Tuesday, 5 March 2013

आख़िर दिल है

आख़िर  दिल है

दिल है ....
दिल है, तो धड़केगा
धड़केगा और फड़केगा 
फड़केगा तो ... कुछ तो हरक़त होगी 
थोड़ी उल्फत ... तो थोड़ी गफलत होगी 
उल्फत है ...तो मोहब्बत होगी 
मोहब्बत हुई तो शोहरत होगी  
शोहरत से कुछ दिल भी जलेंगे 
कुछ कसीदे पढेंगे, तो कुछ हाथ भी मलेंगे 
किसी की जुबाँ पर वो पुराने किस्से होंगे
जिन में शामिल हमारे भी कुछ हिस्से होंगे 
कभी वो मन ही मन में मुस्कुराएंगे 
जब भी ख्यालों में हम उनके आयेंगे 
ये दिल है यारों ...
कभी तो तड़पेगा, 
आखिर ... दिल है
दिल है तो धड़केगा .

५ फरवरी २०१३                                 अजय 

Sunday, 24 February 2013

मुस्कुरा के पीजिये


मुस्कुरा के पीजिये ...

जब आये हैं मयखाने में, दबा के पीजिये,
पैमाने में जब तक है,...मुस्कुरा के पीजिये। 

रहम-ओ-करम की आग को बुझा के पीजिये,
दुनिया से मिले दर्द को, भुला के पीजिये।

गोया, सभी लबरेज हैं बोतल शराब की,
जो चैन चुरा ले, उसे, छुपा के पीजिये।

दिल, दिल के है करीब, फिर ये कैसे फासले,
तसव्वुर में फासलों को, सब मिटा के पीजिये।

तनहाइयों में है ख़ुमार, उनके प्यार का,
प्याले में बर्फ गर्म सी घुला के पीजिये।

होते नज़र के सामने तो बात भी होती,
वो हैं नहीं, तस्वीर ही, लगा के पीजिये।

२४ फरवरी १३                           ......अजय 

Friday, 15 February 2013

वैलेंटाइन डे का अर्थशास्त्र

राधा-उधो संवाद 

( वैलेंटाइन डे का अर्थशास्त्र )


उधो, कैसा प्रेम-शास्त्र ये ...?
प्रेम का केवल एक रोज है ?
बूझो राधे ......अर्थ-शास्त्र है .... ,
दस गुलाब का एक रोज़ (Rose) है।

तुम करती हो प्रेम कृष्ण को
दिन की कोई सीमा ना है ,
दिन निर्धारित करने वालों ...
के मन की अभिलाषा क्या है .

समझो, कौन है इसके पीछे,
जिसने लाखों आज हैं खींचे
प्रेम नहीं मोहताज फूल का ...
करो आज एहसास भूल का।

कार्ड न हों तो स्नेह नहीं हो
ऐसी कोई बात नहीं ...
प्रेम तो तब भी जीवित था ...
जब कृष्ण तुम्हारे साथ नहीं।

14 फरवरी 13 ...अजय

Tuesday, 12 February 2013

सियासत की बेड़ियाँ

सियासत की बेड़ियाँ ...
(अफज़ल पर सियासत ?) 

सोख कर आंसू लकीरें बन रहीं थीं गाल पर, 

तब कहाँ थे ये सियासतदार इतने साल भर, 
पूछते हैं पुत्र, माता , पत्नियाँ इस चाल पर,
है कोइ उत्तर तो दे दो आज इस सवाल पर ।

खैर, अब जो भी हुआ, उससे मिला सुकून है,
बंद लिफ़ाफ़ा है मगर एक खुला मजमून है...
कि जो करेंगे वो भरेंगे, जल नहीं यह खून है,
बह रहा जो धमनियों में द्रव बना जूनून है । 

मत परीक्षा ले कोई अब और मेरे धीर की, 
टूट जाएँगी अगर ये, बेड़ियाँ रणवीर की 
रुक नहीं पायेगी धारा, शांत गंगा-नीर की 
जल नहीं शोणित बहेगा चोटियों से "पीर" की .

