Monday, 21 June 2021

योग

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मेरा योगदान
(श्रृंगार छंद)
*योग*
बनाता है मन को नीरोग।
भगाता है जो तन से रोग।।
नहीं है किसी धर्म का योग।
करें नित इसका सब उपयोग।।

न इससे अपना नाता तोड़।
योग को नहीं धर्म से जोड़।।
योग का तो मतलब ही जोड़
अपना कर इसको रस निचोड़।।
21/6/21     ~अजय 'अजेय'।

Monday, 3 May 2021

सिपाही

चित्र लेखन (निश्चल छंद) सिपाही जल हो या थल करते कभी न, वे परवाह। सीमाओं पर डटे रोक कर, अरि की राह।। देखो कैसे छिप कर के हैं, वे तैनात। झेल रहे खतरे चाहे हो, दिन या रात।। 25/3/21 ~अजय 'अजेय'।

होली दोहावली

सभी को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें---- होली-दोहावली दहन कीजिए भेद सब, इस होली के संग। मिट जायें शिकवे गिले,मिटे आपसी जंग।। प्रेम-रंग रंग दीजिए, सारा भारत देश। बसे स्नेह हर हृदय में, रहे न कोई द्वेष।। 28 मार्च 21 ~अजय 'अजेय '।

महाशिवरात्रि के शिव

*_महाशिवरात्रि के शिव_* (सरसी छंद) मंदिर मंदिर भीर लगी है, शिव जी रहे नहाय। कोई जल से नहलाता है, कोई दूध चढ़ाय। दही लिपाये कोई लेकर, कोई बेर खिलाय। कोई लाया भाँग-धतूरा, कोई शहद चटाय। भोले-भाले भोले बाबा, सबको रहे लुभाय। राजा रंक सभी के भोले, पल में जात रिझाय। सबसे अलग देवता मेरो, अड़भंगी कहलाय। सर पर गंगा चाँद भाल पर, साँप गले लटकाय। 10/03/21 ~अजय 'अजेय'।

मौसम परिवर्तन

कुण्डलिया छंद मौसम परिवर्तन सर्द हवायें कम हुईं, कंबल नहीं सहात। स्वेटर दस्ताने हटे, दोहर लागै रात।। दोहर लागै रात, रजाई धूप सेंकतीं। तेज चाल पर देह,पसीने बूंद फेंकतीं।। मौसम का बदलाव, उड़ाती गर्द बतायें। फागुन में अलोपित, होती शीत हवायें।। 02/03/21 ~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 24 March 2021

मुंबई के रखवाले

मुंबई के रखवाले (घनाक्षरी छंद) भर कर जिलेटिन कार खड़ी कर गए, रखवाले घर के ही घर को उड़ाने को। पकड़े गए हैं सब जान फँस गई तब, झूठ पर झूठ अब गढ़े हैं सुनाने को। पद से निकल गए अब हैं बिफ़र गए, डीजीपी जी चले अब राज ये बताने को। एक सौ करोड़ प्रति माह लाओ कहते थे, मजबूर हम भए पद को बचाने को। 23/3/21 अजय 'अजेय'।

Sunday, 17 January 2021

सौगात-ए-मरक़ज


*_रूपमाला छंद_*
सौगात-ए-मरक़ज़

देश-हित को ताक पर रख, कर रहे हैं घात।
देश-हित की नीतियों पर, कर रहे आघात।।
बोलिए जी हम उतारें, आरती ले दीप ?
या कि उनकी फितरतों को, दें करारी मात।।

करी विनती और देखा, जोड़ कर के हाथ।
समझते थे हम कि देंगे, वे हमारा साथ।।
तोड़ कर विश्वास भागे, मजहबी  हज़रात।
बाँटते वे फिर रहे हैं, मौत की  सौगात।।

२१/४/२०।   ~अजय 'अजेय'।

Monday, 30 March 2020

लाॅकडाउन का असर

लॉकडाउन इंपैक्ट...
(भोजपूरी रचना)

घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम घरे पोचा लगा लs।
पोचा लगा लs, बाबु पोचा लगा लs ...
कोरोना से सबके बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

कहेलें मोदीजी तनी राखs हो सफ़ाई,
एकइस दिन ले कौनों बाई नाहीं आई।
पानी में डिटोलवा मिला लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

बहियाँ पिराता, हमरी गोड़े आइल मोचा,
लाॅकडाउन कइ दिहलस बड़हन लोचा।
घरे तनि हाथ तूँ बटा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

करफू लगल बंद भईली बजरिया,
मिली फल, रासन, दवा, दूध, तरकरिया।
फ़ोनवे से सउदा मँगा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

केहू से ना मिलs, मति हथवा मिलावs,
हमहूँ से दूरे रहs, नियरे न आव आवs।
साबुन से हाथ गजुआ लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

घरहीं में रहs, जनि निकलs तू बहरा।
गली-गली बइठल बा पुलिसे के पहरा।।
हाथ-गोड़ आपन तूँ बचा लs...
बलम जी पोचा लगा लs।

कोरोना से जान तूँ बचा लs...
बलम घरे पोचा लगा लs...
घूमs जनि झारि के अँगोछा,
बलम जी पोचा लगा लs।

३०/०३/२० ~~~ अजय 'अजेय'।

Wednesday, 25 March 2020

कोरोना का क्रोध

दोहावली...

