Thursday, 3 December 2015

विरह के पल...

विरह के पल... 

विरहन की है कामना बिलखती सी,
विरह की है वेदना झलकती सी,
तनहाई की चुभन भरी खामोशियाँ,
कोरे पन्नों पर कविताएं छलकती सी।

03 दिसंबर 2015 ~~~अजय।

Tuesday, 10 November 2015

जलो ऐसे कि.....

जलो ऐसे कि...

पियो इस तरह, कि तिश्नगी निकले,

जलो ऐसे कि, रोशनी निकले। 

रोज हँसते रहे हो, मेरी नाकामियों पे,
आज दिल से वो, दिल्लगी निकले। 

यूं हिकारत से, न देखा कीजै,

कभी तो नज़र से वो, पारगीं निकले।

हम भी तोहफे  हैं, इसी कुदरत के,

हमारे वास्ते भी, बंदगी निकले।

हमें न तिल-तिल कर, जलाए कोई,

जाँ निकले तो एक बारगी निकले॥ 

10 नवंबर 15                      ~~~अजय। 

(तिश्नगी=प्यास, हिकारत= हेय दृष्टि/नफ़रत, 
पारगीं=पूरानापन, बंदगी=प्रार्थना/पूजा )

Sunday, 8 November 2015

ससुराल...

ससुराल...
एक दिन बैठे-बैठे  ये कमाल हो गया,
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

मैं गुजरती थी बे-झिझक, बे-रोक गाँव से,
कोई बांध गया घुंघुरू दोनों ही पाँव से,
कहीं बज ना उठें... रोज का सवाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया। 

दो लटकती थीं चोटियाँ, काँधों के बगल से,
मैं होने लगी बे-दखल, अपने ही दखल से,
लट सिमट के जूड़ा बना है, बाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

उस दिन तो मेरे चलते, कदम ही रुक गए,
नैनों के पलक लाज से, स्वतः ही झुक गए,
स्वर्णिम मेरा कपोल , लाल-लाल हो गया...
वो अजनबी सा गाँव था, ससुराल हो गया।

07 नवंबर 15                       ~~~अजय। 

Sunday, 25 October 2015

मशहूर हो गया...

मशहूर हो गया...

न खुल के दिल ही तोड़ा, ना रूबरू हुये ,
ज़ालिम ये इल्म तेरा मशहूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

हैरत है आज भी कि क्यों जुबां नहीं खुली,
बात मन में लिए मन की,  वो दूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

उसने भुला दिया मगर ये कैसे मैं करूँ,
इस दिल के आगे मैं तो, मजबूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

दिन रात सोचते रहे, कि क्या खता हुयी,
उसे चाहने में क्या बड़ा क़ुसूर हो गया ।... ज़ालिम ये ...

तुम झाँकते रहे दरीचों की आड़ से,
और कारवां मेरा नज़र से दूर हो गया।...ज़ालिम ये ...

24 अक्तूबर 2015          ~~~अजय॥

Saturday, 10 October 2015

माँ कहाँ थी... तुम ही तो थे ।

माँ कहाँ थी... तुम ही तो थे...
(Sainwinians77 को समर्पित)

माह जुलाई, उन्नीस-सत्तर, 
अपनी चादर अपना बिस्तर,
बाबूजी जब छोड़ गये थे, 
तुम से नाता जोड़ गये थे,
कौन था साथी, कौन था रहबर ?....
माँ कहाँ थी......तुम ही तो थे....

बटन टाँकना ना था आया ,
वह भी तुमने ही सिखलाया,
गाँव छोड़ कर आए थे हम,
भीतर से गबराए थे हम,
उंगली, मेरी किसने थामी ?....
माँ कहाँ थी......तुम ही तो थे....

देखी थी कब कंठ-लंगोटी...?
तुम संग खानी सीखी रोटी,
चम्मच-कांटे थाम न पाते,
तुम जो हमको नहीं सिखाते,
फ़ीते जूतों के  बँधवाने ?....
माँ कहाँ थी........तुम ही तो थे .... 