12  फरवरी 13                               ...अजय 

चुनावी टिकट


चुनावी टिकट ...


जो टिकट मांगने आये हो, इस बार मोहाले में ...
भई नाम तो गिनवा दो पहले, दो-चार घोटाले में।

बतलाओ कितने दाखिल, एफ़ आइ आर हैं थाने में ... 
ईमान की बातें मत करना तुम यार मोहाले में .

अच्छा बतलाओ, हो माहिर, हथियार चलाने में ...
कितनों के सर  को फोड़ा तुमने, मार बवाले में ?

क्या फूट डला सकते हो तुम, विपरीत घराने में ...
कितने उस घर के ला  सकते हो, अपने पाले में ?

दंगों में शामिल रहे कभी, या क़त्ल कराने में ...
क्या जातिवाद भड़का सकते हो, पंडित, ग्वाले में ?

कितना दे सकते हो बोलो, इस  साल खजाने में ...
कुछ तो पेले होगे जरूर, गत साल हवाले में ?

अच्छा , आवेदन भरो, किसी तारीख पुराने में ...
कुछ  ले दे कर दिलवा देंगे, परधानी वाले में .

11 फरवरी 13                               ...अजय 

Saturday, 9 February 2013

नेतृत्व

नेतृत्व

बिलख रही है आज धरा , 
कहाँ है वह मेरा बेटा ?
किसके ऊपर मैं गर्व करूँ,
किसको मानूं अपना नेता।

पोंछेगा कौन मेरे आंसू ,
जख्मों को कौन दवा देगा ? 
ये सब कुर्सी के लोलुप हैं,
कोई मेरा गला दबा देगा।
बेटे तो उससे लड़ते हैं ,
जो मां  को आँख दिखाता है
ये खुद आपस में गुंथे  हुए,
कोइ राह न मुझे सुझाता है।

रिश्तों की क़द्र नहीं इनको, 
बापू को कोसा करते हैं
भाई भाई में जंग करा ,
ये अपने झोले भरते हैं।

अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को
लड़वा करके बाँट दिया ,
मेरे बेटों ने उनसे भी
नीचे गिर करके घात किया।

घर-घर  में शोले दहक रहे,
झनकारें  हैं तलवारों की , 
भाई-चारे का क़त्ल हुआ ,
आवाजें हैं बँटवारों  की।

सूखी ममता की कोख लिए,
भारत माँ आज बिलखती है ,
उस ईश-पुत्र के आने की 
यह सूनी राह निरखती है।

21 दिसंबर 97         ...अजय 

शोहरत के पीछे...

शोहरत के पीछे...


शोहरतें न होतीं, तो वो गुमाँ  भी न होता ,
सोहबतें न होतीं, तो दिल जवाँ भी न होता,
अब क्या कहें आगे, ऐ अजीज़, मेरे यारों ,
मोहब्बतें न होती तो आशियाँ भी न होता।

इंसान ही इंसान का दुश्मन है हो चला,
इंसान जग रहा है पर ज़मीर सो चला,
शोहरत के नशे में है वो मदहोश हो चला,
शोहरत के बियाबाँ मे इंसान खो चला। 

शोहरत की चाहत में न जाने क्या क्या किया,
कभी जीते जी मरे, तो कभी मर के भी जिया,
सब कुछ था लुट चुका, जब तक होश में लौटे,
करते रहे सब खुद, दोष किस्मत पे मढ़ दिया।

05 मार्च 2014                          ...अजय। 

Monday, 4 February 2013

काँच की बोतलें

काँच की "बोतलें"

जल है, जरा सी आग है, थोड़ा सा पवन है 
थोड़ा जमीं का अंश है, थोडा सा गगन है  
इनको जतन से रखना, तू इनके बिन नहीं 
बोतल में क़ैद हैं, मगर ये कोई जिन्न नहीं .

