Thursday, 7 August 2014

बरबादियों के जश्न का...

बरबादियों के जश्न का...


बरबादियों के जश्न का, ले, ... कारवाँ चले,

मेरे दर से आज मेरे, ...मेहरबाँ चले॥


इस बाग के गुलों में..., खुशबू...जो थी उनकी,

सबको समेट कर के मेरे, ...बागबाँ चले॥


माटी कुरेद कर के बनाई थीं क्यारियाँ,

फूलों को रौंदते हुए, ...जाने कहाँ चले॥


हमको यकीन था कि सर पे, ...एक फ़लक है,

पल में हटा के सर से मेरे, ...आसमाँ चले॥


हमने लिखा था 'घर' जिसे, अपनी किताब में,

किस बेरुखी से कह के उसे, ...वे मकाँ चले॥ 

06 अगस्त 14                         ...अजय। 

Friday, 25 July 2014

वो आ रहे हैं मिलने...

वो आ रहे हैं मिलने...

कोई कर दे ख़बर जाकर, ख़बर-नवीस को,
वो आ रहे हैं मिलने, मुझसे पचीस को।

जब से मिली खबर ये, दिल बाग-बाग है,
मैं जानूँ कि, शायद ये खबर है अनीस को। 

हम देखते हैं रहे जो, आँखों मे भर के ख़्वाब,
सच कर के दिखाएंगे, वे खुद से पचीस को।

हमने बसर किए हैं, तन्हाइयों के दिन,
आसान वो कर देंगे, आकर अवीस को।

ईमान कि कसम, बस हमको उनसे प्यार है,
कर लो यकीनाज ऐलान-ए-अफीफ़ को। 

24 जुलाई 14                            ...अजय।
(खबर नवीस=संवाददाता,अनीस=दोस्त,  
अवीस=मुश्किल, अफीफ़=पत्नीव्रत) 

Monday, 21 July 2014

बरसेला बदरा बेजार...

बरसेला बदरा बेजार...
(भोजपूरी रचना )

चुए लागल, छन्हीया से पानी .....सइयाँ कहाँ बानी,
बरसेला....... बदरा बेजार .........रऊआं कहाँ बानी।

जेठ भरि हमरा के,... घामवाँ तपवलीं,सइयाँ कहाँ बानी,
आसढ़ा में ...दिहलीं बिसार,......रऊआं कहाँ बानी। 

केतने महीनवाँ से,.... आसरा सजवलीं,सइयाँ कहाँ बानी,
परे लागल,...सावन के फुहार,......रऊआं कहाँ बानी।


देखा-देखी भूखे लगलीं,....करवा-चऊथिया, सइयाँ कहाँ बानी,
कब होई पारन हमार, रऊआं कहाँ बानी।

साथे के सहेलिया हमरी भईलीं लरिकोरिया, सइयाँ कहाँ बानी,
कब सजी,... गोदिया हमार,......रऊआं कहाँ बानी। 

चुए लागल, छन्हीया से पानी .....सइयाँ कहाँ बानी,
बरसेला....... बदरा बेजार .........रऊआं कहाँ बानी।


20 जुलाई 14                                        ...अजय। 

Saturday, 5 July 2014

हमके भावे भोजपूरी लहरदार ...

हमके भावे भोजपूरी लहरदार बोलिया ...

लहरदार बोलिया,लहरदार बोलिया, लहरदार बोलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया।

बगिया की गंछिया पे कुहुकत कोइलिया,
खेतवा की मेढ़वा पे, बलखत गुजरिया,
गाँव के सिवाने से, उठत डोलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया।

मथवा पे पल्लू असिरबाद जस सोहे,
सीने पर दुपट्टा हमरी बिटियन  के मोहे,
सजे बहुअन की देहीं, रंगदार चोलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया।

बिरहा के धुन भावे, भावेला सोहरिया,
फगुआ चुहुलदार, और चइता कजरिया,
गांवे - गांवे बिचरत, भजन टोलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया।

खिंचड़ी नहान, सतुआनि मन भावे,
छट्ठ के अरघ, सूर्यदेव के मनावे,
तन-मन रंग दे, रंगदार होलिया,
हमके भावे भोजपूरी, लहरदार बोलिया।

05जुलाई14                                 ...अजय। 

Thursday, 26 June 2014

दिन बीता तो आई रैना ...

दिन बीता तो आई रैना ...

दिन बीता तो आयी रैना, मेरी नींद उड़ाने को,
उनकी यादों मे भर आयीं, अँखियाँ नीर बहाने को।

पीपर पात सरिस मन डोले, बे-मौसम बरसातों मे,
दीपक बन कर तरसाये है, वो प्रिय हिय-परवाने को।

जेठ की तपी दुपहरी में भी, हमने जिसकी राह तकी,
सूखे होंठों को न मिला वो, जल दो घूँट पिलाने को।

बरखा की बूँदों की टिप-टिप, प्यासी धरती छेड़ गयी,
फिर आयीं मदमस्त फुहारें, बिरहन को तड़पाने को।

आकुल मन करता मनुहारें, साजन अब तो आ जाओ,
जी न सकेंगे अब हम तुम बिन, जीवन के वीराने को। 

दिन बीता तो आयी रैना, मेरी नींद उड़ाने को,
उनकी यादों मे भर आयीं, अँखियाँ नीर बहाने को।

25 जून 2014                                                            ...अजय।  

Wednesday, 25 June 2014

आँख का नूर...

आँख का नूर ....

कोई शख्स सब की आँखों का नूर नहीं है;
इसमे तेरा या मेरा कुसूर नहीं है;
नज़रें अपनी हैं नज़ारे भी हैं अपने अपने;
मगर खुदा से हटकर कोई मशहूर नहीं है।

23 जून 14                            ...अजय।


शांति-दूत...

शांतिदूत
लेकर आया पुष्प रंगीला,
पंछी प्रेम सनेसे वाला;
शांति,शुद्ध,निर्मल काया में, 
सजा धवल यह दूत सजीला॥
२४/०६/१४ ...अजय।

Tuesday, 24 June 2014

आदाब अर्ज़ है...

आदाब अर्ज़ है...

