Saturday, 26 January 2013

टीस भरा सन्देश  

एक दर्द झलकता है, इस सन्देश में परम 
कुछ प्रश्न कचोटते से, हो चले हैं अब अहम् 
किसकी तरफ हो आस लगाकर के देखते ?
इस मर्ज़ की दवा भी तो खोजेंगे आप हम .

सरकार कौन है ? ये जरा ध्यान कीजिये ,
अपने विचार में जरा बयान कीजिये ,
हम जैसा ही कोई है जो कुर्सी में बैठा है ,
और पाले बैठा है न जाने कौन से वहम .

बदलेगी ये तस्वीर जब सब खुद को आंक लें .
औरों की छोड़, अपने गिरेबान झाँक लें, 
भाई भतीजावाद और कुर्सी की न हो बात .
जहाँ दांव पर लगा हो मेरे देश का भरम .

26 जनवरी 2013              ....अजय 

Saturday, 19 January 2013

नापाक इरादों वाले

"नापाक" इरादों वाले ....

मेरे सब्र की दीवार पर पत्थर न फेंक 
तू,

जो ढह गयी तो ढायेगी तुझ पर बड़ा

कहर।

शाम की अलाव की चिनगारी नहीं मैं,

हूँ जलजला, गुम करूँगा कस्बे, कई

शहर।

तू भूल गया बीती बातें... वो रोटियां,


एक थाल से खाते थे जो हम साथ बैठ

कर।

खेला किया है तू मेरे जज्बात से अब

तक, 

अब चेत ले वरना न देखेगा तू कल सहर।


विषधर है तू, मैं जानता हूँ जन्म से

तुझको,

अब बाज आ, तू तज दे, प्रतिदिन छोड़ना

जहर .

तू नाग भी हो तो मुझे परवाह कुछ नहीं,

हमारे कृष्ण हैं जिसने नचाया 
कालिया

नथ कर।

फिरा हूँ आज तक तुझको लिए गर्दन में मैं

अपने,

भुला बैठा है तू "तांडव", भुला बैठा

....कि मैं "शंकर"।

                                   ~अजय 'अजेय'।

Thursday, 3 January 2013

(दामिनी की अंतिम सदा)

अलविदा ... माँ , अलविदा 
(दामिनी की अंतिम सदा)


अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न 
मैं थक गई हूँ , और अब, होता  नहीं सहन 

बदन की खरोंचें तो शायद सह भी मैं जाती 

कैसे दिखाऊं मैं तुझे, टूटा हुआ ये मन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

वस्त्रों का आवरण मेरा, नज़रों की खातिर था 

कैसे बचा पाती, पतित नैनों से अपना तन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

साँसें उखड़ रहीं हैं ...अब, सुन आखिरी वचन 

पैदा न करना तू ... मेरी, अब दूसरी बहन 
अब चल रही हूँ माँ ... ला, दे, ओढ़ लूँ  कफ़न

अलविदा ..., अलविदा, ..... माँ  अलविदा ...

अब चल रही हूँ ..................................। 

Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.
Main thak gayi hoon aur ab, hota nahi sahan.

Badan ki kharonchen to shayad sah bhee main jatee,...

Kaise dikhaun main tujhe, toota hua ye man,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Vastron ka aavaran mera nazron ki khaatir tha...

Kaise bacha paatee, patit nainon se apna tan,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Saansen ukhad rahi hain... ab, sun akhiree vachan...

Paida na karna ab meri tum doosaree bahan,
Ab chal rahi hoon maa... , la, de, odh loon kafan.

Alvida...    alvida,  maa....Alvida.

Ab chal rahi hoon.................


Monday, 3 December 2012

भ्रष्टाचार 


नहीं पहचाना मुझे ..................???
भई ... , सबका खास, सबका दुलारा 
सबकी जुबान पर, चढ़ा चटखारा
दिमाग पर इतना भार मत दीजै ...
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।

सुकून जो देता है,
मन भी मोह लेता है 
औरों को कष्ट दे, तो  मेरी बला से ...
कूटनीति भरा ऐसा एक विचार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा,
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।


सुननेवाला सुने न सुने 
कहने वाला अपना ही सर धुने 
जो बिन माँगी सेवाएं खुद-ब-खुद चुने, 
सचल दूरभाष तंत्र का अनचाहा  संचार हूँ मैं 
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