झेल रहा जो विश्व है, कोरोना का दंश।
वह कोरोना और ना, है 'करुणा' का अंश।।

मूक जंतुओं को रहे, मानव-दानव भक्ष।
कोरोना बन आ गये, करने 'करुणा' रक्ष।।

चूहे चिमगादड़ रहे, बनते जिनके भोज।
'करुणा' उनको खा गए , पकरि पकरि के रोज।।

रेत रहे थे मुर्ग़ियाँ, नोच रहे थे पाँख।
छट-पट करती आत्मा, रोती भरि-भरि आँख।।

बंद हुये धंधे सभी, जहाँ पके था माँस।
मुख से जब रोटी छिनी, तभी भया अहसास।।

मिल-जुल सब जंतू गये, संत करोना धाम 
तप करने सब लग गये, त्राहि त्राहि करि माम्।।

तिलचट्टे दादुर झिंगुर, मूषक मछरी श्वान।
नतमस्तक होकर खड़े, धारित मन भगवान।।

'करुणा' तब परगट भये, हर्षित होकर नाथ।
वर मुद्रा में उठ गये, माथ जंतु धरि हाथ।।

बोले माँगो वत्स वर, कहहु पीर समुझाय।
हर लूँगा तव पीर सब, होकर अभी सहाय।।

बिलखि कहें सब जन्तु-जन, मानव भूला रीत।
कॉंच चबायें जंतु को, हुए नाथ भयभीत।। 

करुणा जी ने वर दिया, होकर निर्भय शेष।
जाओ घर मैं आ रहा, धरि 'कोरोना' भेष।।

हमने मानव को दिया, जीव-दया का भाव। 
वह अभिमानी हो गया, रखने लगा दुराव।।

मानव गर 'मद' चूर है, खाता दुर्बल जीव। 
नहिं उसकी अब खैर है, हिल जायेगी नीव।।

अमरीका हो रूस हो, या हो इटली, चीन। 
अब उतरुँगा मैं धरा, मानव होगा दीन।।

भारत को भी ज्ञात हो, चेतेगा तो ठीक।
दया-भाव मन में रहे, भोजन राखे नीक।।

पश्चिम पीछे भाग मत, खोकर सकल विवेक।
उनकी अपनी सोच है, तेरी अपनी नेक।।

जीवों पर मत जुल्म कर, मत बन झूठा बीर। 
भोजन तो भरपूर है, धार जीभ पर धीर।।

आया हूँ बन त्रासदी, ले ले मेरी सीख।
नवरात्री से बीस दिन, बाहर ना तू दीख।।

२५/०३/२०                 ~~~ अजय 'अजेय'। 

Sunday, 8 March 2020

चित्र लेखन (कुण्डलियाँ छंद)


चित्र-लेखन (कुंडलियाँ)...

गमले का पौधा हरा,दिया सड़क पर रोय।
नफ़रत की आँधी जगी,भाई-चारा खोय।।
भाई-चारा खोय,शहर का खूनी मंजर।
कैसे पनपे पौध,जहाँ दिल ही हों बंजर।।
कह अजेय कविराय,पड़ा है विधि मुँह औंधा।
लखि गलियों के हाल,दुखी गमले का पौधा।।
६/३/२०२०                                 ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 11 January 2020

हिन्दी हमारी

विश्व हिन्दी दिवस-१० जनवरी पर मेरी रचना राष्ट्रभाषा को समर्पित

हिन्दी हमारी...

जुड़े नहीं जो तार वही, मैं आज मिलाने आया हूँ।

अब तक नहीं पढ़े जो तुम, अखबार पढ़ाने आया हूँ।।

"दिवस विश्व-हिन्दी" का मैं, त्यौहार मनाने आया हूँ।

चलो मातृभाषा का मैं रखवार बनाने आया हूँ।।

अंग्रेजी बस गिट-पिट गिट-पिट,  हिन्दी घर की भाषा है।

घरवाले ही भूले इसको, कैसा खेल-तमाशा है।।

किसको दें हम दोष यहाँ पर, गहरी बढ़ी निराशा है।

लेकिन कैसे हार मान लूँ, मुझको अब भी आशा है।।

योगदान यदि करो जरा तुम,परचम ये लहरायेगी।

पाँच मात्रा वालों को यह, पल में धूल चटायेगी।।

मातृभूमि में माता-भाषा जब दुलार पा जायेगी।

है सशक्त यह भाषा मेरी, "विश्व-भाष" बन जायेगी।।

१०/०१/२०                                ~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 8 January 2020

गीतिका छंद

गीतिका छंद
१. जै जवान जै किसान...