भाई साहब, आदाब अर्ज है ...
बहन जी, आदाब अर्ज़ है...

अरे! ये क्या? सारा का सारा ठीकरा,
औरों के सर ही फोड़ आओगे क्या ?
या फिर, थोड़ी बहुत जिम्मेवारियाँ,
आप अपने सर भी उठाओगे क्या ?
आपका भी अपना, कुछ  तो फ़र्ज़ है.....
...भाई साहब, बहन जी..........आदाब अर्ज़ है।

भाई साहब, आदाब अर्ज है ...
बहन जी, आदाब अर्ज़ है...
अरे रे रे रे रे! ...जरा सम्हल कर बेटे,
बाइक पर निकले, तो हेलमेट ले लेते,
खैर, इसे आराम से चलाओ तो भी चलेगी,
अपनी कमर न डुलाओ, तो भी ये हिलेगी,
सेफ़्टी से  चलने मे क्या हर्ज है ?
 ...भाई साहब, बहन जी..........आदाब अर्ज़ है।

भाई साहब, आदाब अर्ज है ...
बहन जी, आदाब अर्ज़ है...
आज चुनाव का दिन है, आप वोट तो देंगे?
मज़हबी,जातवाले को? या बहते नोट को देंगे?
पड़ोसी गाँव का वो छोकरा, मशहूर नहीं है...
कमजोर है, गुंडा नहीं, मगरूर नहीं है,
नेताजी को ही आप से कल, कौन गर्ज है?
...भाई साहब, बहन जी..........आदाब अर्ज़ है।

भाई साहब, आदाब अर्ज है ...
बहन जी, आदाब अर्ज़ है...
उनके घर मे यदि हुई तो ये महामारी है,
नज़ला भी अगर हो तो अँग्रेजी बीमारी है,
यहाँ वैसी बीमारी का हस्पताल नहीं है...
अगर है तो फिर 'स्विस बैंक' या पाताल में ही है,
जनता को कहाँ जानलेवा कोई मर्ज है ?
...भाई साहब, बहन जी..........आदाब अर्ज़ है।

23 जून 14                                                 ...अजय।   

खार...

खार ...



ये खार नहीं हैं यार हैं जो एहसास दिलाते रहते हैं .....
गद्दों ने तो मदहोश किया, ये प्यार जताते रहते हैं ॥22/06/14

Wednesday, 18 June 2014

बेनाम रिश्ते ...

ये  घाव पुराने हैं ...

बेनाम ही सही ये, फिर भी रिश्ते तो हैं।   
हैं घाव पुराने ये मगर, रिसते तो हैं॥

अब आप ही बताइये, घुनों का क्या क़ुसूर ?
गेहूं के साथ हैं, जनाब पिसते तो हैं...
बेनाम ही सही ये, फिर भी रिश्ते तो हैं।   
हैं घाव पुराने ये मगर, रिसते तो हैं॥ 

बिस्तर की चादरों सी, है तमाम जिंदगी...
बेदाग भी रहें तो रोज, घिसते  तो हैं...
बेनाम ही सही ये, फिर भी रिश्ते तो हैं।
हैं घाव पुराने ये मगर, रिसते तो हैं॥

"बादाम" न मिल पाएँ इसका हमको गम नहीं...
बच्चों की मुट्ठियों मे, सूखे पिस्ते तो हैं...
बेनाम ही सही ये, फिर भी रिश्ते तो हैं।   
हैं घाव पुराने ये मगर, रिसते तो हैं॥

फ़लक की सीढ़ियों का हमें, ख्वाब भी न था...
बुनियाद के पत्थर में नाम दिखते तो हैं...
बेनाम ही सही ये, फिर भी रिश्ते तो हैं।   
हैं घाव पुराने ये मगर, रिसते तो हैं॥

18 जून 2014                          ...अजय। 

Wednesday, 21 May 2014

पत्ता-पत्ता रस से भींजे...

पत्ता-पत्ता रस से भींजे...


पत्ता-पत्ता रस से भींजे, जब अमियाँ  बौराती हैं, 
दिल के तार खनकते हैं जब, वो बगिया में आती हैं। 

सबा नशीली होती है और, शब की नींदें जाती हैं,
तिनका-तिनका गज़ल पढे जब, वो मौसम बन आती हैं,
पत्ता पत्ता रस से भींजे...... 

महुए सी रस से बोझिल जब, वो आगोश मे आती हैं,
धक-धक करती दिल की धड़कन, भी संगीत सुनाती हैं,
पत्ता पत्ता रस से भींजे...... 

20 मई 2014                                          ...अजय। 

Thursday, 15 May 2014

बिहान हो गइल...

बिहान हो गइल...
(...एक भोजपूरी उम्मीद )


सूखल पोखरा में पानी के निदान हो गइल,
चल_अ, उठ_अ, छोड़ चादारा, बिहान हो गइल।

हाथे के लकीर लखत, दिनवाँ बितवल_अ,
केहू सुधि लेई कबो....सपना सजवल_अ,
देख_अ  पोखरा में कमल के उफान हो गइल, 
चल_अ, उठ_अ, छोड़ चादारा, बिहान हो गइल।

बाबा विस्वनाथ तोहार लालसा पुरवलें,
ख़ाक से उठा के तोहके माथ पर सजवलें,
पूरन कर सब सपनवा, दिल जवान हो गइल,
चल_अ, उठ_अ, छोड़ चादारा, बिहान हो गइल।

खुसुर-पुसुर बंद, अब जलवा देखा द,
हमलावरन के, सही रास्ता चेता द,
देश कर _अ शक्तिशाली, ई ऐलान हो गइल,
चल_अ, उठ_अ, छोड़ चादारा, बिहान हो गइल।

15 मई 2014                                      ...अजय।  

Monday, 12 May 2014

अज़ीज़ सी कशिश...

अज़ीज़ सी कशिश...