रात ठिठुर कर सोया था जब, 
तनहाई में रोया था जब,
बिस्तर गीला कर बैठा था,
मैडम ने जब कान ऐंठा था,
ढाढस देने, साथ निभाने ?....
माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे....

दीवाली की रात वो काली,
सुलगी ज़ेब पटाखे वाली,
याद मुझे, वह मुड़ी कलाई ,
डॉक्टर से प्लास्टर चढ़वाई,
खुली शर्ट के बटन लगाने?....
माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे.... 

वो बचपन  था संजीदा सा,
अब पचपन है कुछ सीधा सा, 
हर कदम रोकता है अब तो,
तब बाँध नहीं कोई होता था,
कभी याराना कभी लड़े-भिड़े,
हम  एक-दूजे संग हुए बड़े, 
आया जब वक़्त बिछड़ने का.…
तो माँ कहाँ थी....... तुम ही तो थे.…  
बस तुम ही तो थे… हाँ भई तुम ही तो थे.… 

11 अक्तूबर 15             ...अजय॥ 

Tuesday, 18 August 2015

राजा जी तुम राजा हो तो...

राजा जी तुम राजा हो तो...

राजा जी तुम राजा हो तो राजाओं सी बात करो,
"प्राण जाये पर वचन जाये" ऐसे तुम हालात करो।

नींद उड़ा अपनी आँखों की मैंने तुम्हें सुलाया था,

याद करो वह दिन जब तुमने मुझको गले लगाया था। 

जब भी तेरी आहों ने मुझको आवाज लगाया है,

मेरे घर का मौन सिपाही थाली तज कर आया है।

मैं तेरे उन्नत मस्तक का कभी गुरूर हुआ करता था,

तुझ पर सदा फ़ना होने का मुझे सुरूर हुआ करता था।

आज "मुनीमों" ने तेरे मेरी क्या हालत कर डाली है,

कुर्सी जो आगे सजती थी मीलों पीछे कर डाली है।

आज झूलती चमड़ी पर कुछ "प्यादों" ने लाठी मारी है,

आहत हुआ हृदय "पगड़ी" का जो हमको हर दम प्यारी है।

हमें सुला दें ऐसा उनकी लाठी में दम कभी नहीं है,

गिरती हुयी साख पर मेरी, नज़र तुम्हारी अभी नही है।

कहो बुला कर "प्यादों" से कि खामोशी कमजोर नहीं है,

जिस दिन खुले पाँव बेड़ी से उस दिन कोई ठौर नहीं है।

मेरा "मुखिया" चुप बैठा पर मेरा दिल गम-भरा हुआ है,

कैसा "जन्तर-मन्तर" है, जो लाल खून से हरा हुआ है?

15/18 अगस्त 15                                     ~~~ अजय। 

Saturday, 15 August 2015

"कलाम" मेरी जान...

"कलाम" मेरी जान...

क्या वो हिन्दू नहीं था,
क्या वो मुसलमाँ नहीं था ?
क्या वो बुद्ध का अनुयायी, 
या कि क्रिस्तान नहीं था ?
क्या वो सिखों कि पगड़ी,
और बच्चों की "अज़ान" नहीं था ?
अरे, कभी तो अपने ज़मीर से पूछ कर देखो,
क्या कलाम मेरी जान, "हिंदुस्तान" नहीं था ?

06अगस्त15                          ~~~अजय।

मुझे याद हैं वो दिन....

जब अजनबी हम-तुम... 

मुझे याद हैं वो दिन,  जब अजनबी थे तुम,
मुझे याद हैं वो दिन, जब अजनबी थे हम,
तुमको भी याद होगा, जब अजनबी हम-तुम........ 
शिकवे-गिले पिघल गए, जब हमसे मिल गए तुम...
मुझे याद हैं वो दिन......

सूनी सी एक गली और वो झिझकते कदम,
सहमी हुई वो धड़कनें, आँखों में वो शरम,
ना जाने आगे क्या हो, दिल का हसीं भरम ,
सब दूर हो गए यूँ, जब तुममें घुल गए हम ...
मुझे याद हैं वो दिन.......