इस कांच की बोतल का  मत कोई गुमान कर 
दो प्रेम के अल्फ़ाज रख, अपनी जुबान पर 
नाजुक बड़ी काया है ये, नाजुक वजूद है 
चार दिन की जिन्दगी को ये बोतल भी गिन रहीं 

टूटेंगी एक रोज ये , टूटेंगे सब भरम 
होगी दफा चमक दमक, रह जायेंगे करम 
कल की किसे खबर है, आज की सहेज ले 
देख ढल रही है शाम, अब बाकी हैं दिन नहीं .

3 फरवरी 13                                   ... अजय 

Saturday, 2 February 2013

उदासी


उदासी 

न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .
तुझे मिल जायेगी मंजिल 
और तू भी खिल खिल जायेगा .

न हो मायूस तू इस कदर,
और ना तू अपने इरादे बदल,
न रुक जाना राहे-वफ़ा में कहीं,
बस उम्मीदों को थामे तू आगे बढ़ा चल .
कभी तो वो पत्थर पिघल जायेगा ,
बेवफा दिल पलट कर के आ जायेगा ...
न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .....

ये सच है कि उसने नज़र फेर ली है ,
न तुझको निहारा, न तुझसे मिली है,
परिंदों सी ख्वाइश को दिल में बसा ... 
मोम की गुड़िया, सूरज को छूने चली है, 
पंख जल जायेंगे होश आ जायेगा ,
तब तेरे प्यार का मोल याद आयेगा ... 
न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .....

09 दिसम्बर 93/01 फ़रवरी 2013   ...अजय 

इंतज़ार


इंतज़ार...

थक गयी है नज़र तेरा इंतज़ार करके,
मगर तू न आई , न ख़त ही पठाया .
दिल की सदा से रही तू ना-वाकिफ ,
भले मैंने तुझको हमेशा बताया .

खतों में , जुबाँ से या नग्मे सुनाकर ,
तेरी नज़र से नज़र को मिलाकर ,
करी लाख कोशिश कि समझा सकूं मैं ,
मगर तू न समझी , न समझा मैं पाया .

19 जुलाई 93                 ...अजय .
तन्हाई...

इधर देखता हूँ,
उधर देखता हूँ ...
न जाने कहाँ और 
किधर देखता हूँ .

वो आयेंगे कब तक 
पता तो नहीं है, 
मगर फिर भी 
शाम -ओ-सहर देखता हूँ .

लब तो खामोश हैं 
दिल भी मायूस है,
फिर भी बैठा किनारे ,
लहर देखता हूँ . 

कोइ ख़त है नहीं ,
है न कोई खबर ही  ,
मगर फिर भी सूनी 
डगर देखता हूँ .

10 अप्रैल 93          ...अजय

Saturday, 26 January 2013

टीस भरा सन्देश  

एक दर्द झलकता है, इस सन्देश में परम 
कुछ प्रश्न कचोटते से, हो चले हैं अब अहम् 
किसकी तरफ हो आस लगाकर के देखते ?
इस मर्ज़ की दवा भी तो खोजेंगे आप हम .

सरकार कौन है ? ये जरा ध्यान कीजिये ,
अपने विचार में जरा बयान कीजिये ,
हम जैसा ही कोई है जो कुर्सी में बैठा है ,
और पाले बैठा है न जाने कौन से वहम .

बदलेगी ये तस्वीर जब सब खुद को आंक लें .
औरों की छोड़, अपने गिरेबान झाँक लें, 
भाई भतीजावाद और कुर्सी की न हो बात .
जहाँ दांव पर लगा हो मेरे देश का भरम .

26 जनवरी 2013              ....अजय 

Saturday, 19 January 2013

नापाक इरादों वाले

"नापाक" इरादों वाले ....