बसे वो ऐसे, मेरी रूहो-खयालातों में,
कि जिक्र रह-रह के, आ जाये, बातों बातों में।

हज़ार ताने सहे हमने, लाख फ़िकरे सुने,
डोर फिर भी, सौंप आए, उन्हीं हाथों में।

जिधर नज़र गयी, उधर ही वो, नज़र आए,
ऐसा चश्मा है, मुँदी आँखों में।

न जाने कौन सी, खुशबू से, लबरेज हैं वो,
एक अज़ीज़, सी कशिश है , मुलाकातों में। 

टूटे ख़ाबों ने, जग कर, इधर-उधर झाँका,
दिल में सोया था, किसे आता नज़र, वो रातों में। 

11 मई 2014                                                ...अजय। 

Thursday, 27 March 2014

मुझे दीदार चाहिए...

मुझे दीदार चाहिए ...

ऐ यार, मुझे यार का दीदार चाहिए,
बहती हवा में, बस जरा सा प्यार चाहिए। 

कहने को दोस्तों की भीड़........चैन नहीं है,
जो दिल को दे सुकून, वो संसार चाहिए।

गुलशन तो है गुलज़ार ये, दुनिया के गुलों से,
वो गुल जो छेड़ जाये, दिल के तार, चाहिए।

सुलगा गयीं अगन, कुछ बरसात की बूंदें,
शीतल करे वो, सावनी बौछार चाहिए।

ऐ यार, मुझे यार का दीदार चाहिए,
बहती हवा में, बस जरा सा प्यार चाहिए।

जगमग तमाम अजनबी चेहरों से ये शहर,
हमको हमारे गाँव का बाज़ार चाहिए।

सप्ताह का हर दिन तो भागम-भाग में काटा,
हम सबको पुरसुकून एक इतवार चाहिए।

18 अगस्त 2013                                        ...अजय 

Wednesday, 5 March 2014

दाम्पत्य...

दाम्पत्य......

मैं उनसे लड़ी थी, वो मुझसे लड़े थे,

अपनी मनाने पर दोनों अड़े थे ...

कनखियों से जो देखा छुप छुप कर दोनों ने,

"मैं" लघु हो गया... और हम दोनों बड़े थे।


05 मार्च 2014                              ...अजय 

सम्हल के रहना ऐ चाँद

सम्हल के रहना ऐ चाँद ज़रा 

चटोरियों कि नज़र, चटक स्वाद पर है,
बिल्लियों की नज़र, चूहों की माँद पर है,
उन्मादियों की नज़र, बढ़ते उन्माद पर है,
सम्हल के रहना ऐ चाँद जरा… 
चकोरों की नज़र तो…  बस चाँद पर है।  

खबरनवीसों की नज़र, चटखारे विवाद पर है,
किसानों की नज़र, कृत्रिम खाद पर है,
पुजारी की नज़र, चढ़ रहे प्रसाद पर है,
सम्हल के रहना ऐ चाँद जरा…
चकोरों कि नज़र तो…  बस चाँद पर है।

आरक्षण की नज़र, जातिवाद पर है,
असमाजियों की नज़र, समाजवाद पर है,
आतंकियों की नज़र आतंकवाद पर है,
सम्हल के रहना ऐ चाँद जरा…
चकोरों कि नज़र तो…  बस चाँद पर है।

 04 मार्च 2014                                         ...अजय 

Saturday, 8 February 2014

वह चली गयी ...

वह चली गयी … 
(सासू- माता  के देहावसान पर)


कुछ फूल खिलाये थे अनुपम, उसने अपने बागीचे में,

उनमें से एक मिला मुझको, सजता है मेरे दरीचे में.

मालिन थी वह, मलकिन भी थी, माली का बाग़ रखाती थी, 
बगिया के पुष्प सिंचे उससे, माली के ख्वाब सजाती थी.

परवाह न की उस माटी की,जो हाथों में लग जाती थी,
उसको भी वह श्रृंगार मान, अपनों के लिए सजाती थी.

सहती थी नखरे, नाज़ों-गम , सबको सप्रेम खिलाती थी,
खुद रहती थी बीमार मगर,सबके माथे सहलाती थी.

वह जो भी थी, जैसी भी थी,…अंजुमन की शम्मा थी,
जो चाहे उसको तुम कह लो, वह इन पुष्पों की अम्मा थी.

वह चली गयी इस बगिया से, सब पुष्प बुझे मुरझाये हैं,
काले बादल बरसातों के, …कुछ इन आखों में छाये हैं.

२३ जनवरी २०१४                                                                    …अजय. 

Saturday, 18 January 2014

का मनाईं खिचड़ी...

 का मनाईं खिचड़ी … ?

दंगा में घर गाँव गंववलीं, राजनीति में पगड़ी
घाव केहु ना देखे मन के, जांचे "अगड़ी" "पिछड़ी"
का मनाईं  खिचड़ी ?… का मनाईं खिचड़ी।

छूए के ना "सीधा"-"पईसा" ,  बाँटे के ना रेवड़ी,
मुँह धोवे के पानी मुश्किल, ओढ़े  खातिर गुदड़ी,
का मनाईं  खिचड़ी ?… का मनाईं खिचड़ी।

हम ना पढीं अ,आ, इ, ई.…मुखिया पढ़ें बिदेसी,
घूमि घूमि कम्प्यूटर बाँटें, जरे ना घर  में ढेबरी,
का मनाईं  खिचड़ी ?… का मनाईं खिचड़ी।

 रहे के ठेकाना नइखे, तम्मू  गयी उखारी,
ना केहू बतिया सुने वाला, काज ना कोई दिहाड़ी,
का मनाईं  खिचड़ी ?… का मनाईं खिचड़ी।

दुःख  से हिया फाटे हमरो, के से रोईं दुखारी,
वोटवा माँगे आवें जवन,  उहो मारे लंगड़ी,
का मनाईं  खिचड़ी ?… का मनाईं खिचड़ी। 

 14 जनवरी 2014                                        …अजय। 

Thursday, 9 January 2014

अकेलापन...

अकेलापन... 

मैंने अकेलेपन को जब देखा करीब से,
वह भी लगा हारा हुआ अपने नसीब से।

वे खुश रहें, खिलते रहें,बस चाहता है वो,
अपनों के वास्ते, स्वयं को पालता है वो।

दो शब्द अपनेपन के पड़े, उसके कान में,
वह टूट कर बिलख पड़ा, दिल के उफ़ान में।

"क्यों छेड़ते हो यार"... वह कहने लगा मुझसे,
सब जानते ही हो, फिर कैसा गिला, किससे?

