Sunday, 10 January 2016

रोज देखता हूँ...

रोज देखता हूँ...

हर रोज देखता हूँ...
मैं मुँदी हुई आँखों से,
फ़लक पर तैरते ख़यालों के,
अदृश्य लहराते पांखों से,
बढ़ते हुये एक निवेश को,
सीढ़ियाँ चढ़ते पुत्र 'अनिमेष' को...
बढ़ती हुयी एक निधि को,
समृद्ध होती हमारी 'समृद्धि' को...
मैं रोज देखता हूँ...... 

हर रोज देखता हूँ...
खामोश विचारों की उड़ानों में,
हृदय की गुह्यतम खदानों में,
सोच की पर्वतीय ऊंचाई में,
समंदर की गहरी तन्हाई में,
परछाईं सी लिपटी एक विभा को,
मेरे हमदम, हमसफर 'निभा' को...
मैं रोज देखता हूँ...... 

हर रोज देखता हूँ...
बंद नयनों के प्रकाश में,
अनंत असीम, विस्तृत आकाश में,
अशक्त होते हाथ के आशीषों में, 
झुर्रियों को स्पष्ट दिखाते, शीशों में,
कुदरत की उत्कृष्टतम नायाबी को... 
मेरी माँ, देवी 'गुलाबी'को... 
मैं रोज देखता हूँ.........

हर रोज देखता हूँ...
दिन-ब-दिन धुंधलाती तस्वीर में,
जलती-बुझती यादों की तक्रीर में,
मंदिर के शंखनाद में, गिरिजा की घंटी में,
गुरुद्वारे की सेवा, मस्जिद की तक़्बीर में,
भागती-दौड़ती जिन्दगी को गिरते-सम्हलते,
जुटाने और सजाने की तदबीर में,
थक कर गिरते, फिर उठ कर चलते एक संवेदी को...
मेरे प्रेरणा-स्रोत पिता, स्वर्गीय 'भारती छेदी' को...
मैं रोज देखता हूँ......
02 जनवरी 16                ~~~ अजय॥ 


2 comments:

  1. पूरे परिवार का वर्णन कर दिया। एक पारिवारिक कविता। हा... हा... हा....। बेहतरीन रचना।

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  2. http://aakarshangiri.blogspot.in/

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