Sunday, 24 February 2013


मुस्कुरा के पीजिये ...

जब आये हैं मयखाने में, दबा के पीजिये,
पैमाने में जब तक है,...मुस्कुरा के पीजिये। 

रहम-ओ-करम की आग को बुझा के पीजिये,
दुनिया से मिले दर्द को, भुला के पीजिये।

गोया, सभी लबरेज हैं बोतल शराब की,
जो चैन चुरा ले, उसे, छुपा के पीजिये।

दिल, दिल के है करीब, फिर ये कैसे फासले,
तसव्वुर में फासलों को, सब मिटा के पीजिये।

तनहाइयों में है ख़ुमार, उनके प्यार का,
प्याले में बर्फ गर्म सी घुला के पीजिये।

होते नज़र के सामने तो बात भी होती,
वो हैं नहीं, तस्वीर ही, लगा के पीजिये।

२४ फरवरी १३                           ......अजय 

Friday, 15 February 2013

राधा-उधो संवाद 

( वैलेंटाइन डे का अर्थशास्त्र )


उधो, कैसा प्रेम-शास्त्र ये ...?
प्रेम का केवल एक रोज है ?
बूझो राधे ......अर्थ-शास्त्र है .... ,
दस गुलाब का एक रोज़ (Rose) है।

तुम करती हो प्रेम कृष्ण को
दिन की कोई सीमा ना है ,
दिन निर्धारित करने वालों ...
के मन की अभिलाषा क्या है .

समझो, कौन है इसके पीछे,
जिसने लाखों आज हैं खींचे
प्रेम नहीं मोहताज फूल का ...
करो आज एहसास भूल का।

कार्ड न हों तो स्नेह नहीं हो
ऐसी कोई बात नहीं ...
प्रेम तो तब भी जीवित था ...
जब कृष्ण तुम्हारे साथ नहीं।

14 फरवरी 13 ...अजय

Tuesday, 12 February 2013

सियासत की बेड़ियाँ

सियासत की बेड़ियाँ ...
(अफज़ल पर सियासत ?) 

सोख कर आंसू लकीरें बन रहीं थीं गाल पर, 

तब कहाँ थे ये सियासतदार इतने साल भर, 
पूछते हैं पुत्र, माता , पत्नियाँ इस चाल पर,
है कोइ उत्तर तो दे दो आज इस सवाल पर ।

खैर, अब जो भी हुआ, उससे मिला सुकून है,
बंद लिफ़ाफ़ा है मगर एक खुला मजमून है...
कि जो करेंगे वो भरेंगे, जल नहीं यह खून है,
बह रहा जो धमनियों में द्रव बना जूनून है । 

मत परीक्षा ले कोई अब और मेरे धीर की, 
टूट जाएँगी अगर ये, बेड़ियाँ रणवीर की 
रुक नहीं पायेगी धारा, शांत गंगा-नीर की 
जल नहीं शोणित बहेगा चोटियों से "पीर" की .

12  फरवरी 13                               ...अजय 

चुनावी टिकट ...


जो टिकट मांगने आये हो, इस बार मोहाले में ...
भई नाम तो गिनवा दो पहले, दो-चार घोटाले में।

बतलाओ कितने दाखिल, एफ़ आइ आर हैं थाने में ... 
ईमान की बातें मत करना तुम यार मोहाले में .

अच्छा बतलाओ, हो माहिर, हथियार चलाने में ...
कितनों के सर  को फोड़ा तुमने, मार बवाले में ?

क्या फूट डला सकते हो तुम, विपरीत घराने में ...
कितने उस घर के ला  सकते हो, अपने पाले में ?

दंगों में शामिल रहे कभी, या क़त्ल कराने में ...
क्या जातिवाद भड़का सकते हो, पंडित, ग्वाले में ?

कितना दे सकते हो बोलो, इस  साल खजाने में ...
कुछ तो पेले होगे जरूर, गत साल हवाले में ?

अच्छा , आवेदन भरो, किसी तारीख पुराने में ...
कुछ  ले दे कर दिलवा देंगे, परधानी वाले में .