आए भी थे तनहा यहाँ......जाना भी तनहा ही,
अकेलेपन से क्यों शिकवा, अकेलापन भी तनहाई।

ये तनहाई ही है जो, उनकी यादें साथ लाती है,
अकेलेपन में भी हमतक, सितारे-चाँद लाती है।

हजारों लोग नज़र में, अकेला फिर भी क्यों है मन,
कोई जो मन मे बसता है, उसी से है ये खालीपन।

08 जनवरी 2014                                                      ...अजय। 

Tuesday, 31 December 2013

धन्य कुर्सिया....

धन्य कुर्सिया...

मैं मीरा, तुम श्याम, कुर्सिया...

मैं मीरा तुम श्याम ।

आनि परो, मोरी झोरी में,

कछु न मिले जोरा-जोरी में,
जपहुँ नित्य तव नाम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

भांति-भांति की, काया तोरी,

जानत हैं सब, माया तोरी,
भांति-भांति के दाम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

आजीवन, तुम्हरे गुण गाउँ,

तोहरे आगे, शीश नवाऊँ,
निशि-दिन करूँ सलाम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

ग्वाल-बाल सब, फेर परे हैं,

दिवस-राति, सब एक करे हैं,
कइसहुँ बनि जाये काम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

मैं तुम्हरी,चुनरी सजवा दूँ,

भव्य एक मंदिर बनवा दूँ,
आनि बसो मोरे ग्राम,कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

धारक तोहरे,खूब सोहाते,

मूरख भी, पंडित बन गाते,
जाकर तोहरे धाम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

तुम हो तो, जीवन में क्या कम,

दूर जात सब कष्ट, दरद, गम,
शत- शत तुम्हें प्रणाम, कुर्सिया...
मैं मीरा तुम श्याम...
मैं मीरा, तुम श्याम कुर्सिया,
मैं मीरा तुम श्याम।

30 दिसंबर 13     ~अजय 'अजेय'।

Tuesday, 24 December 2013

बनाइब हम तोहरा के ...

बनाइब हम तोहरा के गंवही से नेता...
(एक भोजपूरी रचना)

का करब जाके, सहरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के... गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

खा-पीय, मौज कर... मस्ती तू काट,
जेकरा के मन करे ओकरा के डाँट...
अइसन बनाव बेयरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

जा के सहर में तूँ दिन-रात खटब,
कबो कौनों पाठ, कबो पुस्तक तूँ रटब...
नाहिं मिली तब्बो, नोकरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

बनिके कलेक्टर तूँ केतना कमाइब,
नेता जो बनल त नोट से तौलइब...
भरि जाई घरवा, दुअरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

जो बनि जइब तूँ एस पी, कमिसनर,
जीनिगी गुजरि जाई रटि-रटि "यस सर"...
कौनो आई दे जाई, गरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

छोड़ मोह सहर के, गँउए से पढ़ि ल,
अगिला चुनाव तूँ विधायकी के लड़ि ल...
गाड़ी-बत्ती मिली, सरकरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के...

सी एम तूँ बनिह हम पी एम बनि जाइब,
काका के हम तोहरी, महा-महिम बनाइब...
"फर्स्ट लेडी" तोहार, महतरिया हो बेटा,
बनाइब हम तोहरा के...गंवही से नेता,
बनाइब हम तोहरा के... 

23दिसंबर १३                             ...अजय । 

Saturday, 14 December 2013

हाँ जलता हूँ

हाँ ...जलता हूँ...

वो कहते हैं... मैं जलता हूँ , हाँ ...जलता हूँ।
जब वे बाहों मे बाहें डाले फिरते हैं,
और मैं तनहा चलता हूँ...
हाँ, ...जलता हूँ।

वे हँसते हैं, वे गाते हैं, वे सारे जश्न मनाते हैं 
सब साथ बैठ कर प्रेम से बातें करते हैं ...
मैं खाली हाथ मसलता हूँ ...
हाँ, ... जलता हूँ।

कोई खाता है , कोई पीता है,हर शख्स यहाँ पर जीता  है,
जब प्रेम के पंछी मिल, कोलाहल करते हैं,
मैं मौन के घूंट निगलता हूँ, 
हाँ जलता हूँ.....

वे तोलते हैं मैं तुलता हूँ , हर रोज तराजू चढ़ता हूँ,
जब प्रेम से वो अपनों के गले से लगते हैं,
मैं रोज स्वयं को छलता हूँ 
हाँ, ...जलता हूँ।

13 दिसंबर 2013                                      ...अजय

Thursday, 28 November 2013

धर्म या ढोंग ?

धर्म या ढोंग ...?

यह धर्म है ?... तो क्या हो अधर्म बोलिए,
प्रवचन-भजन की आड़ में कुकर्म बोलिए।

पावन, सनातनी पहन के धर्म का चोला,
कोयल की मधुर धुन में, है काग जो बोला,
छद्म-वेशधारियों को  तो बेशर्म बोलिए,
प्रवचन-भजन की आड़ में कुकर्म बोलिए,
यह धर्म है ?... तो क्या हो अधर्म बोलिए


इंसान है शैतान बन गया गुरूर में,
है फिर रहा मदहोश हो के वह सुरूर में,
जो शैतान बन गए हैं उनके राज खोलिए,
प्रवचन-भजन की आड़ में कुकर्म बोलिए,
यह धर्म है ?... तो क्या हो अधर्म बोलिए

कैसे करेगा भरोसा कोई किसी पे कल ?
सन्यासियों के मन भी अगर हो रहे चंचल,
क्यों भई ढोंग की हवा है गर्म बोलिए,
प्रवचन-भजन की आड़ में कुकर्म बोलिए,
यह धर्म है ?... तो क्या हो अधर्म बोलिए

22 नवंबर 2013                                        ...अजय। 

Monday, 18 November 2013

चाँद की यादें

चाँद की यादें...

