Wednesday, 16 August 2023

बुढ़ापा

चित्र-लेखन (घनाक्षरी छंद) चित्र-लेखन (घनाक्षरी छंद)
बुढ़ापा बिखरे हैं केश तन में न बल शेष पर, जीने की ललक कभी साथ नहीं छोड़ती। मन में जलन नहीं तन पे वसन नहीं,न पर आँख आशाओं की डोर नहीं तोड़ती। राशन की बँटनी में सबसे हैं आगे बाबा, बहू घर बैठ ऐंठ के चाभी मरोड़ती, बैठे बैठे घर खाली तोड़ रहे रोटियों को, कर्कश सुर पति से है बात जोड़ती। 23/9/22 ~अजय 'अजेय'।

Saturday, 12 August 2023

रोजगार

चित्र-लेखन (मदिरा सवैया छंद) रोजगार
भार उठावन हो सिर या फिर गोबर हो कर-पाथन को। भोजन खातिर राह लखैं कछु काम मिले जन हाथन को।। राज किसी दल के बल हो पर साथ बराबर शासन हो। भूख पियासन जान तजें उससे पहिले घर राशन हो।। 22/9/22 ~अजय 'अजेय'।

छंद विधान : निश्चल छंद

निश्चल छंद (छंद विधान) कल की खातिर मिला आज जब छंद विधान। निश्चल में लिख डालो साथी अपनी बान।। याद रहे यति षोडश सप्तम पायें मान। तेइस मात्रिक निश्चल को तुम लो पहचान।। 3/9/22 ~अजय 'अजेय'।

मेरे (फौजी) सनम

(चित्र लेखन) मेरे (फौजी) सनम बैठ माँ की गोद में भोजन किया करते सनम। प्रेम हमसे फोन पर ही कर लिया करते सनम। देश को आगे सदा रख कर रहे सेवा अहम्। मैं हृदय मुमताज उनकी, ताज हैं सर के सनम। 03/9/22 ~अजय 'अजेय'।

कारगिल दिवस : 2022

करगिल दिवस (चौपई छंद) हो नवाज़ या हो इमरान। जारी झूठे रोज बयान।। काँटे भरा पड़ोसी जान। धोखे करता पाकिस्तान।। हर कीमत पर ध्वज का मान। रखते हैं सैनिक, श्रीमान। वीरों ने ले, दे कर जान। करगिल को दी है पहचान।। भारत मेरा देश महान। सैनिक भारत की हैं शान।। सदा खड़े जो सीना तान। करें सभी इनका सम्मान।। 26/7/22 ~अजय 'अजेय'।

सबका साथ : सबका विकास

सबका साथ : सबका विकास (चौपई छंद) पंजा कहीं न फटके पास। बिखरा दीखे तिनका घास।। परिजन ही जब खासम-खास। कैसे सबका होय विकास।। कहते खरी खरी हैं बात। देते हैं जो सबका साथ।। उतरे जैसे ही कोविन्द। मुर्मू ने पायी सौगात।। पूरण होती सबकी आस। सब मिलकर जब करें प्रयास।। घोर विरोधी बने मुरीद। मन की बातें आती रास।। 25/7/22 ~अजय 'अजेय'।

सूखा - ग्रेटर नोएडा

(चौपाई छंद) ग्रेटर नोएडा:सूखा-सूखा कहीं बहें सरिता तूफ़ानी, कहीं न एक बूँद भी पानी। कहीं बही छत कहीं पलानी¹, कहीं डूबते नाना-नानी।। सेक्टर चाई जल को तरसे, बीटा गामा पानी-पानी। हमने कैसी नादानी की, करें वरुण हमसे बइमानी।। 21/7/22 ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 14 July 2022

शेर पर बवाल

शेर पर बवाल 
(विधाता छंद)

कभी वह मुस्कुराता था, तभी वह शेर होता था।
मक्खियाँ छेड़ जाती थीं, गुफ़ा में बैठ रोता था।।
दहाड़ा है गर्जना कर, वतन का शेर जागा है।
गर्जना से दहल जागा, नयन मूँदे जो* सोता था।।

