Wednesday, 27 December 2023

माँ की मिहनत

माँ की मिहनत

(विधाता छंद)


उठा कर ईंट माथे पर, चली है माँ कमाने को।
मिलेगा शाम का भोजन, तभी सबको खिलाने को।।
पसीना ही इत्र उसका, गर्द-माटी सजाने को।
नहीं छत सर छिपाने को, नहीं पानी नहाने को।।

लड़ाई है जमाने से, विजय पाना जरूरी है।
कठिन है राह ये लेकिन, पार जाना जरूरी है।।
कहाँ मिलती किसी को है, कभी मंजिल बिना मिहनत।
उगा कर फूल काँटों में दिखाना भी जरूरी है।।
31/07/21                       ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 25 November 2023

पटाखे बजाना

पटाखे  बजाना
(भुजंगी छंद)

पटाखे बजाना कहाँ की कला,
जहाँ भी बजाया वहाँ जलजला,
धमाका हुआ पर हमें का मिला?
धुएँ का गुबारा हवा में घुला।

घटा था प्रदूषण जो* बरसात से,
वहीं लौट आया है* आघात से,
गले की खराशें उभरने लगीं,
सुधरती हुई साँस चढ़ने लगीं।

समारोह दीपीय था यह भला,
सजाते कतारों में* थे हम जला,
न कोई धुआँ था न कोई गिला,
उजाला चहूँ ओर होता खिला।

14/11/23   ~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 6 September 2023

ईश्वर

(विजात छंद) ईश्वर एक है इसे सुनिये उसे सुनिये, जिसे चाहे उसे चुनिये। वही है एक हम सबका, उसी बस एक को गुनिये।। रहीमो राम भी वह है, तथा घनश्याम भी यह है। रहे यदि मेल अपनों में, नहीं कुछ भी भयावह है।। 9/2/23 ~अजय'अजेय'।

प्रेयसी

(चित्र-लेखन - विधाता छंद) प्रेयसी रही हूँ कर झुकी पलकों, तले से आज अभिवादन। उठा कर माँग का टीका, भरो सिंदूर ऐ साजन।। रखूँगी मान आजीवन, हृदय से कर लिया वादा। निभाऊँगी धर्म अपना, निछावर कर तुझे तन मन।। जहाँ भी ले चलोगे तुम, वहाँ मैं साथ आऊँगी। जहाँ तुम राग छेड़ोगे, वहाँ मैं गीत गाऊँगी।। लबों की बाँसुरी हूँ मैं, सदा सुर से सजाना तुम। हमें जो मोह में बाँधे, वही बस धुन बजाना तुम।। 12/02/23 ~अजय 'अजेय'।

Tuesday, 29 August 2023

किस्मत के मारे

(सरसी छंद) किस्मत के मारे किस्मत के मारे कुछ बालक, ढोते बोझ अनेक। जीवन इतना सरल नहीं है, कहते बुद्धि विवेक।। कौन न चाहे लिखना-पढ़ना, खेल- कूद अभिषेक। पेट भरा हो तब ही भातीं, ज्ञान-सलाहें नेक।। 8/4/23 ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 24 August 2023

चंद्रयान-3 : सफल अभियान

सफल भारतीय अभियान : तीसरा चंद्रयान (चंद्रयान-3) आज देश ने लिखी चाँद पर, स्वर्णिम एक इबारत है। "मामा" के कंधे पर चढ़ कर, खेल रहा नव-भारत है।। "सोमनाथ" के निर्देशन में, भारत ने इतिहास रचा। चंद्रयान-3 के लैंडर, "विक्रम" ने पद चाँद रखा।। हर्ष लहर में झूम उठा है, भारत का कोना कोना। नगर-नगर में धूम मची है, बँटे मिठाई का दोना।। सफल सिद्ध वैज्ञानिक अपने, चाँद तिरंगा गाड़ दिया। विश्व-पटल पर स्वाभिमान संग, भारत को जय-बाण दिया।। निकल चुका रोवर "प्रज्ञानी", अपना खेल दिखाने को। विचरेगा चंदा-तल पर वह, जानकारियाँ लाने को।। चौदह दिन के पखवाड़े भर, घूमेगा यह विज्ञानी। संभव कि वह तलाश ले, प्राण-वायु, तल पर पानी।। अंत नहीं, आरंभ हुआ यह, दबे खजाने पाने का। यह सुरंग का दरवाजा है, बहुत बचा है आने का।। 23/8/23 ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 17 August 2023