चाँद गुजरा था, एक रोज, मेरी छत से कभी,
चाँदनी आज भी, तब से, यूं सताती है मुझे।

फूल जो सूख गए थे, रखे किताबों में,

उन से उन हाथों की, हल्की महक, आती है मुझे।

चिट्ठियाँ उसने, लिखी थीं, ...मौन चेहरे से,

पढ़ नहीं पाया, मगर वो अब, याद आती हैं मुझे।

राह कच्ची सी,.... जिस पर वो गुजरते थे कभी,
पय-दर-पय, फिर वही राह, बुलाती है मुझे।

दिल तो कहता है कि, एक रोज मिलेंगे वो फिर,

न जाने कौन सी शै है,... जो डराती है मुझे।

ये भी अच्छा ही हुआ,... कि वो मेरा न हुआ,

तभी तो उसकी, हर अदा, याद आती है मुझे।

 17 नवंबर 13                                               ...अजय।  

Friday, 18 October 2013

पियवा गइल परदेस

पियवा गइल परदेस ...
(एक भोजपूरी  रचना )

मोरे पियवा गईल परदेस, का करीं
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

रोकि नाहि पवलीं कि, जालें ऊ कमाए,
समझाईं मनवां के, समझी ना पावे,
कइसे धोईं अपने मन के,... कलेस का करीं,
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

राम जाने कइसन, कवन जुग आइल,
केहि पर भरोसा करीं, जग पगलाइल,
लागे गड़हा  में जाई,... अब ई देस, का करीं,
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

बिसरे न मनवां से, उनकर  सुरतिया,
शिवजी हमार, हम उनकी परबतिया,
जनि रूसे कबो हमसे,... मोर महेस का करीं,
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

अइहें त गंगा जी के, चुनरी चढ़ाइब,
जवन जवन कहिहें, बना के ऊ खियाइब,
पूजब उनके हम बनाके,... गनेस का करीं,
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

बाबूजी कि मथवा के पगरी, तूँ धरिह,
अम्मा जी की आसा के, निरासा जनि करिह,
भेजीं हम रोजे,... ई सनेस का करीं,
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

मोरे पियवा गईल परदेस, का करीं
मति धरें कहीं बाबावा के भेस, का करीं।

18 अक्तूबर 2013                                 ...अजय। 

Wednesday, 16 October 2013

मैं कमल हूँ...


मैं कमल हूँ...


धूल में लिपटा रहूँ या पंक से सनूँ ,
हूँ कमल मैं, और हर दम ही खिला रहूँ 

धूप हो या छाँव हर मौसम में मैं हँसूं
रंक हो या नृप सभी के हृदय में बसूँ 

मंदिरों में मूर्तियों की अर्चना जब हो
देवता और देवियों की प्रार्थना जब हो 
धूप और दीप की प्रतिअर्पना जब हो
पुष्प और प्रसाद के संग मिल के मैं चढूँ

गम में कोई डूबे तो उसको हौसला मैं दूं
जो हो कोई मजबूर, उसको आसरा मैं दूँ
दुःख दर्द के वनों को सदा काटता चलूँ 
खुद खुश रहूँ मैं  और ख़ुशी बांटता चलूँ 

२५ अगस्त १२                            ...अजय। 

Thursday, 10 October 2013

बस प्यार है...

बस प्यार है...

जरा देखिये मेरे यार का ये मेल, कितना धांसू है,
कि चेहरे पे फर्जी गुस्सा, और आँखों मे छुपा आँसू है 
इसे क्या नाम दूँ, .... मैं समझ ना पाऊँ
कभी उसको मैं देखूँ , और कभी नज़रें झुकाऊँ
आप अपनी राय दें, ....मुझे तो एतबार है,
ये और कुछ नहीं, ये तो बस प्यार है।

10 अक्तूबर 13                                           ...अजय । 

Wednesday, 9 October 2013

शिकायतों का दौर

शिकायतों का दौर...

चलता रहा शब भर, शिकायतों का दौर कुछ यूँ,
कि होश में आते ही बस, सहर हो गयी,
वो टूट कर बरसे मेरी बाहों में, इस कदर,
कि फेहरिश्त खुद ही घुल के बेनज़र हो गयी।

 09 अक्तूबर 13                                            ...अजय 

Tuesday, 1 October 2013

अंततः

अंततः...

कोई साथ न लेकर कभी लाख, करोड़ गया,


सांस छूटी तो हर कोई सब कुछ छोड़ गया....


बटोरता रहा सारी ज़िंदगी जिस शख्स के लिए,


वही अंततः चिता पे, सर को फोड़ गया।


01 अक्तूबर 13                                              ....अजय ।  

Monday, 9 September 2013

जय हिन्द का नारा

जय हिन्द का नारा
जय हिन्द का ये नारा, लगा लीजिये
इस परंपरा को जिंदगी, बना लीजिये
क्या रखा मजहब -ओ- संप्रदायवाद में
कुछ भाई-चारा भी, निभा लीजिये।

इस हिन्द की माटी में है, तन को सँवारा

बहे रक्त हिन्द का, ये है किसको गंवारा
नमक देश का है शामिल, थाली में हमारी
इस नमक का ही हक़, जरा चुका दीजिये।

है जल उठी धरा, हमारे मन की जलन से

सुलग रहा समाज है, हिंसा की अगन से
हो मन में अगर प्यार जरा, अपने वतन से 
तो मन को "सरस्वती-जल", पिला दीजिये।

हिन्द है तो हैं हम, ये ज़हन में रहे

हिन्द का हित सदा, स्मरण में रहे 
ना हो धूमिल चमक, इस चमन की कभी
मैल अपने दिलों का बहा दीजिये।

जय हिन्द का ये नारा लगा लीजिये

इस परंपरा को जिंदगी बना लीजिये।
09 सितंबर 2013        ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 7 September 2013

पुनर्मिलन की साँझ...