सब जानते भी हैं मुझे, पहचानते भी हैं 
और वक़्त पड़ने पर मुझे स्वीकारते भी हैं
दूसरों की पत्तलों में अशोभनीय हूँ मगर 
अपनी थाली में तो  सत्कार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

कभी आदाब में हूँ , तो कभी सलाम में हूँ 
और कभी रौनक में डूबी हुई शाम में हूँ 
अवाम की नजर में शिष्टाचार सा लगे, 
सफेदपोशों का वो कुटिल नमस्कार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

उँगलियाँ न उठीं तब तक, वारे- न्यारे हैं , 
जब धर लिए गए तो किस्मत के मारे हैं , 
" इल्ज़ामात  बेबुनियाद " का है राग दरबारी 
सच्चाई तो ये है कि  व्यभिचार हूँ मैं
चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं।

हेय हूँ जुबान पे,..हर  दिल में बसा हूँ ,
छूटने न पाए जो, मैं ऐसा नशा हूँ ,
विश्वास न हो तो जरा दिल फाड़ कर देखो 
तुम्हारे रक्त में मिश्रित असल गद्दार हूँ मैं
भ्रष्टाचार,... भ्रष्टाचार,... भ्रष्टाचार हूँ मैं ...

चटपटा, स्वादिष्ट, खट -मिट्ठा या खारा, 
भुलाया न जा सके, वो अचार  हूँ मैं। 

03 दिसंबर 12                      .......अजय 



Sunday, 11 November 2012


शुभ दीपावली 


सबको  दीपोत्सव की शुभकामनाएँ 
खुशियों के दीपक में प्रेम - बाती जलाएँ 
रोशनी भरपूर हो, ऐसे अँधेरा  मिटायें 
गुज़ारिश भी है मगर कि पटाखे न चलायें

ये धरती हमारी, आसमां  हमारा है दोस्तों 
हर हाल में प्रदूषण से बचाना है दोस्तों 
माँ की गोद में सोते दुलारे की नींद न उचट जाये 
कुछ ऐसी फुलझड़ियाँ जलाना है दोस्तों 

बुजुर्गों की साँसों के लिए, महफूज़ रहे ये हवा 
कल सुबह को उठ के, मांगें न वे कोई दवा 
न ही किसी हादसे की खबर हो अखबार में 
ख़ुशी का माहौल है, सब खुश रहें त्यौहार में।


11नवंबर 12                                          ......अजय 

Wednesday, 31 October 2012


संतोष 


लोग चाहते रहे जिंदगी भर मगर 

क्या मिला, उनको अब भी, नहीं है खबर

कह रहा हूँ मैं, अब भी सबर कीजिये

जायेंगे किस डगर, अब संभर लीजिये 


जो मिल गया उसे ही सँवार लीजिये
 
जो खो गया उसे, गर्त में दीजिये

 
जो बीत गया उस दिन का, क्या रोना दोस्त  


जो हाथ में है, उस में ही मौज लीजिये .



31 अक्तूबर 12               .....अजय 

Thursday, 18 October 2012

चाहतों का सिला


चाहतों का सिला

मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं 
तुम सजे  महल हो मैं उजड़ा किला हूँ

तुम शरद की धूप हो उर्जा भरी
और सावन मास की खेती हरी
ग्रीष्म में पीपल की ठंढी छाँव तुम
वृष्टि की हो गुदगुदाती फुलझरी
गरल का शिव की तरह मैं पान कर लूँ
सुधा का भर पात्र मैं तुमको पिला दूँ
मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं .......

जब भी हम बोझिल हुये तुमने दिशा दी
स्याह काली निशा को तुमने प्रभा दी
शुष्क रेगिस्तान में सरिता बहा दी
डूबती साँसों को तुमने फिर हवा दी
मैं ऋणी हर पल तुम्हारे स्नेह का हूँ
हो नहीं सकता की मैं तुमको भुला दूं
मैं तुम्हारी चाहतों का क्या सिला दूं ......

कह  रहा हूँ प्रेम  में रस से भरा
वृक्ष हो तूम मैं हूँ  एक पत्ता हरा
शक्ति पाता हूँ तुम्हारी शाख से
मैं हवा में झूलता तुमसे धरा
सोचता हूँ किस तरह तुमको सजा दूँ
महकते पुष्पों की मैं कलियाँ खिला दूँ 
मैं तुम्हारी चाहतों  का क्या सिला दूं ..... 