मेरे सब्र की दीवार पर पत्थर न फेंक 
तू,

जो ढह गयी तो ढायेगी तुझ पर बड़ा

कहर।

शाम की अलाव की चिनगारी नहीं मैं,

हूँ जलजला, गुम करूँगा कस्बे, कई

शहर।

तू भूल गया बीती बातें... वो रोटियां,


एक थाल से खाते थे जो हम साथ बैठ

कर।

खेला किया है तू मेरे जज्बात से अब

तक, 

अब चेत ले वरना न देखेगा तू कल सहर।


विषधर है तू, मैं जानता हूँ जन्म से

तुझको,

अब बाज आ, तू तज दे, प्रतिदिन छोड़ना

जहर .

तू नाग भी हो तो मुझे परवाह कुछ नहीं,

हमारे कृष्ण हैं जिसने नचाया 
कालिया

नथ कर।

फिरा हूँ आज तक तुझको लिए गर्दन में मैं

अपने,

भुला बैठा है तू "तांडव", भुला बैठा

....कि मैं "शंकर"।

                                   ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 3 January 2013

(दामिनी की अंतिम सदा)

अलविदा ... माँ , अलविदा 
(दामिनी की अंतिम सदा)


अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न 
मैं थक गई हूँ , और अब, होता  नहीं सहन 

बदन की खरोंचें तो शायद सह भी मैं जाती 

कैसे दिखाऊं मैं तुझे, टूटा हुआ ये मन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

वस्त्रों का आवरण मेरा, नज़रों की खातिर था 

कैसे बचा पाती, पतित नैनों से अपना तन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

साँसें उखड़ रहीं हैं ...अब, सुन आखिरी वचन 

पैदा न करना तू ... मेरी, अब दूसरी बहन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

अलविदा ..., अलविदा, ..... माँ  अलविदा ...

अब चल रही हूँ ..................................। 

Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.
Main thak gayi hoon aur ab, hota nahi sahan.

Badan ki kharonchen to shayad sah bhee main jatee,...

Kaise dikhaun main tujhe, toota hua ye man,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Vastron ka aavaran mera nazron ki khaatir tha...

Kaise bacha paatee, patit nainon se apna tan,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Saansen ukhad rahi hain... ab, sun akhiree vachan...

Paida na karna ab meri tum doosaree bahan,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Alvida...    alvida,  maa....Alvida.

Ab chal rahi hoon.................


Monday, 3 December 2012

भ्रष्टाचार 


नहीं पहचाना मुझे ..................???
भई ... , सबका खास, सबका दुलारा 
सबकी जुबान पर, चढ़ा चटखारा
दिमाग पर इतना भार मत दीजै ...
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।

सुकून जो देता है,
मन भी मोह लेता है 
औरों को कष्ट दे, तो  मेरी बला से ...
कूटनीति भरा ऐसा एक विचार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा,
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।


सुननेवाला सुने न सुने 
कहने वाला अपना ही सर धुने 
जो बिन माँगी सेवाएं खुद-ब-खुद चुने, 
सचल दूरभाष तंत्र का अनचाहा  संचार हूँ मैं 
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

सब जानते भी हैं मुझे, पहचानते भी हैं 
और वक़्त पड़ने पर मुझे स्वीकारते भी हैं
दूसरों की पत्तलों में अशोभनीय हूँ मगर 
अपनी थाली में तो  सत्कार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

कभी आदाब में हूँ , तो कभी सलाम में हूँ 
और कभी रौनक में डूबी हुई शाम में हूँ 
अवाम की नजर में शिष्टाचार सा लगे, 
सफेदपोशों का वो कुटिल नमस्कार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

उँगलियाँ न उठीं तब तक, वारे- न्यारे हैं , 
जब धर लिए गए तो किस्मत के मारे हैं , 
" इल्ज़ामात  बेबुनियाद " का है राग दरबारी 
सच्चाई तो ये है कि  व्यभिचार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।

हेय हूँ जुबान पे,..हर  दिल में बसा हूँ ,
छूटने न पाए जो, मैं ऐसा नशा हूँ ,
विश्वास न हो तो जरा दिल फाड़ कर देखो 
तुम्हारे रक्त में मिश्रित असल गद्दार हूँ मैं
भ्रष्टाचार,... भ्रष्टाचार,... भ्रष्टाचार हूँ मैं ...

चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

03 दिसंबर 12                      .......अजय 



Sunday, 11 November 2012


शुभ दीपावली 


सबको  दीपोत्सव की शुभकामनाएँ 
खुशियों के दीपक में प्रेम - बाती जलाएँ 
रोशनी भरपूर हो, ऐसे अँधेरा  मिटायें 
गुज़ारिश भी है मगर कि पटाखे न चलायें

ये धरती हमारी, आसमां  हमारा है दोस्तों 
हर हाल में प्रदूषण से बचाना है दोस्तों 
माँ की गोद में सोते दुलारे की नींद न उचट जाये 
कुछ ऐसी फुलझड़ियाँ जलाना है दोस्तों 

बुजुर्गों की साँसों के लिए, महफूज़ रहे ये हवा 
कल सुबह को उठ के, मांगें न वे कोई दवा 
न ही किसी हादसे की खबर हो अखबार में 
ख़ुशी का माहौल है, सब खुश रहें त्यौहार में।


11नवंबर 12                                          ......अजय 

Wednesday, 31 October 2012


संतोष 


लोग चाहते रहे जिंदगी भर मगर 

क्या मिला, उनको अब भी, नहीं है खबर

कह रहा हूँ मैं, अब भी सबर कीजिये

जायेंगे किस डगर, अब संभर लीजिये 


जो मिल गया उसे ही सँवार लीजिये
 
जो खो गया उसे, गर्त में दीजिये

 
जो बीत गया उस दिन का, क्या रोना दोस्त  


जो हाथ में है, उस में ही मौज लीजिये .



31 अक्तूबर 12               .....अजय 

Thursday, 18 October 2012

चाहतों का सिला


चाहतों का सिला

मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं 
तुम सजे  महल हो मैं उजड़ा किला हूँ

तुम शरद की धूप हो उर्जा भरी
और सावन मास की खेती हरी
ग्रीष्म में पीपल की ठंढी छाँव तुम
वृष्टि की हो गुदगुदाती फुलझरी
गरल का शिव की तरह मैं पान कर लूँ
सुधा का भर पात्र मैं तुमको पिला दूँ
मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं .......

जब भी हम बोझिल हुये तुमने दिशा दी
स्याह काली निशा को तुमने प्रभा दी
शुष्क रेगिस्तान में सरिता बहा दी
डूबती साँसों को तुमने फिर हवा दी
मैं ऋणी हर पल तुम्हारे स्नेह का हूँ
हो नहीं सकता की मैं तुमको भुला दूं
मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं ......

कह  रहा हूँ प्रेम  में रस से भरा
वृक्ष हो तूम मैं हूँ  एक पत्ता हरा
शक्ति पाता हूँ तुम्हारी शाख से
मैं हवा में झूलता तुमसे धरा
सोचता हूँ किस तरह तुमको सजा दूँ
महकते पुष्पों की मैं कलियाँ खिला दूँ 
मैं तुम्हारी चाहतों  का क्या सिला दूं ..... 

                                   .........अजय
o8/10/10

Sunday, 2 September 2012

आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ ...

आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ ...

