Monday, 20 June 2016

योग बनाम योगा

'योग' ही रहने दो 'योगा' न बनाओ... 

अ को 'अ' ही रहने दो.... यूं  'आ' न बनाओ, 
योग को 'योग' रहने दो....'योगा' न बनाओ।

मैंने कब इंग्लैंड को 'इंग्लैंडा', ब्रिटेन को 'ब्रिटेना' कहा, 

मेरे हिन्द को 'हिन्द' ही रहने दो, 'इंडिया' न बनाओ।

अंग्रेजीयत का प्रदर्शन करने वालों से कोई जलन नहीं,

मगर मेरे 'महाराष्ट्र' को..... 'महाराष्ट्रा' न बनाओ। 

मुझे प्यार है असीम.... मेरी भाषा के शब्दों से,

आंध्र को 'आंध्र' ही रहने दो... 'आंध्रा' न बनाओ। 

कभी 'अकबर' को 'अकबरा', 'माइकल' को 'माइकला' न कहा,

अशोक को भी 'अशोक' रहने दो... 'अशोका'न बनाओ।

मैंने बाइबल को 'बाइबल', कुरान को 'कुरान' ही रहने दिया,

तुम भी रामायण को 'रामायण' कहो 'रामायना' न बनाओ।

हिन्द ने जीसस को 'जीसस', मोहम्मद को 'मोहम्मद' ही रखा,

तो राम को भी 'राम' ही रहने दो ... 'रामा' न बनाओ।

मैंने हर नाम का सम्मान, हर भाषा की इज्ज़त की है,

तो फिर नरेन्द्र को 'नरेन्द्र' रहने दो, 'नरेन्द्रा' न बनाओ। 

योग-दिवस की पूर्व संध्या पर, पुनः निवेदन है मेरा,

मेरे योग को 'योग' ही पुकारो, 'योगा' न बनाओ। 

20 जून 2016                                  ~अजय'अजेय'

Saturday, 11 June 2016

इश्क़ के सदके...

इश्क़ के सदके में...


इश्क़ के सदके में कुछ झुकना जरूरी है,  

दी किसी ने है सदा, रुकना जरूरी है।


छोड़ कर पीछे उन्हें कैसे बढ़ाएँ हम कदम,


कारवाँ की रीत है....... रुकना जरूरी है। 



रुक गए हैं हम तुम्हारी बात को सुनकर, 

अब हमारी बात भी सुनना जरूरी है।


वह दिखाता है वही जो वास्तव मे है,

उसको यारों "आईना" कहना जरूरी है॥


10/06/2016                     ~~~अजय।

Wednesday, 8 June 2016

मैं जब "हम" में बदल जायेगा

मैं जब हम में बदल जायेगा...

'मैं' जब 'हम' में बदल जायेगा,
सामने खड़ा पाषाण भी पिघल जायेगा।
दो बूंद प्रेम के अल्फ़ाज में रख,
शिकवों का पहाड़ भी गल जायेगा।
कितने दोस्त बिछड़े, 'मेरे' 'मैं' की दौड़ में,
'हम' से जुड़ कर देख, पीछे कारवाँ चल जाएगा। 
'मैं','मेरा', 'तू','तेरा'... 'हम' को तोड़ता रहा,
'अहं' नकार दीजिये, 'हम' स्वयं ही पल जाएगा।
'मैं' 'मैं' करते गुजार दी, जवानी अगर,
बुजुर्गियत के साथ... हाथ हाथ से फिसल जाएगा॥ 

07/06/16                            ~अजय 'अजेय'। 

Monday, 16 May 2016

तेवर

तेवर...

सूखने लगा है छद्म-प्रेम का सरोवर,
तल्खियाँ जुबान पर आने लगी हैं,
बदलने लगे हैं अब जनाब के तेवर,
बदलियाँ रिश्तों पे अब छाने लगी हैं।


16 मई 16 ~~~अजय.

Sunday, 24 April 2016

परिचय

   परिचय
"?"