                                   .........अजय
o8/10/10

Sunday, 2 September 2012

आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ ...

आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ ...

अपने मन का हाल बताने निकला हूँ
आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ 

घर के दरवाज़े से जैसे बाहर आया
खाकी वर्दीधारी ने डंडा खडकाया 
Àaकहाँ चल दिए...?  पता नहीं १५ अगस्त है ? 
सड़क बंद है आज शहर में सिर्फ गश्त है.
मैं बोला, झंडा फ़हराने निकला हूँ 
आजादी का जश्न मनाने निकला हूँ 

जैसे - तैसे हिम्मत बांधे आगे आया 
चहल पहल को शहर से पूरे गायब पाया
बिखरा है सन्नाटा जैसे कोई हर्ट है 
पूछा तो जाना... भई सिक्योरिटी- अलर्ट है
रिक्शे वाले से पूछा, फिर तुम क्यों आये ?
बोला, जी... रोटी कमाने निकला हूँ
आजादी का जश्न मानाने निकला हूँ 

धीरे-धीरे सहमा सा पहुंचा मंडी में
आग लगी देखी सब्जी, भाजी, भिन्डी में
ठेले वाला चीख-चीख आवाज़ लगाए
ग्राहक रह-रह जेब में अपने हाथ फिराए
हालत पतली क्रेता-विक्रेता दोनों की
महंगाई का हाल सुनाने निकला हूँ 
आजादी  का जश्न मनाने निकला हूँ 

३१ अगस्त १२           ~अजय 'अजेय' ।

Saturday, 25 August 2012

मैं कमल हूँ...

मैं कमल हूँ...


धूल में लिपटा रहूँ या पंक से सनूँ ,
हूँ कमल मैं, और हर दम ही खिला रहूँ 

धूप हो या छाँव हर मौसम में मैं हँसूं
रंक हो या नृप सबके ह्रदय में बसूँ 

मंदिरों में मूर्तियों की अर्चना जब हो
देवता और देवियों की प्रार्थना जब हो 
धूप और दीप की प्रतिअर्पना जब हो
पुष्प और प्रसाद के संग मिल के मैं चढूँ

गम में कोई डूबे तो उसको हौसला मैं दूं
जो हो कोई मजबूर, उसको आसरा मैं दूँ
दुःख दर्द के वनों को सदा काटता चलूँ 
खुद खुश रहूँ मैं  और ख़ुशी बांटता चलूँ 

२५ अगस्त १२                             ...अजय

Saturday, 11 August 2012

आपकी सदा

आपकी सदा...


आपकी सदाओं ने हमें खींच लिया

किसी गर्म आगोश ने जैसे भींच लिया


पहुँच ही गए आपके दर घूमते-फिरते

 
और मन के सूखते दरख्तों को आज सींच लिया


कविताएँ,गीत,ग़ज़लें... नहीं सिर्फ बहाने हैं



इनके जरिये ही हमें मुरझाये गुल खिलाने हैं

और इनसे ही, बिछड़े दिल भी मिल जाने हैं







                                                           ....अजय 

Thursday, 9 August 2012

सपना...अपना अपना

सपना अपना-अपना...


हर शख्स सिर्फ अपना है
सबका अपना सपना है 
औरों को समझे कोई इतना वक़्त ही नहीं
हर घड़ी हर पल वह सिर्फ अपना है

क्यों नहीं समझता मैं इस तथ्य को

क्यों समझाना चाहता हूँ मैं अपनी बात किसी अन्य को
पर जब भी ऐसा करता हूँ , मैं यह भूल जाता हूँ
खता उसकी नहीं, मेरी ही है क्योंकि......
उसका नजरिया उसका अपना और मेरा अपना है
सबका अपना सपना है 
हर शख्स सिर्फ अपना है 

  10 अप्रैल 93                         ...अजय 

Saturday, 4 August 2012

घनघोर बदरवा

घनघोर बदरवा...  


घिरि आओ घनघोर बदरवा...
घिरि आओ घनघोर.
खेतों की माटी है प्यासी...
छाई है चहुँ ओर उदासी
आकर अपने पावन जल से
मन कर जाओ विभोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर.