11 फरवरी 13                               ...अजय 

Saturday, 9 February 2013

नेतृत्व

नेतृत्व

बिलख रही है आज धरा , 
कहाँ है वह मेरा बेटा ?
किसके ऊपर मैं गर्व करूँ,
किसको मानूं अपना नेता।

पोंछेगा कौन मेरे आंसू ,
जख्मों को कौन दवा देगा ? 
ये सब कुर्सी के लोलुप हैं,
कोई मेरा गला दबा देगा।
बेटे तो उससे लड़ते हैं ,
जो मां  को आँख दिखाता है
ये खुद आपस में गुंथे  हुए,
कोइ राह न मुझे सुझाता है।

रिश्तों की क़द्र नहीं इनको, 
बापू को कोसा करते हैं
भाई भाई में जंग करा ,
ये अपने झोले भरते हैं।

अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को
लड़वा करके बाँट दिया ,
मेरे बेटों ने उनसे भी
नीचे गिर करके घात किया।

घर-घर  में शोले दहक रहे,
झनकारें  हैं तलवारों की , 
भाई-चारे का क़त्ल हुआ ,
आवाजें हैं बँटवारों  की।

सूखी ममता की कोख लिए,
भारत माँ आज बिलखती है ,
उस ईश-पुत्र के आने की 
यह सूनी राह निरखती है।

21 दिसंबर 97         ...अजय 

शोहरत के पीछे...

शोहरत के पीछे...


शोहरतें न होतीं, तो वो गुमाँ  भी न होता ,
सोहबतें न होतीं, तो दिल जवाँ भी न होता,
अब क्या कहें आगे, ऐ अजीज़, मेरे यारों ,
मोहब्बतें न होती तो आशियाँ भी न होता।

इंसान ही इंसान का दुश्मन है हो चला,
इंसान जग रहा है पर ज़मीर सो चला,
शोहरत के नशे में है वो मदहोश हो चला,
शोहरत के बियाबाँ मे इंसान खो चला। 

शोहरत की चाहत में न जाने क्या क्या किया,
कभी जीते जी मरे, तो कभी मर के भी जिया,
सब कुछ था लुट चुका, जब तक होश में लौटे,
करते रहे सब खुद, दोष किस्मत पे मढ़ दिया।

05 मार्च 2014                          ...अजय। 

Monday, 4 February 2013

कांच की "बोतलें"

जल है, जरा सी आग है, थोड़ा सा पवन है 
थोड़ा जमीं का अंश है, थोडा सा गगन है  
इनको जतन से रखना, तू इनके बिन नहीं 
बोतल में क़ैद हैं, मगर ये कोई जिन्न नहीं .

इस कांच की बोतल का  मत कोई गुमान कर 
दो प्रेम के अल्फ़ाज रख, अपनी जुबान पर 
नाजुक बड़ी काया है ये, नाजुक वजूद है 
चार दिन की जिन्दगी को ये बोतल भी गिन रहीं 

टूटेंगी एक रोज ये , टूटेंगे सब भरम 
होगी दफा चमक दमक, रह जायेंगे करम 
कल की किसे खबर है, आज की सहेज ले 
देख ढल रही है शाम, अब बाकी हैं दिन नहीं .

3 फरवरी 13                                   ... अजय 

Saturday, 2 February 2013


उदासी 

न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .
तुझे मिल जायेगी मंजिल 
और तू भी खिल खिल जायेगा .

न हो मायूस तू इस कदर,
और ना तू अपने इरादे बदल,
न रुक जाना राहे-वफ़ा में कहीं,
बस उम्मीदों को थामे तू आगे बढ़ा चल .
कभी तो वो पत्थर पिघल जायेगा ,
बेवफा दिल पलट कर के आ जायेगा ...
न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .....

ये सच है कि उसने नज़र फेर ली है ,
न तुझको निहारा, न तुझसे मिली है,
परिंदों सी ख्वाइश को दिल में बसा ... 
मोम की गुड़िया, सूरज को छूने चली है, 
पंख जल जायेंगे होश आ जायेगा ,
तब तेरे प्यार का मोल याद आयेगा ... 
न हो तू उदास ऐ मेरे दिल ,
कभी तो वो दिन भी आ जायेगा .....

09 दिसम्बर 93/01 फ़रवरी 2013   ...अजय 

इंतज़ार 

थक गयी है नज़र तेरा इंतज़ार करके,
मगर तू न आई , न ख़त ही पठाया .
दिल की सदा से रही तू ना-वाकिफ ,
भले मैंने तुझको हमेशा बताया .

खतों में , जुबाँ से या नग्मे सुनाकर ,
तेरी नज़र से नज़र को मिलाकर ,
करी लाख कोशिश कि समझा सकूं मैं ,
मगर तू न समझी , न समझा मैं पाया .

19 जुलाई 93                 ...अजय .
तन्हाई...

इधर देखता हूँ,
उधर देखता हूँ ...
न जाने कहाँ और 
किधर देखता हूँ .

वो आयेंगे कब तक 
पता तो नहीं है, 
मगर फिर भी 
शाम -ओ-सहर देखता हूँ .

लब तो खामोश हैं 
दिल भी मायूस है,
फिर भी बैठा किनारे ,
लहर देखता हूँ . 

कोइ ख़त है नहीं ,
है न कोई खबर ही  ,
मगर फिर भी सूनी 
डगर देखता हूँ .

10 अप्रैल 93          ...अजय