अपने मन का हाल बताने निकला हूँ
आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ 

घर के दरवाज़े से जैसे बाहर आया
खाकी वर्दीधारी ने डंडा खडकाया 
Àaकहाँ चल दिए...?  पता नहीं १५ अगस्त है ? 
सड़क बंद है आज शहर में सिर्फ गश्त है.
मैं बोला, झंडा फ़हराने निकला हूँ 
आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ 

जैसे - तैसे हिम्मत बांधे आगे आया 
चहल पहल को शहर से पूरे गायब पाया
बिखरा है सन्नाटा जैसे कोई हर्ट है 
पूछा तो जाना... भई सिक्योरिटी- अलर्ट है
रिक्शे वाले से पूछा, फिर तुम क्यों आये ?
बोला, जी... रोटी कमाने निकला हूँ
आजादी का जश्न मानाने निकला हूँ 

धीरे-धीरे सहमा सा पहुंचा मंडी में
आग लगी देखी सब्जी, भाजी, भिन्डी में
ठेले वाला चीख-चीख आवाज़ लगाए
ग्राहक रह-रह जेब में अपने हाथ फिराए
हालत पतली क्रेता-विक्रेता दोनों की
महंगाई का हाल सुनाने निकला हूँ 
आजादी  का जश्न मनाने निकला हूँ 

३१ अगस्त १२           ~अजय 'अजेय' ।

Saturday, 25 August 2012

मैं कमल हूँ...

मैं कमल हूँ...


धूल में लिपटा रहूँ या पंक से सनूँ ,
हूँ कमल मैं, और हर दम ही खिला रहूँ 

धूप हो या छाँव हर मौसम में मैं हँसूं
रंक हो या नृप सबके ह्रदय में बसूँ 

मंदिरों में मूर्तियों की अर्चना जब हो
देवता और देवियों की प्रार्थना जब हो 
धूप और दीप की प्रतिअर्पना जब हो
पुष्प और प्रसाद के संग मिल के मैं चढूँ

गम में कोई डूबे तो उसको हौसला मैं दूं
जो हो कोई मजबूर, उसको आसरा मैं दूँ
दुःख दर्द के वनों को सदा काटता चलूँ 
खुद खुश रहूँ मैं  और ख़ुशी बांटता चलूँ 

२५ अगस्त १२                             ...अजय

Saturday, 11 August 2012

आपकी सदा

आपकी सदा...


आपकी सदाओं ने हमें खींच लिया

किसी गर्म आगोश ने जैसे भींच लिया


पहुँच ही गए आपके दर घूमते-फिरते

 
और मन के सूखते दरख्तों को आज सींच लिया


कविताएँ,गीत,ग़ज़लें... नहीं सिर्फ बहाने हैं



इनके जरिये ही हमें मुरझाये गुल खिलाने हैं

और इनसे ही, बिछड़े दिल भी मिल जाने हैं







                                                           ....अजय 

Thursday, 9 August 2012

सपना...अपना अपना

सपना अपना-अपना...


हर शख्स सिर्फ अपना है
सबका अपना सपना है 
औरों को समझे कोई इतना वक़्त ही नहीं
हर घड़ी हर पल वह सिर्फ अपना है

क्यों नहीं समझता मैं इस तथ्य को

क्यों समझाना चाहता हूँ मैं अपनी बात किसी अन्य को
पर जब भी ऐसा करता हूँ , मैं यह भूल जाता हूँ
खता उसकी नहीं, मेरी ही है क्योंकि......
उसका नजरिया उसका अपना और मेरा अपना है
सबका अपना सपना है 
हर शख्स सिर्फ अपना है 

  10 अप्रैल 93                         ...अजय 

Saturday, 4 August 2012

घनघोर बदरवा

घनघोर बदरवा...  


घिरि आओ घनघोर बदरवा...
घिरि आओ घनघोर.
खेतों की माटी है प्यासी...
छाई है चहुँ ओर उदासी
आकर अपने पावन जल से
मन कर जाओ विभोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर.

पेड़ों के पत्ते तक आकुल ...

तुम ना आये सब जन व्याकुल
कहाँ खो गए श्याम-सांवरे
अब न सताओ और बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर .

राह तुम्हारी देख रहे हम...