चाटुकार

चित्र-लेखन (चौपाई छंद)
चाटुकार कहने को सब नामचीन हैं। नीतिहीन अरु वसनहीन हैं।। छिलके हैं इनमें नहिं गूदे। काज करें सब आँखें मूँदे। दिखने को आतुर ये अव्वल। बेच चरित नित चाटें चप्पल।। जिनके आगे नत हैं गामा। चाटुकार इनका है नामा।। 14/4/23 ~अजय 'अजेय'।

बुरे कर्म का नतीजा

(लावणी छंद) बुरे कर्म का नतीजा दुख तो सबको ही होता है, जाता जब अपना कोई। माता कौन हुई है ऐसी, पूत शोक में ना रोई।। बच्चों का भी फ़र्ज बने यह, ममता का सम्मान करें। और किसी भी मात-पिता के, बच्चों के मत प्राण हरें।। सबके बच्चे दिल के टुकड़े, सबको होता नेह तभी। जाये कोई नौनिहाल है, दिल को होती पीर जभी।। मत सिखलाओ खेल खेल में, हिंसा वाले पाठ कभी। जीवन तो अनमोल सभी का, राजा हों या रंक सभी।। खुद को सवा सेर मत बूझो, इस जंगल में शेर बड़े। कदम कदम पर राहें तकते, पग-पग पर हैं ढेर खड़े।। रहते वक्त चेत लो राहें, रहो न मद में यार अड़े। अच्छे अच्छों के मद टूटे, आहों की जब मार पड़े। 17/4/23 ~अजय 'अजेय'।

चौपाई छंद - सत्ता का उपयोग

(चौपाई छंद)
(शिवराम जी के निम्नलिखित कटाक्ष के संदर्भ में)

[चौपाई छंद में एक गजल सेवा में।। अमृत काल बड़ा सुखदाई। बोलें कुछ नेता ये भाई।। जबसे सत्ता ये हथियाई। अपने मुख से करें बढ़ाई।। साधु और रढुआ भी इसमें। करवाते ये रोज लड़ाई।। जनता बैठी देख रही है। बढ़ा रहे नेता मँहगाई।। देश प्रेम की इन्हें न चिंता। नित्य खा रहे स्वयं मलाई।। चंद वोट की खातिर नेता। लड़वाते ये भाई-भाई ।। कह दें शांति सत्य कुछ बातें। पहुंचा दें घर सी बी आई।। शिवराम शांती।।]

सत्ता का उपयोग

आपो बच के रहना भाई। आती होगी सी बी आई।।
हाथ में जिसके सत्ता आई। कौन न करता स्वंय बड़ाई।।
कइयों ने थी भैंस खोजाई। जब बैठे कुर्सी में भाई।।
उत्सव मनै शहर सैफाई। जब *भइया* ने सत्ता पाई।।
अपनों से कॉपी जँचवायी। टोटल के नंबर बढ़वाई।।
अब आती है आज रुलाई। भूल गए अपनी चतुराई।।

20/4/23                          ~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 16 August 2023

चौपाई छंद

(चौपाई छंद)

जब जुबान बन चले कटारी।
तब तब होवे अनहित भारी।।
आपस में ही झगरि परैं सब।
काका चाचा भइया नारी।।
भूलि परत सब रिश्ते नाते।
अपनी बोली में चिल्लाते।।
जब आती कुर्सी की बारी। 
एक साथ सब हाथ उठाते।।
मैं मैं मैं मैं सारे बोलें।
इक दूजे के चिट्ठे खोलें।।
गठबंधन की गाँठें खुलकर।
नैया अपनी स्वयं डुबो लें।।
कैसे करै भरोसा जनता।
जितने मुख उतने ही हंता।।
*मिजाजपुर्सी नभ ऊपर है।*
*नजर सभी की कुर्सी पर है।।*
जुड़ती नहीं गाँठ बंधन की।
बाधित दृष्टि हुई अंधन की।।
भइया चले डगर लंदन की।
दीदी घिसे गोट चंदन की।।

21/4/23 ~अजय 'अजेय'।

मतलबपुर

चित्र - लेखन
(कुण्डलिया छंद) मतलबपुर बेमतलब बातें करें, मतलबपुर के लोग। मतलब न हो पूर्ण तो, करने लगें वियोग। करने लगें वियोग, बनें बेपेंदी लोटा। खायें जिसकी थाल, उसे बतलायें खोटा। कह अजेय कविराय, न हमको हैं वे भाते। बे सिर-पैर बनायें जो बेमतलब बातें।। 22/4/23 ~अजय 'अजेय'।

