Thursday, 23 February 2017

जिनकी ख़ातिर...

जिनकी ख़ातिर ...


जिनकी ख़ातिर कभी दर्द की परवाह नहीं की,
उन्होंने मेरी भावनाओं की कभी वाह नहीं की।

ख़ुद को मैंने बेवक़ूफ़ सा पेश किया हरदम,
अपने को बड़ा कहने की कोई चाह नहीं की।

सबको समतल ही राहें मिलती रहें सदा,
इसलिये टूटी पगडंडियों से कभी डाह नहीं की।

बात- बात पर रुसवाइयों का सामना किया,
घूँट ज़हर के पिये मगर उफ़-आह नहीं की।

चलता रहा हूँ सदा अपने बनाये रास्ते पर,
टूटी-फूटी स्वीकारी, कभी मखमली राह नहीं की।

आज टूट गया सब्र मगर, उस तीखे तीर से,

जिसे चला तो दिया, मगर मुझे आगाह नहीं की।

23 फ़रवरी 2017.                 ~~~अजय।

Saturday, 18 February 2017

जबसे उसने....

जबसे उसने...

दर्द उसका भी तो हमसाया है,
जब से उसने हमें, भुलाया है।

जुबां खुलकर करे, न करे ये बयां
क़िस्सा चश्मे-नम ने, सुनाया है।

बस में उनके भी न था कि जो, ख़ुद निभ जाता,
टूटे वादे ने ये, जताया है।

नैन कब तक मिला के रखते वो,
शबाबे-हुस्न ने जिनको, यूं झुकाया है।

उदासियों में भी नूरे-लबरेज़ रहा करता था,
चेहरा वो आज क्यों, मुरझाया है।

रंज हमको नहीं उनसे, न कोई शिकवा है,
यादों ने जिसे हर साँस में, समाया है।

09 फरवरी 17.                   ~~~अजय।

Monday, 13 February 2017

प्रेम दिवस की स्वच्छंदता

प्रेम दिवस की स्वच्छंदता...

क्यों मैं किसी तारीख़ का इंतज़ार करूँ,
क्यों न मैं हर रोज़ उनको प्यार करूँ,
क्या सिर्फ़ इसलिये, कि किसी के कार्ड बिकते हैं?
या फिर इसलिये, कि बिन ख़ुशबू के गुलाब बिकते हैं?
क्यों मैं किसी के ख़ज़ाने का भंडार भरूँ,
क्यों मैं प्रेम के नाम पर कोई व्यापार करूँ।

प्रेम इतना छोटा नहीं, जो किसी कार्ड में समा जाये,
प्रेम इतना हल्का भी नहीं, जो एक फूल से तौला जाये,
प्रेम तो एक एहसास है , मैं कैसे उसका भार करू,
प्रेम को दिल में बसाया है, तो क्यों मैं उसका प्रचार करूँ।

फ़रवरी चौदह हो या कि पंद्रह, इससे फ़र्क़ क्या,
आप मेरी बात को समझें, तो इसमें तर्क क्या,
क्यों मैं इसे एक दिन से बाँधने का विचार करूँ,
स्वच्छंद हूँ तो क्यों प्रेम की स्वच्छंदता पर अत्याचार करूँ,
क्यों मैं किसी तारीख़ का इंतज़ार करूँ,
क्यों न मैं हर रोज़ उनको प्यार करूँ....????????

10/14 फरवरी 2017.                                   ~~~ अजय।



Sunday, 12 February 2017

नवका साल मुबारक

नवका साल मुबारक
 
सबको सबका हाल मुबारक,
सबको नवका साल मुबारक,
वक़्त वक़्त की बात है प्यारे,
सबको रोटी दाल मुबारक।

ठनठन कोई गोपाल मुबारक,
किसी को मोटा माल मुबारक,
कोई थरथर काँप रहा है,
किसी को पशमिन शॉल मुबारक।

कैश न हो तो ऐश भी न हो,
ऐसा नहीं है हाल मुबारक,
सीख लो अन्तर्जाल मुबारक,
उँगली फेर कमाल मुबारक।

लो प्रदेश का हाल मुबारक,
किसी को मोटी खाल मुबारक,
कहीं अमर,कहीं पाल मुबारक,
किसी को राम गोपाल मुबारक।

हमको अपना हाल मुबारक,
सबको सबका साल मुबारक,
वक़्त वक़्त की बात है प्यारे,
सबको रोटी दाल मुबारक।

(अन्तर्जाल = Internet)
३१ दिसम्बर २०१६           ~~~अजय।मुबारक