पेड़ों के पत्ते तक आकुल ...

तुम ना आये सब जन व्याकुल
कहाँ खो गए श्याम-सांवरे
अब न सताओ और बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर .

राह तुम्हारी देख रहे हम...

मन में दबा हुआ बिछोह-गम
तुम आओ तो सावन लाये
साजन को घर ओर बदरवा
घिरि आओ घनघोर बदरवा
घिरि आओ घनघोर.
04 अगस्त 12                  .....अजय 

Monday, 31 October 2011

धर्म युद्ध

" धर्म-युद्ध "
(हैदराबाद में तसलीमा नसरीन की पुस्तक 
विमोचन समारोह -२००७ पर हमले से प्रेरित)

कुछ फूल फर्श पर पड़े हुए,
कुछ शीश शर्म से गड़े हुए 
कुर्सियां गिरीं आड़ी - टेढ़ी
हैं लोग धर्म पर भिड़े हुए

जो बात कही... वह उनकी थी 
क्यों मेरे कान हैं खड़े हुए 
क्यों भड़क उठा हूँ मैं उन पर
अपने विचार ले अड़े हुए

वे भी तो हैं मेरे घर के
उन ने भी दुनिया देखी है 
उन पर क्यों खुद को थोपूं मैं 
जिसने सब ग्रन्थ हैं पढ़े हुए 

सलमान हों या तसलीमा हों 
सबकी अपनी ही सीमा हों
कोई न किसी को बहकाए
कोई न किसी को धमकाए 
मर्यादा में हर धर्म चलें
मर्यादा में हर कर्म पलें
हर धर्म से लो उनकी खूबी
सब धर्म रत्न से जड़े हुए 

९ अगस्त०७                  ...अजय 

Saturday, 8 October 2011

Naasamajh

ना-समझ... 

दर्द को तो सभी ने सहा है मगर ,
"दर्द" से कोई परिचय कराता नहीं

प्रेम में सबने आहें भरीं हैं मगर, 
"प्रेम" क्या है, ये कोई बताता नहीं

हंसते देखा है सबको हजारों दफा ,
पर "ख़ुशी" क्या है ,कोई सुझाता नहीं

हसरतें हैं उजालों की सबको यहाँ, 
"रोशनी" कोई मुझको दिखाता नहीं

पोथियाँ लिख गए हैं करोड़ों गुरु,
"सत्य" क्या क्या है, समझ फिर भी आता नहीं

नासमझों की बस्ती में हूँ आ गया, 
"ना-समझ" कोई कहता, तो भाता नहीं

एक ही बात खुद से हूँ समझा यहाँ,
कोई दूजा किसी का, विधाता नहीं

मेरे "अज्ञान" का दोषी खुद ही तो हूँ,
जो कदम अपना खुद मैं बढाता नहीं.

                                                                  ...अजय 

Tuesday, 4 October 2011

Sarhad Ke Paar

सरहद के  पार भी...

सरहद  के उस पार भी... 
एक ऐसा गाँव है. 
ऐसा ही पनघट है,
और बड़, पीपल की छाँव है.

लोरियां वहां भी, गाती हैं माताएं
सर्दी की शामों को जलती अलाव है .
दर्द वैसा ही है, अपनों से बिछुड़ने का वहां, 
जैसे, यहाँ सीनों में रिसता यह घाव है .

वैधव्य की कसक उतनी ही, कसैली है वहां भी,
जितनी चुभन भरी, "सफ़ेद साड़ी" की छाँव है.
रक्त  का रंग  उतना  ही, सुर्ख  है वहां भी,
उतना ही पावन , महावर लगा पाँव है.

बेटों की मौत पर, वहां भी बहते हैं अश्क ही,
जैसे यहाँ शहीदों के लिए, होता यह स्राव है.
माँ की ममता तो, वहां भी शीतल ही है,
नदियों के घाटों पर, वही लकड़ी की नाव है.

जब सब एक सा है, तो कौन ऐसा कर गया...?
भाइयों के बीच का वो भाई-चारा मर गया.
साथ बैठ कर खाता, था उसी थाली में जो,
प्रेम की थाली को, अपने हाथों बेध कर गया 

०४ अक्तूबर ११                                                                                   ...अजय 

Sunday, 2 October 2011

Ghazal - Chaand ko aainaa....