पहचाना मुझे ?...नहीं न ?
इसी बात का तो दुख है ! कोई मुझे पहचानता ही नहीं । खैर, ... चलो, मैं स्वयं ही अपना परिचय  कराता हूँ।
शक्ल-सूरत से टेढ़ा-मेढ़ा दिखने वाला मैं, साधारण सा प्रश्न चिन्ह हूँ भाई। किन्तु ब्रह्माण्ड का कोई अंश ...नहीं जो मुझसे अछूता हो। मैं सर्व व्यापी हूँ । यह चिन्ह (?) तो मात्र मेरा द्योतक है जो मेरे वजूद को दर्शाने का कार्य करता है और यह सिर्फ उनके लिए है जो पढ़ना-लिखना जानते हैं । लेकिन मेरे अमूर्त एवं सत्य रूप से कोई अछूता रह  ही नहीं सकता। बल्कि यदि यह कहें की हर व्यक्ति के मस्तिष्क में मेरा वास हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
पर्याय  मेरे कई अन्य नाम भी हैं, जिनसे लोग मुझे जानते और महसूस करते हैं, भले ही वे पढ़ना-लिखना जानते हों अथवा नहीं। जैसे: जिज्ञासा, कौतूहल, उत्सुकता इत्यादि।
उपस्थिति  जब से एक बच्चा जन्म लेता है,तभी से उससे मेरा नाता जुड़ जाता है। "मैं कौन हूँ ?", "मेरे        आस-पास कौन लोग और कौन सी वस्तुएं हैं ?", "मेरे इर्द-गिर्द इतने लोग कौन हैं?", "मैं लेटा क्यों हूँ ? अन्य लोग चल फिर क्यों रहे हैं ?", "मुझे भूख लगे तो मैं क्या करूँ ?", "माँ को कैसे पास बुलाऊँ ?".... इत्यादि सहस्र प्रश्न हैं जो बच्चा हर पल सोचता रहता होगा। तो.....? तो ये, कि ये प्रश्न ही तो हैं जो उसके विकास का कारक बनते हैं..... यानि की "मैं"। मैं  ही हूँ जो उसके विकास में मूल भागीदार हूँ। मैं ही तो हूँ, जो उसमें विकास की चिंगारी प्रस्फुटित करता हूँ जिसके फलस्वरूप बच्चा प्रत्येक कार्य सीखना प्रारम्भ करता है।
अतः मैं घर में भी हूँ और बाहर भी हूँ तथा हर उस स्थान पर उपस्थित हूँ जहां प्रकृति है । विद्यालय में मैं, प्रत्येक कक्षा में मैं , प्रत्येक विद्यार्थी के विचारों में मैं, अध्यापक की जुबान पर मैं, प्रत्येक पुस्तक के हृदय में और हर पाठ के अंत में मैं हूँ। मैं हर परीक्षा की रीढ़ हूँ। मेरे बगैर कोई परीक्षा या साक्षात्कार सम्पन्न ही नहीं हो सकता।
मैं मंदिर, मस्जिद,गिरिजा एवं गुरुद्वारे में हूँ। हर भक्त की प्रार्थना के कारण में हूँ। मैं ईश्वर के प्रत्येक वरदान का प्रारम्भ हूँ... "कहो वत्स , क्या चाहते हो ?"।
मैं हर चिकित्सक/वैद्य  की जांच की शुरुआत हूँ ... "बोलो, क्या कष्ट/ तकलीफ़ है ?", "कैसी तबीयत है?", "यह परेशानी कबसे है?", "क्या नित्य-क्रिया ठीक से संचालित हो रही है?" अथवा "पहले कभी ऐसी समस्या हुई थी क्या?"। चिकित्सा पद्धति का अंत भी मैं ही हूँ..... "सब कुछ तो ठीक था, किन्तु दवा ने असर क्यों नहीं किया?", पोस्ट मोर्टम- "मृत्यु का कारण क्या है / क्या था ?"।
मैं हर अभिभावक की चिंता में हूँ। "बच्चे कैसे पढ़ेंगे - क्या बनेंगे ?", "उनका शादी-व्याह कैसे होगा? बहू कैसी होगी? दामाद कैसा मिलेगा?", "क्या हमारे बच्चे बुढ़ापे में हमारी कद्र करेंगे ?"।
मैं हर प्रेमी-युगल की उत्सुकता में हूँ। "क्या वह भी मुझे उतना ही चाहता/चाहती है जितना कि मैं उसे ?", "क्या वो सिर्फ मेरा है?", "क्या वो मुझसे शादी करेगा/करेगी?", "उसके परिवार के लोग कैसे होंगे?"।
ज्योतिष-शास्त्र में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के कौतूहल में मैं हूँ। कई बार तो मैं ऐसे रूप धर कर उपस्थित होता हूँ कि श्रोता भी विचलित होकर सोचने को बाध्य होता है कि , "क्या उसका विषय-ज्ञान अधूरा है ?" यही वह स्थिति है जब किसी नवीन खोज अथवा अन्वेषण की नीव पड़ती है। अतः, यदि मैं यह कहूँ कि हर विकास-प्रक्रिया के आधार मे मैं ही हूँ, तो कोई अतिशयोक्ति या बडबोलापन नहीं होगा।
विश्व के प्रत्येक अन्वेषण अथवा खोज का मूल आधार हूँ मैं। अध्यात्म के गुह्यतम रहस्यों तथा मंत्रों के खोज की आधारशिला हूँ मैं। मैं ऋषियों व सन्यासियों के भटकाव का कारण हूँ। मैं ही वैज्ञानिकों के फलसफ़ों की उद्गम-स्थली  हूँ। कण-कण में मेरा निवास है। निर्जीव-सजीव कोई भी मुझसे अछूता नहीं है।
क्या आप अब भी कहेंगे कि मुझे पहचाना नहीं ???????...
हा हा हा ...
एक और प्रश्न ? 
जी हाँ - मैं प्रश्न हूँ। हाँ भई  हाँ  "प्रश्न " और जहाँ भी मेरा यह  रूप   "?" दिखे  आप समझ लेना कि मैं हूँ। समझ गये न  "?"
23 अप्रैल 2016                                                                                                                   ~~~ अजय। 