पारस्परिक सहयोग

(चित्र-लेखन- विधाता छंद)
पारस्परिक सहयोग 
खटे तपती दुपहरी में,चलाता रात दिन रिक्शा।
बड़ा खुद्दार है बाबा,न माँगे है कहीं भिक्षा।।
सवारी भी कहाँ है कम,उढ़ाये है उसे छाता।
सफ़र दुर्गम मगर वो भी,बड़ा आसान हो जाता।। 
30/4/23                           ~अजय 'अजेय'।

कर्मफल

(घनाक्षरी छंद) कर्मफल बुरे हों करम तो बुरा ही फल मिल पाये। राम या रहीम चाहे नर हों या नारी हो।। कोई न हो भेद भाव चले नहीं पेंच दाव। दोष के खिलाफ जब चलती कटारी हो।। देर न अंधेर न ही कोई हेरफेर चले। सुनवाई चले जैसे छूटती सवारी हो।। भाई न भतीजा मिले किये का नतीजा बस। हिले न हिलाये न्याय-बाट अस भारी हो।। 01/05/23 ~अजय 'अजेय'।

बाहुबली

(पीयूष निर्झर छंद) बाहुबली गीत अब उनके पुराने हो चले हैं। साज के सुर दिल दुखाने को चले हैं। कुछ नहीं भाता जमाने में उन्हें अब। उम्र भर को जेलखाने वो चले हैं।। 7/6/23 ~अजय 'अजेय'।

सड़क के नियम - देश बनाम विदेश

(आख्यान छंद) सड़क के नियम (देश बनाम विदेश) हम आये हैं विदेश, देश याद आ गया। वो गाड़ियाँ, वो भीड़, वो निनाद आ गया। वह कर्ण भेदी चीख व पुकार हॉर्न की। सहयात्रियों से जूझ का विवाद आ गया।। उल्टे हैं चलन-राह, बाँयें नहीं जाओ। रुको जरूर मोड़ पर, आगे नहीं आओ। दूरियाँ कायम रहें, अपनी भी लेन में। हक पैदल के पहले, मत जल्दी मचाओ।। 30/5/23 अजय 'अजेय'।

बाबा - पोता

(पीयूष निर्झर छंद)
बाबा - पोता

रोकता हूँ लाख पर रुकता नहीं है।
भागता रहता कभी थकता नहीं है।।
खेलता हूँ मैं उसी सा बाल बन कर।
चोट ना लग जाए थामूँ ढाल बन कर।।
लड़खड़ाते हैं कदम उसके जहाँ पर।
दौड़ कर मैं हूँ पहुँच जाता वहाँ पर।।
थपकियाँ दे कर सुलाऊँ तो न सोता।
माँ दिखे तो भाग जाता छोड़ पोता।।
4/6/23              ~अजय 'अजेय'।

कारगिल विजय दिवस (2023) पर

करगिल विजय दिवस पर... (कुण्डलिया छंद) आ धमके नापाक अरि, कर करगिल में घात। उन्निस सौ निन्यानबे, बात हुई यह ज्ञात।। बात हुई यह ज्ञात, इरादे नेक न उनके। छेंके आ कर बँकर, छल से ताने बुनके।। भागे पूँछ दबाय, गिरे जब गोले जमके। धर दोज़ख की राह, गये जो थे आ धमके।। 26/7/23 ~अजय 'अजेय'।

आम का बागीचा

(चित्र लेखन)
आम का बागीचा हैं लद गये ये पेड़ सब सिंदूर से लगा। है बागबाँ भी खुश हुआ मन आस है जगा। बुनते हुये कुछ खाब दिल में हूक सी उठी। यदि आ गयी आँधी कहीं तो जाए*गा ठगा।। 9/6/23 ~अजय 'अजेय'।

बिरहन

(हरिणी छंद) बिरहन सावन में नयना बरसे। साजन खातिर को तरसे।। मौसम सौतन आनि डसे। बालम जाय बिदेस बसे।। 14/6/23 ~अजय 'अजेय'।

सहज बालपन

(चित्र-लेखन - दोहे)
सहज बालपन दो पहिये की साइकिल, खुशियों का सामान। तिस पर हर्षित बालपन, थामे हाथ विमान।। तन पर नहीं कमीज है, और न है बनियान। लेकिन है मन की खुशी, सातवें आसमान।। 23/6/23 ~अजय 'अजेय'।