चाँद को आइना ...


चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई 
एक रूठे हुए साथी को , मना रहा है कोई .
चाँद को आइना दिखा रहा है कोई

जैसे मुरझा रहा हो, गुल खिल के 
वैसा चेहरा, दिखा रहा है कोई .
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

रूठने से क्या कभी भी, कुछ हुआ हासिल 
मुझ पे बस जुल्म, ढा रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

वे जो रूठे तो, बदलियाँ छायीं
लब पे उनके, हंसी को, बुला रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

खताएं तेरी हों , मेरी हों, इससे फर्क ही क्या
ना-खफा हो, अब सर तो, झुका रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

मान भी जाओ, मुस्कुरा दो, अब तो 
ये तो सोचो, कि अपना ही, मना रहा है कोई
चाँद को आइना, दिखा रहा है कोई

०१ अक्तूबर ११                                            ...अजय 

Thursday, 22 September 2011

"जीवन-पथ"

"जीवन पथ"

तुमने है एक राह चुनी 
फिर पीछे कदम हटाना क्यों ?
राह  में कुछ काँटे भी  होंगे 
काँटों से घबराना क्यों ? 

कोई ऐसा पथिक नहीं है 
जिसको हर पथ सुगम मिला हो
कोई ऐसा जीव न देखा 
जिसको कोई गम न मिला हो

बाधाएं पग-पग पर होंगी 
होना मत मायूस कभी 
मायूसी को ठोकर दोगे 
जीतोगे तुम जंग तभी 

मत स्वीकारो हार अभी से 
जीवन पथ काफी लम्बा है 
खुद को यूँ मजबूत करो जो 
लगे गड़ा लौह - खंभा है.

२१सितम्बर ११                           ...अजय 

Wednesday, 14 September 2011

Matribhasha-Hindi (मातृभाषा "हिंदी")

मातृभाषा  "हिंदी"

दुल्हन के माथे पर शोभित, 
जैसे होती कोई बिंदी, 
भारत के माथे पर भी है,
झिलमिल करती, बिंदी हिंदी। 

"देवनागरी" से सज्जित, 
यह देवनगर की बेटी है, 
अलंकार से भरी हुई यह, 
रस, छंदों की पेटी है। 

"दिनकर", "हरिवंश", "निराला" की, 
"जयशंकर", "धनपत लाला" की,
"मैथिली", "महादेवी", "बेढब", 
लाखों की यही चहेती है। 

"सक्सेना के. पी." भी जानें,
"चौबे प्रदीप" भी हैं माने,
यह "शैल चतुर्वेदी" की बान,
हिंदी "अशोक"(चक्रधर) जी की है जान। 


हिंदी में पुष्प खिले "अनुपम",
जैसे कि  हैं "अमृत प्रीतम",
"बैरागी" ने इसको सींचा,
"शैलेश" ने है ऊपर खींचा,
यह भाषा "अटल बिहारी" की, 
उपवन सुन्दर, यह बागीचा।
"हुल्लड़" ने धूम मचाई है, 
नाटक रचते "परसाई" हैं,
हैं "रेनू फणीश्वर" कथाकार, 
"श्री लाल शुक्ल" सा व्यंगकार,
इसमें रमते "मासूम रजा", 
जिसने है "आधा गाँव" रचा। 

हमने अंग्रेजी अपनाई,
जो पार-समंदर से आई,  
उर्दू को भी तो  अपनाया, 
जो दूर मदरसों से पाया,
फिर हिंदी को क्यों छोड़ चलें,
जो माता भी, और है 'आया'।  

दैवी वरदान, जुबान है ये, 
मेहमान नहीं, घर-बारी है, 
इसका न कोई अपमान करे, 
समझो यह मातु हमारी है। 

आओ अब यह संकल्प करें,
अपना प्रयास यह अल्प करें, 
अपनी हिंदी में एक पत्र, 
लिखें और काया-कल्प करें। 