Friday, 15 April 2016

चिराग

चिराग......

जलना तो नियति ही थी मेरी ...
घर का चिराग जो बना दिया सबने।


मैं उन्हें निराश भी करता कैसे ...
स्वधा का जरिया बना दिया सबने।


जिस पर यकीं किया आँख मूँद कर के...
बलि का बकरा बना दिया उसने।

जमानत बन कर छुड़ाते रहे जिनको...
क़ैद हमको ही दिला दिया उसने।

सूई की नोक से बचाने को सोचा जिनको...
पीठ में खंजर चुभा दिया उसने।

पालक भी नाम नहीं होती जज़्बात में अब...
आँख का आँसू सुखा दिया उसने।

छाता मान कर माथे पे रखा था जिसको...
ओला बन कर दगा दिया उसने।

24 अप्रैल 2016       ~~~अजय । 

Sunday, 10 January 2016

रोज देखता हूँ...

रोज देखता हूँ...

हर रोज देखता हूँ...
मैं मुँदी हुई आँखों से,
फ़लक पर तैरते ख़यालों के,
अदृश्य लहराते पांखों से,
बढ़ते हुये एक निवेश को,
सीढ़ियाँ चढ़ते पुत्र 'अनिमेष' को...
बढ़ती हुयी एक निधि को,
समृद्ध होती हमारी 'समृद्धि' को...
मैं रोज देखता हूँ...... 

हर रोज देखता हूँ...
खामोश विचारों की उड़ानों में,
हृदय की गुह्यतम खदानों में,
सोच की पर्वतीय ऊंचाई में,
समंदर की गहरी तन्हाई में,
परछाईं सी लिपटी एक विभा को,
मेरे हमदम, हमसफर 'निभा' को...
मैं रोज देखता हूँ...... 

हर रोज देखता हूँ...
बंद नयनों के प्रकाश में,
अनंत असीम, विस्तृत आकाश में,
अशक्त होते हाथ के आशीषों में, 
झुर्रियों को स्पष्ट दिखाते, शीशों में,
कुदरत की उत्कृष्टतम नायाबी को... 
मेरी माँ, देवी 'गुलाबी'को... 
मैं रोज देखता हूँ.........

हर रोज देखता हूँ...
दिन-ब-दिन धुंधलाती तस्वीर में,
जलती-बुझती यादों की तक्रीर में,
मंदिर के शंखनाद में, गिरिजा की घंटी में,
गुरुद्वारे की सेवा, मस्जिद की तक़्बीर में,
भागती-दौड़ती जिन्दगी को गिरते-सम्हलते,
जुटाने और सजाने की तदबीर में,
थक कर गिरते, फिर उठ कर चलते एक संवेदी को...
मेरे प्रेरणा-स्रोत पिता, स्वर्गीय 'भारती छेदी' को...
मैं रोज देखता हूँ......
02 जनवरी 16                ~~~ अजय॥ 


Thursday, 3 December 2015

विरह के पल...

विरह के पल... 

विरहन की है कामना बिलखती सी,
विरह की है वेदना झलकती सी,
तनहाई की चुभन भरी खामोशियाँ,
कोरे पन्नों पर कविताएं छलकती सी।

03 दिसंबर 2015 ~~~अजय।

Tuesday, 10 November 2015

जलो ऐसे कि.....