३१ अगस्त की शाम...
(पुनर्मिलन की साँझ)

आज की शाम...सज गयी, किसी दुलहिन की तरह,
बीते तीस साल,...... तीस दिन की तरह।

ऐसा लगता है, कल की बात हो ये ...
जब मिले हम थे ,...अजनबी की तरह।

दस महीनों के, ......साथ ने बांधा,
जैसे हों जेल के,........ संगी की तरह।

छूट कर आज मिल रहे हैं, गले लग-लग के
कैसे एक डाल के,...पंछिन की तरह।

जो बिछड़ गए,... वो भी जिंदा हैं,
दिलों मे आज, तिश्नगी (प्यास) की तरह।

अब न छूटेगा साथ ये,... किसी हालत मे भी,
हम तो साथी हैं ,....रात- दिन की तरह।

31 अगस्त 2013 (दिल्ली)                           ... अजय। 

Monday, 5 August 2013

इंसानियत की बात करें

इंसानियत की बात करें ...
(15 अगस्त के शुभ अवसर हेतु )

किसलिए हम हिन्दुत्व, मुसलमानियत की बात करें,

हिन्दुस्तानी हैं तो.... हिंदुस्तानियत की बात करें।

बाँटने को हमको तो, यहाँ  हाजिर हैं हजारों,

आओ एक होकर कुछ ... इंसानियत की बात करें।

कोई "जात" उछालता, कोई "मजहब" की गाता है,

भारत के निवासी हैं तो ... भारतीयत की ही बात करें।

जो तोड़ने आयें हमें... हम उनको तोड़ दें, 

जुड़ने की करो बात तो, हम सियासत की बात करें।

निरपेक्षता के नाम का , रोना है बेमानी,
सर्व-धर्म का सम्मान, और साहचर्य आत्मसात करें।

हो पंदरह अगस्त, या छब्बीस जनवरी,

भयहीन हों सब जश्न , क्यूँ कुर्बानियत की बात करें।

जो हैं हमारे साथ, सब हिन्दोस्तां के हैं 

जगाकर आज ये जज़्बा हम एकात्मीयत की बात करें।

शामिल है नमक खून में, भारत की भूमि का,

आओ इस नमक के, हक़-अदाइयत की बात करें।

चोरों की तरह घात करना हमको ना आया,

दोगली जुबान नहीं, खुल्लम-खुल्ला बात करें।

05 अगस्त 2013                              ...अजय।

Tuesday, 30 July 2013

सावन के मेघ

सावन के मेघ...

बड़े दिनों के बाद ये सावन के मेघ छाये  हैं,
आज बरसात भी हो जाये... सनम आये हैं...
आज बरसात भी हो जाये... सनम आये हैं।


Monday, 29 July 2013

अबकी सावन में

अबकी सावन में...
(भोजपुरी रचना)

भींजी चुनरिया हमार....
अबकी... सावन में
अईहें सजन जी हमार ....
अबकी... सावन में।

जाड़ा भर उनके खबरियो ना आई 
कबो चदरा, कबो ओढ़लीं रजाई,
आ गईली बरखा बहार....
अबकी... सावन में,
भींजी चुनरिया हमार....
अबकी... सावन में।

जेठवा की गरमी से जिया ऊबियाइल
चैन नाही आवे, हमार मन अकुलाइल,
अब आई रिमझिम फुहार....
अबकी... सावन में,
भींजी चुनरिया हमार....
अबकी... सावन में।

29 जुलाई 2013            ...अजय।  

Saturday, 27 July 2013

नाक का पानी

नाक का पानी...

एक मित्र ने एक चुनौती-पूर्ण सुझाव दिया 
और हमने भी अपनी मूंछों पर ताव दिया 

तो मूंछ जरा  खिसिया कर बोली 
बात बात में मुझे क्यों ऐंठते हो ?
फालतू में ही पंगे लेते रहते हो,
मिसिर जैसे छुर्री छोड़, चुप क्यों नहीं बैठते हो 

हमने कहा- सुनो तो महारानी 
जरा बंद करो अपनी ये रोनी- गानी
मामला असल में तुम्हारे पड़ोस का था
क्योंकि चुनौती का विषय था " नाक का पानी "

अब सोचो तुम्हारे मुहल्ले की बात थी
मैं चुप कैसे बैठता...? "नाक" पर आघात थी
अब तो कुछ लिख कर ही दिखाऊँगा
जरा सहयोग करो, तो नाक का "पानी" चढ़ाऊंगा

अब हमें लगा, यार ये तो मामला फंस गया
आख बंद कर, कलम उठा, खयाली सोफ़े मे धंस गया
सबसे पहले खयाल में माई सरस्वती आई 
हमने नाक दबा कर एक गहरी डुबकी लगाई

पानी के भीतर से ही उठा एक बुलबुला 
दर-असल बंद नाक से निकला था कोई जुमला
मैंने उसे लपेटने का प्रयास किया .....
तो पाया..." या कुंदेन्दु तुषार हार  धवला......"

आगे अपना लक्ष था... नाक का पानी
तो लो सुनाता हूँ आगे की कहानी ...
आगे मामला जरा सा संगीन है
क्योंकि नाक और पानी का रिश्ता ही नमकीन है

कोई नाक कटने से भयभीत होता है 
कोई पानी उतरने से गमगीन होता है 
'नाक' और 'पानी' दोनों ही "इज्ज़त" पर घात सहते हैं
और एक को भी कष्ट हो तो दोनों साथ साथ बहते हैं ।

26 जुलाई 13                                       ...अजय। 

Wednesday, 17 July 2013

बरसात में

बरसात में...

हमें टोकिए न बात बात में,
आज भीगेंगे बरसात में ... आज भीगेंगे बरसात में।

सर्दियों ने है चादर ओढ़ाया ,
धूप ने तन को बेहद सताया,
आज आई सुहानी ये बरखा , 
हुये बेकाबू हालात में...
आज भीगेंगे बरसात में ... आज भीगेंगे बरसात में।

आओ आगोश में आँख मूँदें,
चाँद से आयीं चांदी सी बूँदें,
हो चला है दीवाना मेरा दिल,
हाथ तो दीजिये हाथ में...
आज भीगेंगे बरसात में ... आज भीगेंगे बरसात में। 

हमें टोकिए न बात बात में,
आज भीगेंगे बरसात में ... आज भीगेंगे बरसात में।

17 जुलाई 2013                                                               ...अजय. 

