(विजात छंद)
ईश्वर एक है
इसे सुनिये उसे सुनिये,
जिसे चाहे उसे चुनिये।
वही है एक हम सबका,
उसी बस एक को गुनिये।।
रहीमो राम भी वह है,
तथा घनश्याम भी यह है।
रहे यदि मेल अपनों में,
नहीं कुछ भी भयावह है।।
9/2/23 ~अजय'अजेय'।
(चित्र-लेखन - विधाता छंद)
प्रेयसी
रही हूँ कर झुकी पलकों, तले से आज अभिवादन।
उठा कर माँग का टीका, भरो सिंदूर ऐ साजन।।
रखूँगी मान आजीवन, हृदय से कर लिया वादा।
निभाऊँगी धर्म अपना, निछावर कर तुझे तन मन।।
जहाँ भी ले चलोगे तुम, वहाँ मैं साथ आऊँगी।
जहाँ तुम राग छेड़ोगे, वहाँ मैं गीत गाऊँगी।।
लबों की बाँसुरी हूँ मैं, सदा सुर से सजाना तुम।
हमें जो मोह में बाँधे, वही बस धुन बजाना तुम।।
12/02/23 ~अजय 'अजेय'।
(सरसी छंद)
किस्मत के मारे
किस्मत के मारे कुछ बालक, ढोते बोझ अनेक।
जीवन इतना सरल नहीं है, कहते बुद्धि विवेक।।
कौन न चाहे लिखना-पढ़ना, खेल- कूद अभिषेक।
पेट भरा हो तब ही भातीं, ज्ञान-सलाहें नेक।।
8/4/23 ~अजय 'अजेय'।
सफल भारतीय अभियान : तीसरा चंद्रयान
(चंद्रयान-3)
आज देश ने लिखी चाँद पर,
स्वर्णिम एक इबारत है।
"मामा" के कंधे पर चढ़ कर,
खेल रहा नव-भारत है।।
"सोमनाथ" के निर्देशन में,
भारत ने इतिहास रचा।
चंद्रयान-3 के लैंडर,
"विक्रम" ने पद चाँद रखा।।
हर्ष लहर में झूम उठा है,
भारत का कोना कोना।
नगर-नगर में धूम मची है,
बँटे मिठाई का दोना।।
सफल सिद्ध वैज्ञानिक अपने,
चाँद तिरंगा गाड़ दिया।
विश्व-पटल पर स्वाभिमान संग,
भारत को जय-बाण दिया।।
निकल चुका रोवर "प्रज्ञानी",
अपना खेल दिखाने को।
विचरेगा चंदा-तल पर वह,
जानकारियाँ लाने को।।
चौदह दिन के पखवाड़े भर,
घूमेगा यह विज्ञानी।
संभव कि वह तलाश ले,
प्राण-वायु, तल पर पानी।।
अंत नहीं, आरंभ हुआ यह,
दबे खजाने पाने का।
यह सुरंग का दरवाजा है,
बहुत बचा है आने का।।
23/8/23 ~अजय 'अजेय'।
चाटुकार
कहने को सब नामचीन हैं।
नीतिहीन अरु वसनहीन हैं।।
छिलके हैं इनमें नहिं गूदे।
काज करें सब आँखें मूँदे।
दिखने को आतुर ये अव्वल।
बेच चरित नित चाटें चप्पल।।
जिनके आगे नत हैं गामा।
चाटुकार इनका है नामा।।
14/4/23 ~अजय 'अजेय'।
(लावणी छंद)
बुरे कर्म का नतीजा
दुख तो सबको ही होता है, जाता जब अपना कोई।
माता कौन हुई है ऐसी, पूत शोक में ना रोई।।
बच्चों का भी फ़र्ज बने यह, ममता का सम्मान करें।
और किसी भी मात-पिता के, बच्चों के मत प्राण हरें।।
सबके बच्चे दिल के टुकड़े, सबको होता नेह तभी।
जाये कोई नौनिहाल है, दिल को होती पीर जभी।।
मत सिखलाओ खेल खेल में, हिंसा वाले पाठ कभी।
जीवन तो अनमोल सभी का, राजा हों या रंक सभी।।
