Monday, 8 May 2017

तुम मेरे न हुए...

तुम मेरे न हुए...

बातें बनी, शिकवे हुये, मगर कभी पूरे, फेरे न हुए...
कैसे कह दूँ मैं कि  तुम मेरे हो, जब कि तुम मेरे न हुए।

तुम मेघ बन के आये ...तो हवाओं में ख़ुशबू पली,

हवा ज़रा सी तेज़ हुई... तुम कहीं और उड़ चली,
हम तड़पते रहे, ...घायल पंछी बन कर,
और भटकते फिरे, ...कुछ वहशी बन कर,
मन के पंछी को हासिल, बसेरे न हुए।
कैसे कह दूँ मैं कि तुम मेरे हो, जब कि तुम मेरे न हुए।

फिर आँधियों का दौर सा चला,

बिजली से कमज़ोर दिल भी दहले,
उम्मीद को, तेरे भरोसे का दम जो था,
चाँद के इरादे, ...न मचले न बदले,
उम्मीदों की छत पे, रात के घनेरे न हुए....
कैसे कह दूँ मैं कि तुम मेरे हो, जब कि तुम मेरे न हुए।

अब थक गया है चाँद, रात भर के सफ़र से,
तकता रहा जो राह तेरी, खुली नज़र से, 
अब झपकने लगी है पलक, इसी असर से, a 
कब बंद हो जाये न जाने, ....नींद के डर से,
कितनी लंबी है रात, अब तक सवेरे न हुए ...
कैसे कह दूँ मैं कि  तुम मेरे हो, जब कि तुम मेरे न हुए।
08 मई 2017.                    ~~~ अजय।

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