मन में दबा हुआ बिछोह-गम
तुम आओ तो सावन लाये
साजन को घर ओर बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर.
04 अगस्त 12                  .....अजय 

Monday, 31 October 2011

धर्म युद्ध

" धर्म-युद्ध "
(हैदराबाद में तसलीमा नसरीन की पुस्तक 
विमोचन समारोह -२००७ पर हमले से प्रेरित)

कुछ फूल फर्श पर पड़े हुए,
कुछ शीश शर्म से गड़े हुए 
कुर्सियां गिरीं आड़ी - टेढ़ी
हैं लोग धर्म पर भिड़े हुए

जो बात कही... वह उनकी थी 
क्यों मेरे कान हैं खड़े हुए 
क्यों भड़क उठा हूँ मैं उन पर
अपने विचार ले अड़े हुए

वे भी तो हैं मेरे घर के
उन ने भी दुनिया देखी है 
उन पर क्यों खुद को थोपूं मैं 
जिसने सब ग्रन्थ हैं पढ़े हुए 

सलमान हों या तसलीमा हों 
सबकी अपनी ही सीमा हों
कोई न किसी को बहकाए
कोई न किसी को धमकाए 
मर्यादा में हर धर्म चलें
मर्यादा में हर कर्म पलें
हर धर्म से लो उनकी खूबी
सब धर्म रत्न से जड़े हुए 

९ अगस्त०७                  ...अजय 

Saturday, 8 October 2011

Naasamajh

ना-समझ... 

दर्द को तो सभी ने सहा है मगर ,
"दर्द" से कोई परिचय कराता नहीं

प्रेम में सबने आहें भरीं हैं मगर, 
"प्रेम" क्या है, ये कोई बताता नहीं

हंसते देखा है सबको हजारों दफा ,
पर "ख़ुशी" क्या है ,कोई सुझाता नहीं

हसरतें हैं उजालों की सबको यहाँ, 
"रोशनी" कोई मुझको दिखाता नहीं

पोथियाँ लिख गए हैं करोड़ों गुरु,
"सत्य" क्या क्या है, समझ फिर भी आता नहीं

नासमझों की बस्ती में हूँ आ गया, 
"ना-समझ" कोई कहता, तो भाता नहीं

एक ही बात खुद से हूँ समझा यहाँ,
कोई दूजा किसी का, विधाता नहीं

मेरे "अज्ञान" का दोषी खुद ही तो हूँ,
जो कदम अपना खुद मैं बढाता नहीं.

                                                                  ...अजय 

Tuesday, 4 October 2011

Sarhad Ke Paar

सरहद के  पार भी...

सरहद  के उस पार भी... 
एक ऐसा गाँव है. 
ऐसा ही पनघट है,
और बड़, पीपल की छाँव है.

लोरियां वहां भी, गाती हैं माताएं
सर्दी की शामों को जलती अलाव है .
दर्द वैसा ही है, अपनों से बिछुड़ने का वहां, 
जैसे, यहाँ सीनों में रिसता यह घाव है .

वैधव्य की कसक उतनी ही, कसैली है वहां भी,
जितनी चुभन भरी, "सफ़ेद साड़ी" की छाँव है.
रक्त  का रंग  उतना  ही, सुर्ख  है वहां भी,
उतना ही पावन , महावर लगा पाँव है.

बेटों की मौत पर, वहां भी बहते हैं अश्क ही,
जैसे यहाँ शहीदों के लिए, होता यह स्राव है.
माँ की ममता तो, वहां भी शीतल ही है,
नदियों के घाटों पर, वही लकड़ी की नाव है.

जब सब एक सा है, तो कौन ऐसा कर गया...?
भाइयों के बीच का वो भाई-चारा मर गया.
साथ बैठ कर खाता, था उसी थाली में जो,
प्रेम की थाली को, अपने हाथों बेध कर गया 

०४ अक्तूबर ११                                                                                   ...अजय 

Sunday, 2 October 2011

Ghazal - Chaand ko aainaa....