खुद को सवा सेर मत बूझो, इस जंगल में शेर बड़े।
कदम कदम पर राहें तकते, पग-पग पर हैं ढेर खड़े।।
रहते वक्त चेत लो राहें, रहो न मद में यार अड़े।
अच्छे अच्छों के मद टूटे, आहों की जब मार पड़े।
17/4/23 ~अजय 'अजेय'।
[चौपाई छंद में एक गजल सेवा में।।
अमृत काल बड़ा सुखदाई।
बोलें कुछ नेता ये भाई।।
जबसे सत्ता ये हथियाई।
अपने मुख से करें बढ़ाई।।
साधु और रढुआ भी इसमें।
करवाते ये रोज लड़ाई।।
जनता बैठी देख रही है।
बढ़ा रहे नेता मँहगाई।।
देश प्रेम की इन्हें न चिंता।
नित्य खा रहे स्वयं मलाई।।
चंद वोट की खातिर नेता।
लड़वाते ये भाई-भाई ।।
कह दें शांति सत्य कुछ बातें।
पहुंचा दें घर सी बी आई।।
शिवराम शांती।।]
(कुण्डलिया छंद)
मतलबपुर
बेमतलब बातें करें, मतलबपुर के लोग।
मतलब न हो पूर्ण तो, करने लगें वियोग।
करने लगें वियोग, बनें बेपेंदी लोटा।
खायें जिसकी थाल, उसे बतलायें खोटा।
कह अजेय कविराय, न हमको हैं वे भाते।
बे सिर-पैर बनायें जो बेमतलब बातें।।
22/4/23 ~अजय 'अजेय'।
(घनाक्षरी छंद)
कर्मफल
बुरे हों करम तो बुरा ही फल मिल पाये।
राम या रहीम चाहे नर हों या नारी हो।।
कोई न हो भेद भाव चले नहीं पेंच दाव।
दोष के खिलाफ जब चलती कटारी हो।।
देर न अंधेर न ही कोई हेरफेर चले।
सुनवाई चले जैसे छूटती सवारी हो।।
भाई न भतीजा मिले किये का नतीजा बस।
हिले न हिलाये न्याय-बाट अस भारी हो।।
01/05/23 ~अजय 'अजेय'।
(पीयूष निर्झर छंद)
बाहुबली
गीत अब उनके पुराने हो चले हैं।
साज के सुर दिल दुखाने को चले हैं।
कुछ नहीं भाता जमाने में उन्हें अब।
उम्र भर को जेलखाने वो चले हैं।।
7/6/23 ~अजय 'अजेय'।
(आख्यान छंद)
सड़क के नियम (देश बनाम विदेश)
हम आये हैं विदेश, देश याद आ गया।
वो गाड़ियाँ, वो भीड़, वो निनाद आ गया।
वह कर्ण भेदी चीख व पुकार हॉर्न की।
सहयात्रियों से जूझ का विवाद आ गया।।
उल्टे हैं चलन-राह, बाँयें नहीं जाओ।
रुको जरूर मोड़ पर, आगे नहीं आओ।
दूरियाँ कायम रहें, अपनी भी लेन में।
हक पैदल के पहले, मत जल्दी मचाओ।।
30/5/23 अजय 'अजेय'।
करगिल विजय दिवस पर...
(कुण्डलिया छंद)
आ धमके नापाक अरि, कर करगिल में घात।
उन्निस सौ निन्यानबे, बात हुई यह ज्ञात।।
बात हुई यह ज्ञात, इरादे नेक न उनके।
छेंके आ कर बँकर, छल से ताने बुनके।।
भागे पूँछ दबाय, गिरे जब गोले जमके।
धर दोज़ख की राह, गये जो थे आ धमके।।
26/7/23 ~अजय 'अजेय'।
आम का बागीचा
हैं लद गये ये पेड़ सब सिंदूर से लगा।
है बागबाँ भी खुश हुआ मन आस है जगा।
बुनते हुये कुछ खाब दिल में हूक सी उठी।
यदि आ गयी आँधी कहीं तो जाए*गा ठगा।।
9/6/23 ~अजय 'अजेय'।