जलो ऐसे कि...

पियो इस तरह, कि तिश्नगी निकले,

जलो ऐसे कि, रोशनी निकले। 

रोज हँसते रहे हो, मेरी नाकामियों पे,
आज दिल से वो, दिल्लगी निकले। 

यूं हिकारत से, न देखा कीजै,

कभी तो नज़र से वो, पारगीं निकले।

हम भी तोहफे  हैं, इसी कुदरत के,

हमारे वास्ते भी, बंदगी निकले।

हमें न तिल-तिल कर, जलाए कोई,

जाँ निकले तो एक बारगी निकले॥ 

10 नवंबर 15                      ~~~अजय। 

(तिश्नगी=प्यास, हिकारत= हेय दृष्टि/नफ़रत, 
पारगीं=पूरानापन, बंदगी=प्रार्थना/पूजा )

Sunday, 8 November 2015

ससुराल...

ससुराल...
एक दिन बैठे-बैठे  ये कमाल हो गया,
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

मैं गुजरती थी बे-झिझक, बे-रोक गाँव से,
कोई बांध गया घुंघुरू दोनों ही पाँव से,
कहीं बज ना उठें... रोज का सवाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया। 

दो लटकती थीं चोटियाँ, काँधों के बगल से,
मैं होने लगी बे-दखल, अपने ही दखल से,
लट सिमट के जूड़ा बना है, बाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

उस दिन तो मेरे चलते, कदम ही रुक गए,
नैनों के पलक लाज से, स्वतः ही झुक गए,
स्वर्णिम मेरा कपोल , लाल-लाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

07 नवंबर 15                       ~~~अजय। 

Sunday, 25 October 2015

मशहूर हो गया...

मशहूर हो गया...

न खुल के दिल ही तोड़ा, ना रूबरू हुये ,
ज़ालिम ये इल्म तेरा मशहूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

हैरत है आज भी कि क्यों जुबां नहीं खुली,
बात मन में लिए मन की,  वो दूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

उसने भुला दिया मगर ये कैसे मैं करूँ,
इस दिल के आगे मैं तो, मजबूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

दिन रात सोचते रहे, कि क्या खता हुयी,
उसे चाहने में क्या बड़ा क़ुसूर हो गया ।... ज़ालिम ये ...

तुम झाँकते रहे दरीचों की आड़ से,
और कारवां मेरा नज़र से दूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

24 अक्तूबर 2015          ~~~अजय॥

Saturday, 10 October 2015

माँ कहाँ थी... तुम ही तो थे ।

माँ कहाँ थी... तुम ही तो थे...
(Sainwinians77 को समर्पित)

माह जुलाई, उन्नीस-सत्तर, 
अपनी चादर अपना बिस्तर,
बाबूजी जब छोड़ गये थे, 
तुम से नाता जोड़ गये थे,
कौन था साथी, कौन था रहबर ?....
माँ कहाँ थी......तुम ही तो थे....

बटन टाँकना ना था आया ,
वह भी तुमने ही सिखलाया,
गाँव छोड़ कर आए थे हम,
भीतर से गबराए थे हम,
उंगली, मेरी किसने थामी ?....
माँ कहाँ थी......तुम ही तो थे....

देखी थी कब कंठ-लंगोटी...?
तुम संग खानी सीखी रोटी,
चम्मच-कांटे थाम न पाते,
तुम जो हमको नहीं सिखाते,
फ़ीते जूतों के  बँधवाने ?....
माँ कहाँ थी........तुम ही तो थे .... 

रात ठिठुर कर सोया था जब, 
तनहाई में रोया था जब,
बिस्तर गीला कर बैठा था,
मैडम ने जब कान ऐंठा था,
ढाढस देने, साथ निभाने ?....
माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे....

दीवाली की रात वो काली,
सुलगी ज़ेब पटाखे वाली,
याद मुझे, वह मुड़ी कलाई ,
डॉक्टर से प्लास्टर चढ़वाई,
खुली शर्ट के बटन लगाने?....
माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे.... 

वो बचपन  था संजीदा सा,
अब पचपन है कुछ सीधा सा, 
हर कदम रोकता है अब तो,
तब बाँध नहीं कोई होता था,
कभी याराना कभी लड़े-भिड़े,
हम  एक-दूजे संग हुए बड़े, 
आया जब वक़्त बिछड़ने का.…
तो माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे.…  
बस तुम ही तो थे… हाँ भई तुम ही तो थे.… 

11 अक्तूबर 15             ...अजय॥ 

Tuesday, 18 August 2015

राजा जी तुम राजा हो तो...