चाँद को आइना ...


चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई 
एक रूठे हुए साथी को , मना रहा है कोई .
चाँद को आइना दिखा रहा है कोई

जैसे मुरझा रहा हो, गुल खिल के 
वैसा चेहरा, दिखा रहा है कोई .
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

रूठने से क्या कभी भी, कुछ हुआ हासिल 
मुझ पे बस जुल्म, ढा रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

वे जो रूठे तो, बदलियाँ छायीं
लब पे उनके, हंसी को, बुला रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

खताएं तेरी हों , मेरी हों, इससे फर्क ही क्या
ना-खफा हो, अब सर तो, झुका रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

मान भी जाओ, मुस्कुरा दो, अब तो 
ये तो सोचो, कि अपना ही, मना रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

०१ अक्तूबर ११                                            ...अजय 

Thursday, 22 September 2011

"जीवन-पथ"

"जीवन पथ"

तुमने है एक राह चुनी 
फिर पीछे कदम हटाना क्यों ?
राह  में कुछ काँटे भी  होंगे 
काँटों से घबराना क्यों ? 

कोई ऐसा पथिक नहीं है 
जिसको हर पथ सुगम मिला हो
कोई ऐसा जीव न देखा 
जिसको कोई गम न मिला हो

बाधाएं पग-पग पर होंगी 
होना मत मायूस कभी 
मायूसी को ठोकर दोगे 
जीतोगे तुम जंग तभी 

मत स्वीकारो हार अभी से 
जीवन पथ काफी लम्बा है 
खुद को यूँ मजबूत करो जो 
लगे गड़ा लौह - खंभा है.

२१सितम्बर ११                           ...अजय 

Wednesday, 14 September 2011

Matribhasha-Hindi (मातृभाषा "हिंदी")

मातृभाषा  "हिंदी"

दुल्हन के माथे पर शोभित, 
जैसे होती कोई बिंदी, 
भारत के माथे पर भी है,
झिलमिल करती, बिंदी हिंदी। 

"देवनागरी" से सज्जित, 
यह देवनगर की बेटी है, 
अलंकार से भरी हुई यह, 
रस, छंदों की पेटी है। 

"दिनकर", "हरिवंश", "निराला" की, 
"जयशंकर", "धनपत लाला" की,
"मैथिली", "महादेवी", "बेढब", 
लाखों की यही चहेती है। 

"सक्सेना के. पी." भी जानें,
"चौबे प्रदीप" भी हैं माने,
यह "शैल चतुर्वेदी" की बान,
हिंदी "अशोक"(चक्रधर) जी की है जान। 


हिंदी में पुष्प खिले "अनुपम",
जैसे कि  हैं "अमृत प्रीतम",
"बैरागी" ने इसको सींचा,
"शैलेश" ने है ऊपर खींचा,
यह भाषा "अटल बिहारी" की, 
उपवन सुन्दर, यह बागीचा।
"हुल्लड़" ने धूम मचाई है, 
नाटक रचते "परसाई" हैं,
हैं "रेनू फणीश्वर" कथाकार, 
"श्री लाल शुक्ल" सा व्यंगकार,
इसमें रमते "मासूम रजा", 
जिसने है "आधा गाँव" रचा। 

हमने अंग्रेजी अपनाई,
जो पार-समंदर से आई,  
उर्दू को भी तो  अपनाया, 
जो दूर मदरसों से पाया,
फिर हिंदी को क्यों छोड़ चलें,
जो माता भी, और है 'आया'।  

दैवी वरदान, जुबान है ये, 
मेहमान नहीं, घर-बारी है, 
इसका न कोई अपमान करे, 
समझो यह मातु हमारी है। 

आओ अब यह संकल्प करें,
अपना प्रयास यह अल्प करें, 
अपनी हिंदी में एक पत्र, 
लिखें और काया-कल्प करें। 

२६ जनवरी २००४                              ...अजय।