२६ जनवरी २००४                              ...अजय। 

Monday, 29 August 2011

LEKH - ATANKVAAD : VYADHI AUR UPCHAAR

आतंकवाद  : व्याधि  और  उपचार

          कलम ने विराम लिया और विचारों की बेल को जैसे सहारा मिल गया.श्रृंखला की भांति ,एक के बाद एक जैसे कड़ियाँ जुड़ती चली जाती हैं,विचारों  ने  राह  पकड़  ली. विचाराधीन विषय था- आतंकवाद . एक लघु-अंतराल के बाद मैंने कलम को फिर जीवंत कर दिया; डर था कहीं कुछ छूट न जाये. मुझे लगा कि आतंकवाद एक व्याधि है- बीमारी है. और यदि यह सत्य है तो मुझे इस व्याधि का निदान खोजने का प्रयास तो अवश्य ही करना चाहिए . आवश्यकतानुसार मुझे इसके कारण, प्रसार के माध्यम ,इसके शिकार एवं निदान पर गहन विचार करने की प्रेरणा मिली और मैं सोचने लगा....जिस प्रकार अन्य व्याधियों के निदान खोजने की प्रक्रिया है उसी प्रकार के प्रयास इस व्याधि का उपचार खोजने में भी मददगार साबित होंगे - ऐसा ख्याल मेरे ज़हन में उभरा . एक बार  जो   गाडी आगे बढ़ी तो मार्ग स्वयं साफ़ होता गया. 
आतंकवाद के कारण  इस व्याधि के कारणों की तलाश आरम्भ की तो निम्न कारण  नज़र में आये :-
         (क)   नाराजगी
         (ख)   लालच
         (ग)   मजबूरी
         (घ)   राजनीतिक धर्मान्धता
नाराजगी   हर वो व्यक्ति जो "आतंकवादी" का तमगा पहने हुए है वह  अपने मन में नाराजगी का शोला पाले हुए है जिसे समुचित संसाधन एवं परिवेश मिलते ही वह धधक उठता है इस नाराजगी का कारण उचित अथवा अनुचित दोनों ही हो सकते हैं. उस व्यक्ति की नाराजगी प्रशाशन से, समाज से, व्यवस्था से, व्यक्ति से, संस्था से,
अथवा वर्ग-विशेष से हो सकती है .
लालच    आतंकवाद का दूसरा कारण किसी व्यक्ति की लालची प्रवृत्ति भी हो सकती है. अभाव में जी रहे लोगों में ऐसी प्रवृत्ति का पनपना काफी हद तक संभव है. इससे जुड़ा हुआ सबसे बड़ा सच यह है कि आतंकवाद फैलाने वाली संस्थाओं को ऐसे व्यक्तियों कि हमेशा तलाश रहती है क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में पल रहे लोगों का ऐसी संस्थाओं के जाल में फंसने  की काफी सम्भावना रहती है. लालच-वश ऐसे लोग इनके चंगुल में फंस कर आतंकी गतिविधियों में लिप्त हो सकते हैं.
मजबूरी   कई बार आतंकी संस्थाएं ऐसे लोगों को अपने चंगुल में जकड लेती हैं जो मजबूर या लाचार हैं ; जैसे गरीब और बेरोजगार युवक या बच्चे तथा आवेश - वश कभी-कभी गैर कानूनी अथवा गैर सामाजिक कार्य करने वाले लोग. एक बार चंगुल में आ जाने पर ऐसे लोग आतंकवादियों के इशारों पर नाचने को मजबूर हो जाते हैं तथा उनकी हर गलत-सही बात मानने को मजबूर कर दिए जाते हैं .
राजनीतिक धर्मान्धता   कभी-कभी सत्ता-लोलुप राजनीतिज्ञ अपनी मंशा पूर्ण करने के लिए आतंक फ़ैलाने वालों को छिपे तौर पर प्रश्रय देते हैं तथा झूठे धर्मान्ध्तापूर्ण प्रचार करके समाज को आतंक की लपटों में झोंक देते हैं. ऐसे राजनीतिज्ञ यह भी भूल जाते हैं  कि वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं और आज वे जिस विषैले बीज को रोपित तथा सिंचित कररहे हैं वह कल बड़ा होकर जब एक आतंकवादी वृक्ष के रूप में आपनी जड़ें मजबूत कर लेगा तब वह इस समाज को विषैले फलों के सिवाय और कुछ नहीं देगा.
आतंकवाद के शिकार   इस व्याधि का सबसे बड़ा शिकार समाज हैं जो व्यक्तियों ,वर्गों औरजातियों के समूह के रूप में स्थापित है. यही नहीं ,यदि हम समाज की 'संकुचित' परिभाषा के पार हो करदेखें तो यह व्याधि देश, विदेश तथा सम्पूर्ण विश्व में मानवता के लिए एक अभिशाप बन कर फैलती जा रही है.दुनिया के समस्त राष्ट्र इससे पीड़ित एवं भयाक्रांत हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, भारत और श्रीलंका जसे देश आए दिन इसका शिकार हो रहे हैं
बच्चे , बूढ़े , महिलायें,अमीर ,गरीब; समाज का कोई भी अंग इस व्याधि से अछूता नहीं रह गया  है . आज किसी के भी दामन पर इसके नापाक छींटों की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है.
आतंकवाद के लक्षण   इस बीमारी का सबसे बड़ा लक्षण है समाज में भय या डर का व्याप्त होना . जिस समाज में भय की बहुलता हो उसमे आतंकवाद बहुत तेजी से फैलता  है. इसके विपरीत जो समाज भय-विहीन होकर इसका मुकाबला करने को तत्पर रहता है वहां यह स्वयं को न तो स्थापित कर पाता है और न ही प्रसारित कर पाता है अर्थात आतंकवाद का विरोध करने की सबसे अधिक क्षमता यदि किसी में है तो स्वयं समाज में ही है.