13/7/22                           ~अजय 'अजेय'।

पानी पानी

(रुचिरा व ताटंक छंद के मिश्रणयुक्त रचना का एक प्रयास)
पानी पानी

जिधर देखिये उधर नगर में,खाली पानी पानी है।
बदहाली के मंजर सच हैं,दावा सब बेमानी है।।
हुये करोड़ों खर्च साल भर,ये सरकारी बानी है।
आई अब बरसात शहर में,पोल सभी खुल जानी है।।

उफ़न रहा है नदियों का जल,नये बने वे बाँध बहे।
कहाँ बह गये संसाधन सब,जिसके बदले नोट गहे।।
किसकी जेब हो गई मोटी,किस पर हैं इल्ज़ाम ढहे।
सरकारी दफ़्तर की फ़ाइल,कितने झूठे बोझ सहे।।
12/7/22                                ~अजय 'अजेय' ।

Thursday, 5 May 2022

बेटी के विवाहोपरांत

पड़ा जो डाका मुझ पे, पाई-पाई ले गये,
कुछ केश सँवारे थे, जो नाई ले गये।।
बहूरानी लाये थे, बेटी के भाई ले गये,
बिटिया थी पली नाज से, जँवाई ले गये।।

अब टूटे-फूटे घर में, बस मान बचा है,
पूरे हुए सभी, न अब अरमान बचा है।।
धड़कते दिल संग, तनिक जान बचा है,
एक प्यारा सा खिलौना, ईवान बचा है।।
04/05/22           ~अजय 'अजेय'।

Wednesday, 23 March 2022

युद्ध व्यवसायी

(घनाक्षरी छंद) युद्ध व्यवसायी नीति दंश करोना का अभी गया भी नहीं कि देखो, साये युद्ध वाले नभ पर दिखने लगे। बंद किए बैठे थे दुकान हथियारों वाले, झाड़ पोंछ कर बही-खाते लिखने लगे। धूल फाँकने लगी थीं मँडियां करोना में जो, थोप कर युद्ध बोल बोल चीखने लगे। खुद तो न लड़ें पर पीछे हम खड़े कहें, भरती तिजोरियों के मंत्र सीखने लगे। 23/3/22 ~अजय 'अजेय'।

गिरगिटी सपने

(चौपई छंद)
गिरगिटी सपने

कुछ दिन पहले की है बात।
छोड़ गये थे गिरगिट साथ।।
कोई सइकिल पर चढ़ जात।
कोई चला थामने हाथ।।

बदले थे गिरगिट जो रंग।
देख रहे, जनमत हो दंग।।
बहस रहे थे कसते व्यंग।
हुये मुँगेरी सपने भंग।।

10/3/22  ~अजय 'अजेय'।
<10>

होलिका दहन

<(कुण्डलिया छंद)> होलिका दहन <होली का हैप्पी हुई,जल गै जिसके बाल। साजिश सब चौपट भई,फेल दुष्ट की चाल।। फेल दुष्ट की चाल,जल गई बहिना प्यारी। जली बुराई संग श्रृंगारी गहना धारी।। कह अजेय कविराय,न चढ़िये छद्मी डोली। जल जायेंगे ऐसे, जैसे जलती होली।। <18/3/22 ~अजय 'अजेय'।>

Monday, 21 March 2022

ग्रामीण संस्कार

चित्र लेखन
(विष्णुपद छंद)
ग्रामीण संस्कार 
आते जाते राही का भी, मान बढ़ाते हैं,
कुटिया को ही हम तो अपने,  महल बनाते हैं।।
कौन पूछता है किसको अब, शहरी महलों में,
हम अंजानों को भी दिल से, गले लगाते हैं।।
12/3/22       ~अजय 'अजेय'।

Monday, 10 January 2022

ओमीक्राॅन लहर

<ओमीक्राॅन लहर> <(भुजंगी छंद)> <नहीं हो रहा है हमें कुछ असर, बिना मुख ढके घूमते हैं निडर, गये भूल बीती हुई वो लहर, तभी भान होता गिरें जब गटर। जरा छूट पाई लगे झूमने, पहाड़ी समंदर लगे घूमने, भुला के सिखाये सभी कायदे, लगा कर गले से लगे चूमने। करोना दुबारा पलट आ गया, खतरनाक 'ओमी' कहा है गया, बड़ी तेज गति से कहर ढा रहा, न जाने किधर से किलर आ रहा। 10/1/22 ~अजय'अजेय'।>