पूस की शीतल हवा से, हाड़ हिलने लग गये।
बर्फ की चादर बिछी, लीहाफ़ सिलने लग गये।।
जै किसानों जै जवानों, तुम डटे   जो काम पर।
आमजन से आपको आदाब मिलने लग गये।।
८/१/२०                                            ~अजय 'अजेय'।


२. विद्या संस्थान के हंगामे...

पाट कर के खाइयाँ गर, साथ दो तो राह है।
हाथ हाथों में रहें ये,आम जन की चाह है।।
बात सब ने आप की थी, आपको कहने दिया।
लाठियों ने कब किसी को, चैन से रहने दिया।

८/१/२०                                      ~~~अजय 'अजेय'।
३. जे एन यू के शिक्षार्थी से...

याद है जब तुम गये थे गाँव घर को छोड़कर।
छोड़कर के ज्ञान राहें खो गये किस मोड़ पर।।
भूल मत जाना पिता जी के सजाये खाब को।
फीस के पैसे भिजाए हड्डियों कोै तोड़कर।।

८/१/२०                           ~अजय 'अजेय'।

लावणी छंद

शिक्षा का राजनीतिकरण...
लावणी छंद

शिक्षा का राजनीतिकरण

विद्यालय में पढ़ने आये, या हंगामा करने को।

तख्ती लेकर निकल पड़े हो, सारे गा मा करने को।।

माता और पिता ने भेजा, तुमको विद्या पाने को।

तुम लक्ष्यों को दरकिनार कर, निकलें ड्रामा करने को।।

कोई कर में डण्डा थामे, चेहरा ढक कर निकला है।

मार कुटाई मची हुई है, जाने कैसा घपला है।।

किसने किसका हाथ मरोड़ा, कौन बन गया अबला है।

किसने किसके सर को फोड़ा, राजनीति का मसला है।।
७/१/२०                                    ~~~अजय 'अजेय'।

Tuesday, 31 December 2019

सार छंद

सार छंद...
(१) हैपी क्रिसमस
मदिरा की मस्ती में खोकर, डोल रहे मतवारे।
हैपी होकर हैपी *क्रिसमस, बोल रहे हैं सारे।।
केक बिचारा पूछ रहा है, मेरी ग़लती का रे ?
खुद ख़ुश होकर काट देत हो, मेरी गरदन वा रे !

(२)बे बात की बात
क़ौम-धरम का जाम चखा कर, बहका रहे उवैसी।
ममता 'छी-छी' करती घूमे, हालत होती कैसी।।
पत्थर मारो, आग लगाओ, कैसी डेमोक्रैसी।
बे बातों की बात बनायें, उनकी ऐसी-तैसी ।।
२६/१२/१९                  ~~~ अजय 'अजेय'।

Tuesday, 24 December 2019

दोहा छंद

दोहा छंद...

सुनो सी यम जी...

पी यम अपना कर रहे, तुम को अपना काज।
हाथ खुजाते रहो गर, नहीं करोगे आज।।

पी यम के सर देश है, शेष तिहारे नाम।
साया उसका छोड़कर, खुद भी कर लो काम।।

कहाँ-कहाँ वह खड़ा हो, कहाँ-कहाँ दे साथ।
तेरे अपने पाँव हैं, तेरे भी हैं हाथ।।

कब तक ढुलमुल चलोगे, थामे मोदी हाथ।
अपने पाँव बढ़ाइए, मजबूती के साथ।।

मोदी बैठे बीच में, दिखा रहे हैं राह।
गाँवन के तुम रहनुमा, जीतो जन की वाह।।

सेंगर जैसों से परे, रखिये सोच विचार।
यूँ लगाम कसिये तनिक, होय न अत्याचार।।


२३/१२/१९                              ~~~अजय 'अजेय' ।

Saturday, 14 December 2019

चौपई छंद - दिशा की बात

'दिशा' की बात...
(चौपई छंद)
आज उठेगी फिर से लाश।
जीवन है या सूखी घास ?
जिन्ह मर्जी तेहिं फूँक दिया।
हाथ सेंकने की धरि आस।।

तुमको भेजा था उस *द्वार।
पहना कर वोटों का हार।।
बतलाना तुम मेरी बात।
तुम तो भूल गये सब यार।।

बेटी मेरी रोई आज।
पूछे कैसा है यह राज।।
निकली मैं जब घर से पापा।
देखे ताक लगाए 'बाज'।।