सुरक्षा  बलों की तैनाती तो इस  व्याधि  के  फैलने के बाद  उससे गुत्थम - गुत्था हो कर उसे समाप्त करने के लिए की जाती  है ,किन्तु यदि समाज चौकस  सतर्क और भय-रहित  रहे तो शुरूआती  दौर में ही इस बीमारी को (आतंकवाद को) फैलने से पहले ही दबाया जा सकता है जिससे की इसे पनपने का कोई मौका ही न मिल सके . इस प्रकार समाज को  मानव शरीर के रूप में देखें जिसमे सभी रोगों से लड़ने की अंदरूनी क्षमता स्वतः ही विद्यमान है . और चूंकि समाज ही इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार है, इसलिए उसे ही सर्वप्रथम प्राथमिक उपचार वाले कदम उठाने चाहिए . 
आतंकवाद का उपचार   जिस प्रकार किसी भी बीमारी से बचाव के लिए रोक-थाम ही पहला व जरूरी कदम है,
उसी प्रकार आतंकवाद के उपचार में भी सबसे अहम् भूमिका रोक-थाम की ही है.इसके कारणों पर गहन विचार करते हुए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि कारणों को ही जड़ से मिटाया जा सके .यह कार्य दो संस्थाएं बखूबी कर सकती हैं . पहली संस्था  है समाज तथा दूसरी है सरकार.समाज को सदैव सजग रहते हुए अपने प्राथमिक कर्त्तव्य का निर्वहन करना होगा .सरकार से पहले उसे स्वयं ही आगे आना होगा. हम सब ही तो  समाज का हिस्सा हैं फिर दूसरों को आरोपित करने से पहले हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए  .आप और हमसे ही समाज बनता है परन्तु जहाँ कहीं हमारी सामाजिक जिम्मेवारी निभाने की बात आती है वहां हम पीछे  हट जाते हैं . किसी भी घटनास्थल पर समाज का कोई न कोई प्रतिनिधि या घटक अवश्य मौजूद होता है.
और वह प्रतिनिधि अपनी सामाजिक जिम्मेवारी निभाते हुए सम्बंधित सरकारी संस्था को समय रहते सूचना दे दे तो संभवतः अनेको दुर्घटनाओं को होने से बचाया जा सकता है. समाज को अपने पास-पड़ोस में हो रही गतिविधियों के प्रति सजग और जागरूक रहना होगा. संदिग्ध कार्यों और उनसे सम्बद्ध प्रत्येक  व्यक्ति अथवा संस्था के खिलाफ बेझिझक औरनिडर होकर उंगली उठानी  होगी. " मुझे फर्क नहीं  पड़ता... मैं क्यों करूँ " की प्रवृत्ति छोडनी होगी. हमेंअपने भीतर से भय को निकाल फेंकना होगा. क्योंकि ये भय ही तो है जिसका लाभ  एक आतंकी उठाता है.यदि पहला और दूसरा व्यक्ति जिसे कोई आतंकी धमकाता है ,हिम्मत जुटा कर उस पर टूट पड़ें तो उसका हौसला स्वतः ही पस्त हो जायेगा. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक आदमी के लिए एक ही काफी होता है.ऐसी दशा में अधिक से अधिक वह एक या दो की जान से खेल सकता है, परन्तु अन्य लोगों की जागी हुई हिम्मत उसका कचूमर बना डालेगी . यही वह सामाजिक महामंत्र है जो आतंकवाद को जड़ से उखाड़  फेकने में कारगर सिद्ध होगा .आवश्यकता है तो बस इस महामंत्र को समाज के सभी अंगों की दिनचर्या में ढालने की , इसे रग-रग में घोल देने की.जिस दिन समाज भय- विहीन होकर आतंक को चुनौती देने लग जायेगा उस दिन से ही आतंक  की बीमारी का खात्मा होना शुरू हो जायेगा. इसके बाद दूसरी संस्था (सरकार) की जिम्मेवारी आती है . सरकार की नैतिक जिम्मेवारी है की वह अपने नागरिकों की सुरक्षा का ऐसा प्रबंध करे कि
कोई चूक न होने पाए . देश का खुफियातंत्र इतना चाक-चौबंद हो कि कोई हादसा पेश आने से पहले ही उसे भांप 
कर उचित कदम उठाया जा सके . हमें अपने सुरक्षा-बलों की क्षमता पर कोई शक नहीं है . जरूरत है तो सिर्फ उन्हें नवीनतम संसाधनों से लैस करने की तथा सदैव उनका ऊँचा मनोबल बनाये रखने की. न्याय प्रक्रिया को 
भी नए सिरे से सुदृढ़ करने कीआवश्यकता है जिसमें आतंकवाद सेनिपटने के लिए त्वरित एवं सख्त से सख्त
प्रावधान हों . आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों को आम गुनह्गारों की श्रेणी से अलग रखा जाए. उनके खिलाफ जल्द से जल्द और सख्त से सख्त सजा का प्रावधान हो जिसे देखकर किसी भी गुनाहगार की रूह काँप उठे . साथ ही साथ यह सबसे जरूरी है की सरकार अपने नागरिकों की समस्याओं के प्रति सदैव सजग रहे और उन्हें अनदेखा न करे .समय रहते ही उनका समाधान निकाले जिससे किसी के मन में दुर्भावना पलने न पाए . इसके बाद एक तीसरी संस्था संचार माध्यमों की है जो आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने में अहम् भूमिका निभा सकती है. मीडिया को चाहिए की वे अपना कार्य करते वक्त देशहित को नज़रंदाज़ ना करें . अंततः यदि ये  तीनों  संस्थाएं मिलकर अपना -अपना कर्त्तव्य निष्ठापूर्वक निभाएं तो निश्चय ही आतंकवाद रुपी व्याधि से छुटकारा मिल जायेगा .