राजा जी तुम राजा हो तो...

राजा जी तुम राजा हो तो राजाओं सी बात करो,
"प्राण जाये पर वचन जाये" ऐसे तुम हालात करो।

नींद उड़ा अपनी आँखों की मैंने तुम्हें सुलाया था,

याद करो वह दिन जब तुमने मुझको गले लगाया था। 

जब भी तेरी आहों ने मुझको आवाज लगाया है,

मेरे घर का मौन सिपाही थाली तज कर आया है।

मैं तेरे उन्नत मस्तक का कभी गुरूर हुआ करता था,

तुझ पर सदा फ़ना होने का मुझे सुरूर हुआ करता था।

आज "मुनीमों" ने तेरे मेरी क्या हालत कर डाली है,

कुर्सी जो आगे सजती थी मीलों पीछे कर डाली है।

आज झूलती चमड़ी पर कुछ "प्यादों" ने लाठी मारी है,

आहत हुआ हृदय "पगड़ी" का जो हमको हर दम प्यारी है।

हमें सुला दें ऐसा उनकी लाठी में दम कभी नहीं है,

गिरती हुयी साख पर मेरी, नज़र तुम्हारी अभी नही है।

कहो बुला कर "प्यादों" से कि खामोशी कमजोर नहीं है,

जिस दिन खुले पाँव बेड़ी से उस दिन कोई ठौर नहीं है।

मेरा "मुखिया" चुप बैठा पर मेरा दिल गम-भरा हुआ है,

कैसा "जन्तर-मन्तर" है, जो लाल खून से हरा हुआ है?

15/18 अगस्त 15                                     ~~~ अजय। 

Saturday, 15 August 2015

कलाम मेरी जान...

"कलाम" मेरी जान...

क्या वो हिन्दू नहीं था,
क्या वो मुसलमाँ नहीं था ?
क्या वो बुद्ध का अनुयायी, 
या कि क्रिस्तान नहीं था ?
क्या वो सिखों कि पगड़ी,
और बच्चों की "अज़ान" नहीं था ?
अरे, कभी तो अपने ज़मीर से पूछ कर देखो,
क्या कलाम मेरी जान, "हिंदुस्तान" नहीं था ?

06अगस्त15                          ~~~अजय।

मुझे याद हैं वो दिन....

जब अजनबी हम-तुम... 

मुझे याद हैं वो दिन,  जब अजनबी थे तुम,
मुझे याद हैं वो दिन, जब अजनबी थे हम,
तुमको भी याद होगा, जब अजनबी हम-तुम........ 
शिकवे-गिले पिघल गए, जब हमसे मिल गए तुम...
मुझे याद हैं वो दिन......

सूनी सी एक गली और वो झिझकते कदम,
सहमी हुई वो धड़कनें, आँखों में वो शरम,
ना जाने आगे क्या हो, दिल का हसीं भरम ,
सब दूर हो गए यूँ, जब तुममें घुल गए हम ...
मुझे याद हैं वो दिन.......

गुल प्यार के खिलेंगे, या फिर मिलेंगे ज़ख़म,
न थी मुझको ये खबर, न ही कुछ जानते थे तुम,
मंजिल मिलेगी या, मिलेंगे जिंदगी के गम,
चिलमन हटी तो मिट गए, दुनिया के सब वहम,
मुझे याद हैं वो दिन...... जब अजनबी थे हम....

15 अगस्त 2015                   ~~~ अजय। 

Wednesday, 5 August 2015

यूं न संगदिली से मिलिये...

यूं न संगदिली से मिलिये... 

रोज मिलते रहे हैं ....... ख़यालात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

चाँद को देख कर चाँदनी खिल गयी,
है सितारों को भी रोशनी मिल गयी,
मन भिंगा लाइये आज, बरसात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

है खताओं को भी कुछ, सजा मिल चुकी,
है पतंगों की पांखें, शमा तल चुकी,
कट गयी जिंदगी मेरी गफ़्लात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

आप को देख कर, कुछ उम्मीदें जगीं,
दिल धड़कने लगा, साँसें चलने लगीं,
हम यूं कब तक जियें कतरे-लमहात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

रोज मिलते रहे हैं ....... ख़यालात में,
अब न तंगदिली से मिलिये, मुलाकात में.... 
यूं न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में,
ज़रा रंगदिली से मिलिये, मुलाक़ात में। 

04 अगस्त 2015                     ~~~अजय। 

Monday, 27 July 2015

सम्माननीय कलाम साहब...