बिटिया मुझसे बोली बात।
उस दिन जो अंकल थे साथ।।
उनको पूछो चुप क्यों हैं।
बैठे धरे हाथ पर हाथ।।
१४/१२/१९        ~अजय 'अजेय'।  

Monday, 9 December 2019

चौपई छंद

चौपई छंद 
*_(ना)पाकी _* खेल

(१)
चले न उनके कोई दाँव।
जहाँ जाँय खायें बेभाव।।
दिखा रहे अब झूठे ताव।
कहीं डूब ना जाये नाव।।

(२)
बना दिया तुझको परधान।
अब तू दे मुझको वरदान।।
मैंने पीठ खुजा दी ख़ान।
तेरी बारी है तू जान।।
०८/१२/१९  ~अजय 'अजेय'।

(३)
सुनो सुनो आई आवाज।
मौनी बाबा बोले आज।।
नरसिम्हा पर ठेली गाज।
दबे दबे कुछ खोले राज।।
०८/१२/१९    ~अजय 'अजेय'।

(४)
पप्पू जी को उभरी खाज।
चले खुजाने फिर से आज।
र डाला भारत को नँग।
बलत्कार का देकर ताज।।
०८/१२/१९  ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 5 December 2019

एक बेटी फिर मरी (रजनी छंद)

एक बेटी फिर मरी
(रजनी छंद)

हाल ऐसा हो गया हम सह नहीं पाते।
चाहते हैं हम मगर चुप रह नहीं पाते।
रोज लुटती बेटियों की अस्मिता देखी।
वेदना हिय की किसी से कह नहीं पाते।

निर्भया के पीर से पैदा हुई थी वो।

आन्दोलित हो गयी माँ भारती थी जो।
भूल कर के पीर अपनी वह गयी फिर सो।
कुंभकरणी नींद कैसे आ गयी उसको।

फिर सियासत में जरा सी सुगबुगाहट है।

हैं दिशायें सड़क पर तो भुनभुनाहट है।
एक बेटी फिर मरी तब बौखलाहट है।
सख्त होने में न जाने *क्या रुकावट है।

आ गयी है वो घड़ी जब फैसला हो ये।

जो करें अपराध उनको देश न ढोये।
हों फटाफट फैसले उनके गुनाहों पे।
दोषियों की सूलियों पर देश न रोये।

फाँसियों की डोर झट बँध जाय गरदन में।

हो नहीं देरी विधिक या व्यर्थ क्रंदन में।
पकड़ लायें  आसमाँ से या जहाँ भी हों।
हो मुखर संदेश सारा विश्व-बँधन में।

०३/१२/१९                           ~~~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 4 December 2019

दिशा का अंत (दुर्मिल सवैया)

दिशा का अंत
(दुर्मिल सवैया)

टुकड़े-टुकड़े कर के दिल के, मन को, तन को, झुलसाय गये।

इनसान नहीं, बलवान नहीं, भगवानहुँ को बिसराय गये।

छण की, पल की, तन की खुशियाँ, हथियावन को पगलाय गये।

खिलती, हँसती, उड़ती चिड़िया, धरि आगहि भूनि के ढाय गये।।

०४/१२/१९                                ~~~अजय 'अजेय'।

Sunday, 1 December 2019

चित्र लेखन (दोहे) - एकता में बल

चित्र लेखन - एकता में बल...    

                                                   👉🏻

(दोहे) (१)
जरा सहारा जो दिया, छप्पर लिया छवाय।
तिनका तिनका जब जुटे, शक्तिमान हो जाय।।

एक अंगुरिया देखि के, दुश्मन डरे न भाय।
पाँच जोरि मुक्का बने, जो देखे भय खाय।।

बूंँद अकेली नीर की,  प्यास बुझा न पाय।
बू्ँद-बूँद एकत्र हो, लोटा भरि-भरि जाय।।

२९/११/१९।              ~~~अजय'अजेय'।
                                 
                     

चित्र-लेखन - माटी कहे कुँहार से...
(दोहे)

माटी कहे कुँहार से, बंद करो ये झाम।
जीना है यदि चैन से, पकड़ो दूजा काम।।

कहाँ पकाओगे मुझे, ना महुआ ना आम।
बाग बगीचे कट गये, देखन मिले न घाम।।

दीये कौन खरीदता, चीनी लड़ियाँ आम।
रखो चाक यह ताक पर, सुमिरो रक्षक राम।।

तीसी-सरसों न दिखें, खेत बन रहे धाम।
कौन जराये तेल जब, घी से मँहगा पाम।।

ऐ मालिक तज नेह मम्, लो मेरा पैगाम।
मेरी चिंता छोड़कर, कर लो शहर पयाम।।

मैं तो रज इस गाँव की, जी लूँगी हर दाम।
तुमको बालक पालने, लखो आप परिणाम।।


२/२/२०२०    ~अजय 'अजेय'