
