एक संकल्प

एक संकल्प ...
(दीपोत्सव पर)

देर नहीं है हुई अभी
आओ लें संकल्प सभी
दीपावली पर्व दीपों का 
दीपों से ही सजे गली 

महके तेल चिरागों का 
ना हो शोर पटाखों का
हवा रहे साफ़ सुथरी ही 
गंध न हो पोटाशों  का 

चोरी और चकारी ना हो
लहू भरी पिचकारी ना हो 
भाई चारे की हो बोली 
कहीं कोई सिसकारी ना हो 

लक्ष्मी जी का आवाहन हो 
घर घर में आरती हवन हो 
गीत खुशी के हर आँगन में 
कहीं न कोई चीख , रुदन, हो 

रोशन हो भारत का हर मन
मिटे अँधेरा, ना हो  क्रंदन 
राजा रंक फ़कीर संत जन 
पुलकित रहें, खिले हर उपवन

17 जुलाई 13                         ....अजय. 


Sunday, 7 July 2013

जलन...

जलन... 

दोस्तों को हँसाने की सदा हसरत रही है,
किसी से जलना अपनी फितरत नहीं है,......
जलूँगा सिर्फ एक रोज मैं मगर ,
उस रोज की शायद अभी नीयत नहीं है ।

07 जुलाई 13                                                ...अजय 

मैं-एक चिराग...

मैं-एक चिराग...

क्या इसमे कसूर मेरा है 
अगर चिरागों तले अंधेरा है 
शब भर जलता रहा रोशनी के लिए
मेरी मंज़िल तो बस सवेरा है

मुझ मे लहू जलता रहा
पावन तेल सा बनकर 
हासिल क्यों नहीं होगा 
किस्मत से जो मेरा है 

अगर मैं बुझ भी जाऊँ तो 
मुझे तुम भूल मत जाना
तेरी यादों के सहलाने से 
जी उठेगा, जिन्न मेरा है 

06 जुलाई 13              ...अजय 

Friday, 5 July 2013

नया खुलासा ...

नया खुलासा...

हर रोज एक, नया खुलासा है 
आदमी ठगा ठगा सा है
फिर वही...पुराने वादे हैं 
फिर से वही घिसा-पिटा, दिलासा है

हर सुबह, एक नया हादसा है

दिल बुझा बुझा सा है
किस तरह मैं ,छोटी सी कहानी लिखूँ
हर दिन एक नई, कथा सा  है 

कौन किस कार्य का प्रभारी है
किसकी क्या जिम्मेदारी है
ये तो बस वक़्त ही बतलाता है 
कि किसके दिल मे छुपा क्या है

हर चेहरे पे एक नकाब सा है

सारा मामला बे-हिसाब सा है
हर कोई गिनती मे है उलझा हुआ सा 
जैसे उसका कुछ खोया सा है

मेरी थाली में क्या  छुपा सा है ?
दिन रात वो इसे निहारता है 
उसकी तिजोरी मे उसने क्या ठूँसा
इस बात का कहाँ चर्चा सा है 

04 जुलाई 2013                           ...अजय 

मेरी चाँदनी ...

मेरी चाँदनी ...

हम चाँद पर जाने को यूँ बेताब बैठे हैं,
जाने कहाँ है रह गयी वो चांदनी मेरी। 

तन्हाइयों में जब भी मैं निकला हूँ सैर को,
ख़यालात बन के साथ चली जिन्दगी मेरी।

पेशानियों पे जब भी पसीना मेरे छलका,
आँचल लिए देखा उसे है साथ में खड़ी।

मैं उससे लड़ता हूँ , कभी वो मुझसे झगड़ती,
इसी धूप-छाँव से है जिन्दगी हरी- भरी।

खामोश से लबों से जब भी उसको पुकारा,
हाज़िर हुयी सब तोड़ कर लाजों की हथकड़ी।

उसने मेरे वजूद को हर हाल में थामा,
कैसे उसे विदा कहूँ ...वह सांस है मेरी।

03 जुलाई 13                             ...अजय

Tuesday, 21 May 2013

मेरा गुमान

गुमान ...

मुझे गुमान था ...कि  मैं ही मैं हूँ 

"मय" उतरी तो जाना कि सिर्फ मैं ही मैं हूँ।  

दूर तलक नजर गई, तो कोई करीब न था 

थामना चाहा जब एक हाथ, तो वो नसीब न था।  

झाँका भीतर तो बस,...एक  अकेलापन  था 

गुमान जिसका था, खुदा ही जाने कि, क्या फ़न था।   

पत्ता हूँ टूटा, .....आज मैं शाख का अपनी 

गुनाह इतना, कि मैं हरा नहीं, मुझमें  पीलापन था।

अब... अपने पीलेपन को धोना  चाहता हूँ

मैं आज अपने... " मैं " को खोना चाहता हूँ, 
पर नहीं मिलता वो निर्मल जल कहीं अब,
जिसमें मैं  खुद को .......भिगोना चाहता हूँ। 

20/21 मई 13                                                   .......अजय 

Saturday, 11 May 2013

बिजली रानी

बिजली रानी ...

ये आती भी है तो, ख़ुशी को ले कर 
और जाती भी है तो, ख़ुशी को ले कर।

जश्न इसके आने का मनाएं भी क्या,

जाने किस पल ये जाए हमें छोड़ कर।

इससे तो अच्छा था, ये होती ही नहीं,
ना ही उम्मीद बन कर ये ढाती कहर।

वो अच्छी थीं बाँस- ताड़  की पंखियाँ,

जो डुला लेते थे हम किसी भी पहर। 

हाथ-पाँव काट कर, ऐसे घात कर गयी,

अपने संग लेकर आई, कमाल के (यंत्र) जंतर।

झरोखों से हवा भी न आ- जा सके,

ऐसे महलों में रहती है दुल्हन बनकर।

ऐसी दुल्हन की हम तुम न ख्वाहिश करें,

अपने पीपल की छहियाँ हैं इनसे बेहतर।

ढिबरियों  का उजाला, मेरे वश में था,

ये महारानी रहती हैं जाने किधर।

ऐ बालक अगर  है मणी तेरे पास ,

तो इस बेवफा से न उम्मीद कर।

11मई 13                                           ...अजय 

Wednesday, 8 May 2013

साला

साला ...