कलाम साहब...

सूखी स्याही, कलम रो रही,
कैसे आज कलाम लिखूंगा।

अब्दुल हम से रूठे हो तुम,
फिर भी आज सलाम लिखूंगा।

मालुम मुझको... नहीं पढ़ोगे,
तब भी दिले पयाम लिखूंगा।

तुम बसते हो हर दिल में,
यह बात मैं खुल्ले आम लिखूंगा।

ना रुक्मिणी , नहीं कोई राधा,
लेकिन तुमको श्याम लिखूंगा।

तुम अल्ला को प्यारे हो गए,
फिर भी मैं... "हे राम " लिखूंगा।

27 जुलाई 2015          ~~~ अजय। 

जिक्र जब भी...

जिक्र जब भी... 
(गजल)

जिक्र जब भी, कहीं हुआ तेरा,
नाम अक्सर ही, आ गया मेरा। 

तुम तो शामिल रहे, फ़ेहरिश्ते-शहर-हूरों*१ में,
नाम शोहदों*२ में, आ गया मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

हर एक शख़्स यहाँ, हाकिम-ए-इजलास*३ हुआ,
किसको फ़ुरसत, जो ले बयां मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

खुश रहो तुम, जहां रहो, सदा शादाब*४ रहो,
दे रहा दिल, यही दुआ मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

चल पड़ा कारवाँ, मेरा ख़ुदाई-मंज़िल*५ को,
खत्म बस आज से, वाक़िया*६ मेरा। जिक्र जब भी कहीं... 

जिक्र जब भी, कहीं हुआ तेरा,
नाम अक्सर ही, आ गया मेरा। 

27 जुलाई 2015             ~~~अजय।
* १ शहर की खूबसूरत पारियों की सूची।
   २ बदमाश, लोफ़र।
   ३ अदालत के जज साहब।
   ४ हरा-भरा, प्रफुल्लित।
   ५ ईश्वरीय गंतव्य, स्वर्ग।
   ६ किस्सा। 

Sunday, 19 July 2015

दीप प्रज्ज्वलन...

दीप प्रज्ज्वलन... 


इस देश को हम क्या कुछ देंगे,
इसने ही सब कुछ हमें दिया, 
फिर भी यदि तुम देना चाहो, 
तो रौशन कर दो एक "दिया"।

वह दीप जो हर दिल को दे दे,
कुछ देश-प्रेम रस भरने को,
जिसकी लौ से निकली ऊष्मा,
प्रेरित कर दे मिट- मरने को।


आभा जिसकी फैले ऐसी,
अँधियारे बोलें "त्राहि माम्",
मिट जाये दूरी जन-जन की,
ना रहें "खास", सब बनें आम,

ना ऊँच-नीच का आसन हो,
ना श्वेत-श्याम का भाषण हो,
धरती पर पाँव रहें सबके,
इतना ऊंचा सिंहासन हो।

घर की मिट्टी से दीप बने,
उसमें "पानी" परिपाटी की 
जो तेल जले इस दीपक में,
उसमें खुशबू हो माटी की।

जिस माटी मे मिलना सबको,
उस माटी का सम्मान रहे,
हो स्वाभिमान अंतस्तल में,
जाहिर न कोई अभिमान रहे। 

हर पुत्र सिपाही बन जाये,
इससे   फैले उजियारे में,
ना  रहे भेद-भाव कोई,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में। 


 20 जुलाई 2015        ~~~ अजय।

सियासत के रिश्ते...

सियासत के रिश्ते...

ऐ मेरे दोस्त, इसमें ऐसा क्या अजूबा है ?
वो कल तेरी माशूका थी... वो आज मेरी महबूबा है। 

नया कुछ भी नहीं कि इतना मायूस हो चला है तू,
यहाँ हर शख़्स जितना बाहर, उससे कई गुना डूबा है।

नज़र आता नहीं चेहरा, असल, सियासतदारों का,
जान पाओगे तुम कैसे, कि किसका क्या छुपा मंसूबा है।

रिश्ते कब उग आयें कहाँ, बंजर जमीनों में,
कौन जाने कि वो रकीब है, या कि वो कोई दिलरूबा है।

सियासत खेल जादुई, बहुत अजीब है जानम,
रिश्ते बुलबुले यहाँ, सिर्फ कुर्सी ही एक महबूबा है॥

01 सितंबर 15                             ~~~अजय।