जय हिंद - जय भारत .



   

Saturday, 20 August 2011

Aazadee

आजादी

बापू यह कैसी आजादी 
तूँने हमको क्या दिलवा दी ...
बापू यह कैसी आजादी

पूछ रहे हैं दीन-हीन जन 
पूछ रहे हैं दुखियारे  मन 
पूछ रहे हैं बागीचे-वन 
तूँने हमको क्यों दिलवा दी ,  बापू यह ऐसी आजादी ? 

जिनको चलना आगे आगे 
वे पैसों के पीछे भागे 
टूटे नैतिकता के धागे 
घर घर में है आग लगा दी , बापू यह कैसी आजादी ? 

हक़ की बात करे हर कोई 
जिम्मेदारी नहीं है कोई 
माँ  बहनों ने अस्मत खोई 
हालत देख आत्मा रोई 
दोषी छुट्टे घूम रहे हैं ...
निर्दोषी को जेल दिला दी , बापू यह कैसी आजादी ?
शिष्य गुरु से अकड़ पड़े हैं 
भाई भाई झगड़ पड़े हैं 
पति पत्नी में रगड़ पड़े हैं 
रथ के पहिये जकड़ पड़े हैं 
जाने कैसी ग्रीस लगा दी , बापू यह कैसी आजादी ? 
तूँने हमको क्यों दिलवा दी ,  बापू यह ऐसी आजादी ?

                                                                                                   ... अजय