मासूम सा दिखता था, पर उस्ताद था बड़ा,
मेरे गले मे डाल कर, माला चला गया। 

निकले तलाशने थे हम, रेशम कि ओढ़नी,

टाँग कर गले, खादी का, दुशाला चला गया। 

बनते थे हम भी तुर्रम,समझते थे हैं शमशीर,

पर पीठ मे वो कोंच कर भाला चला गया।

चरते थे खुले आम, अपनी मर्जी से हम,

लाकर गले में घर से वो, पगहा झुला गया। 

डब्बे लपेट लाया, लाल पन्नियों मे खूब,

कलाकंद बोल करके, बताशा खिला गया।

किसी की न सुनते थे, जब बोला किए थे हम,

मेरी जुबां पे मार के ताला चला गया। 


जो करीब से देखा, तो "मौन व्रत" दहेज में 
अपनी बहन को ब्याह कर साला चला गया। 

27 अप्रैल 13                                                ...अजय 

गिला-शिकवा

गिला - शिकवा ...
(ग़ज़ल )


जाने किस बात का गिला हमसे,
हो गया है कोई खफ़ा हमसे।

मेरी रुसवाई का सबब बनकर,
मुड़ के बार बार वो मिला हमसे।

बड़ी मुश्किल से, समेटा है जिन्हें,
दिल के टुकड़े, छीनने वो चला हमसे।

नहीं है वक़्त, वो जूनून, वो दीवानापन,
अब न टूटेगा, ये किला हमसे।

अपनी दुनिया में खुश रहो, जानम,
हो गयी राह अब जुदा हमसे।

ताउम्र यों रहेगी , ये कशिश जिन्दा,
न करो इस बात का "शिकवा" हमसे।

29 अप्रैल 13                                      ...अजय 

Thursday, 25 April 2013

पुरानी चवन्नी

पुरानी चवन्नी ...

यार देखो हैं कैसे, दीवाने भले ...
ले पुरानी चवन्नी भुनाने चले।

कर में दर्पण, और स्याही, विशाल तूलिका ...

आज कुदरती सफेदी छुपाने चले।

कहीं पोल करीबी से, कभी खुल ही न जाय ...

नयन दूर - दूर ही से लड़ाने चले।

बुढ़ाता सा गाल, क्रीम से, नहला - धुला लिया ...

कागजी अब जवानी जताने चले।

चुगलियाँ, बढ़ा उदर चाहे जितनी करे ... 

कमर-पट्टी से चौड़ी दबाने चले।

इतने में कहीं पीछे, पटाखा बजा ...

भाग कर अपना जीवन बचाने चले।

सांस उखड़ने लगी, हाँफने लग पड़े ...

हाले दिल अपना जब वो बताने चले।

जो उजाला सफेदी के संग आया है ...

हैं सियाही में क्यों हम डुबाने चले।

बूढ़ी घोड़ी जवाँ, कैसे होगी भला ...

उल्टी गंगा हैं क्यों हम बहाने चले।

25 अप्रैल 13                    ...अजय.

Wednesday, 24 April 2013

एक नयी कार

एक नयी कार...?

आज कल जिसने बड़ी धूम सी मचाई है 
सुना है कि शहर में एक कार नई आई है। 

इसका मॉडल...  अत्यंत ही खास है 
क्योंकि इसे खरीदने का प्राधिकार.....
तो बस "लाचार व्यक्ति" के पास है।

इस ब्रांड की एजेन्सियां ... जमीन पे नहीं, 
तंग "खयाली" गलियों मे हैं ...
मगर खरीद-दारों  के मुकाम  ...
उल्लसित,कुसुमित,सकुचाई "कलियों" मे हैं।

सेल्समेन को देखकर... पहले तो, 
कुछ भी ज़ाहिर नहीं होता...क्योकि...
यदि ऐसा हो जाये तो ...
वो अपने "फन" मे माहिर नहीं होता।

खरीद-दारों के भी विभिन्न भेद ...
'आह' है, 'उफ़्फ़' है, 'आउच' है ,
और एक विशेष दर्जा ---
जिसका नाम 'कास्टिंग काउच' है।

सोच रहे होंगे न आप ...
कि अब तक इसे क्यों नहीं देखा है ?
अरे भई, 'कांसेप्ट' कार है ... 
जिसके हर "रंग" मे धोखा है ।

चलिये, अब मैं खुद ही ये पर्दा हटा दूँ ,
क्योंकि हर हृदय बेकरार है ...
दोस्तों ये और कुछ नहीं, ...बस
मन आहत करने वाला एक व्यभिचार है,

विकृत ख़यालों  का वंशज...
गुनाह कि जवां होती संतान ...
माँ, बहन, मासूम बेटियों का घातक ...
जिसका नाम.....  "बलात्कार" है ।
हाँ  ...यही वो नयी कार है 
>
>
और अंत मे सबसे निवेदन........
>
एजेंसी वालों---बंद करो यह व्यापार,
सेल्समेन -----ग्राहक मत फंसाओ यार,
मीडिया---------न करो झूठा प्रचार,
आप सब-------जरा सतर्क...खबरदार,
खरीद-दार----- न खोजिए,न खरीदिए "नई कार"
नमस्कार... नमस्कार ...नमस्कार। 

24 अप्रैल 2013               ...अजय 

Saturday, 20 April 2013

तन्हा सफ़र


तनहा सफ़र ...


कोई होता नहीं है पास, तो वो छेड़े हैं, 
मेरी यादों के समंदर के, वो थपेड़े हैं। 

आते हैं, लौट जाते हैं वो दिले दर से,
कभी भाटा तो कभी ज्वार जैसे टेढ़े हैं।

पिघल गयीं थीं, जब सींचा था प्यार से उनको,
दिल के बगीचे की, कच्ची मेढ़े हैं।

क्यों गुजरता है ये सफ़र तनहा,
उनके नावों से, भरे बेड़े हैं।

20 अप्रैल २०१३       ....अजय