Sunday, 26 December 2021

किसान और आंदोलन

(रुचिरा छंद) 
किसान और आंदोलन 
थे किसान पर सड़कों पर ही, खेती करते साल गया।
किसे पता है इसके पीछे, किस बंदे का माल गया।
कितना डीज़ल जला रात दिन, कितना धन बरबाद हुआ।
कोई तो बतलाओ यारों, किसका चावल-दाल गया।
कौन कौन थे किसके पीछे, खेल कौन था चाल गया।
21/12/21                          ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 23 December 2021

बदले भाव-आये चुनाव

(महाश्रृंगार छंद)
बदले भाव - आये चुनाव

देख कर के बदले ये भाव।
हैं उठते जन-मन में सवाल।
क्या हो नहीं सकते चुनाव।
हर साल और साल-दर-साल।

याद आ गये गाँव देहात।
भुलाई सारी बिगड़ी बात।
हो रही सौगाती बरसात।
बँट रही है खुल के खैरात।
23/12/21      ~अजय'अजेय'।

कोरोना (ओमीक्राॅन) की दस्तक

कोरोना(ओमीक्राॅन) की दस्तक
(ककुंभ छंद)

लहर तीसरी आने वाली,
है, अब ऐसा लगता है।
जनता की आँखों पर पर्दा,
छाया जैसा लगता है।
घूम रहे सब ऐसे जैसे,
छुट्टा भैंसा लगता है।
भूल गये जब अपना कोई,
जाये कैसा लगता है।
21/12/21   ~अजय 'अजेय'।

Tuesday, 16 November 2021

रैलियाँ व महामारी

गीतिका छंद
रैलियाँ और महामारी

रोक देनी थीं मगर ये, रोकते नहिं रैलियाँ। 
जुट रहे हैं लोग लाखों, बढ़ रही नित टैलियाँ।।
संविधानिक विवशता की आड़ में सब मौन हैं।
ताक पर रख दी गयी हैं ज्ञान की सब थैलियाँ।।

है कहाँ परवाह किसको, इस सियासी खेल में।
कौन बीमारी लिये है, आज धक्कम-पेल में।।
चुटकियों में बदल सकती, हैं जहाँ धारा कई।
हो रहे हैं खेल घाती वहाँ रेलम-रेल में।।

मौन हैं कानूनविद सब, मौन हैं सब कचहरी।
बाज सी हैं नजर पद पर, बने हैं सब गिलहरी।।
हैं कबूतर से बने बैठे सियासी भेड़िये।
नैन में पाले हुए हैं, ख़ाब सारे सुनहरी।।

29/4/21              ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 11 November 2021

छठ पूजा पर

(दुर्मिल सवैया छंद)
(1) छठ पूजा पर

पत्नी पति से कहतीं सजना, कब आवत हो छठ आय गयी।
तुम आ न सके पछिले हफ्ते, मन दीपक जोत जराय गयी।
छठ पूजन में नहिं छूट तुहें, दउरा फल, सूप मँगाय लयी।
फटही सरिया नहिं घाट चलूँ, नवकी सरिया ह किनाय लयी।।
10/11/21                             ~अजय 'अजेय'।

(2) बिरह निवेदन 

पत्नी पति से कहती सुनिये, अब आप घरे कब आय रहे।
जस भूलि गए अपने जन को, हमको अस खूब सताय रहे।
जब आय रहे पिछले बरिसौं, मनको तुम खूब लुभाय रहे।
कुछ भूल भई हमसे जदि तो, अब  माफ करो सिर नाय रहे।।

मन आकुल है अब लौटि परो, हम कान धरै लखते रहिया।
करि याद रहे बचवा-बचिया, मन भाय न दूध न ही दहिया।
तुमसे हमरी मुस्कान सजे, तुमसे हरषाय हमार जिया।
तुम जीवन के इन्जन सम हो, हम हैं जिसके पन्चर पहिया।।
11/11/21                              ~अजय 'अजेय'।