गुल प्यार के खिलेंगे, या फिर मिलेंगे ज़ख़म,
न थी मुझको ये खबर, न ही कुछ जानते थे तुम,
मंजिल मिलेगी या, मिलेंगे जिंदगी के गम,
चिलमन हटी तो मिट गए, दुनिया के सब वहम,
मुझे याद हैं वो दिन...... जब अजनबी थे हम....

15 अगस्त 2015                   ~~~ अजय। 

Wednesday, 5 August 2015

यूं न संगदिली से मिलिये...

यूं न संगदिली से मिलिये... 

रोज मिलते रहे हैं ....... ख़यालात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

चाँद को देख कर चाँदनी खिल गयी,
है सितारों को भी रोशनी मिल गयी,
मन भिंगा लाइये आज, बरसात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

है खताओं को भी कुछ, सजा मिल चुकी,
है पतंगों की पांखें, शमा तल चुकी,
कट गयी जिंदगी मेरी गफ़्लात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

आप को देख कर, कुछ उम्मीदें जगीं,
दिल धड़कने लगा, साँसें चलने लगीं,
हम यूं कब तक जियें कतरे-लमहात में,
अब न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में।

रोज मिलते रहे हैं ....... ख़यालात में,
अब न तंगदिली से मिलिये, मुलाकात में.... 
यूं न संगदिली से मिलिये, मुलाकात में,
ज़रा रंगदिली से मिलिये, मुलाक़ात में। 

04 अगस्त 2015                     ~~~अजय। 

Monday, 27 July 2015

सम्माननीय कलाम साहब...

कलाम साहब...

सूखी स्याही, कलम रो रही,
कैसे आज कलाम लिखूंगा।

अब्दुल हम से रूठे हो तुम,
फिर भी आज सलाम लिखूंगा।

मालुम मुझको... नहीं पढ़ोगे,
तब भी दिले पयाम लिखूंगा।

तुम बसते हो हर दिल में,
यह बात मैं खुल्ले आम लिखूंगा।

ना रुक्मिणी , नहीं कोई राधा,
लेकिन तुमको श्याम लिखूंगा।

तुम अल्ला को प्यारे हो गए,
फिर भी मैं... "हे राम " लिखूंगा।

27 जुलाई 2015          ~~~ अजय। 

जिक्र जब भी...

जिक्र जब भी... 
(गजल)

जिक्र जब भी, कहीं हुआ तेरा,
नाम अक्सर ही, आ गया मेरा। 

तुम तो शामिल रहे, फ़ेहरिश्ते-शहर-हूरों*१ में,
नाम शोहदों*२ में, आ गया मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

हर एक शख़्स यहाँ, हाकिम-ए-इजलास*३ हुआ,
किसको फ़ुरसत, जो ले बयां मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

खुश रहो तुम, जहां रहो, सदा शादाब*४ रहो,
दे रहा दिल, यही दुआ मेरा। जिक्र जब भी कहीं...

चल पड़ा कारवाँ, मेरा ख़ुदाई-मंज़िल*५ को,
खत्म बस आज से, वाक़िया*६ मेरा। जिक्र जब भी कहीं... 

जिक्र जब भी, कहीं हुआ तेरा,
नाम अक्सर ही, आ गया मेरा। 

27 जुलाई 2015             ~~~अजय।
* १ शहर की खूबसूरत पारियों की सूची।
   २ बदमाश, लोफ़र।
   ३ अदालत के जज साहब।
   ४ हरा-भरा, प्रफुल्लित।
   ५ ईश्वरीय गंतव्य, स्वर्ग।
   ६ किस्सा। 

Sunday, 19 July 2015

दीप प्रज्ज्वलन...

दीप प्रज्ज्वलन... 


इस देश को हम क्या कुछ देंगे,
इसने ही सब कुछ हमें दिया, 
फिर भी यदि तुम देना चाहो, 
तो रौशन कर दो एक "दिया"।

वह दीप जो हर दिल को दे दे,
कुछ देश-प्रेम रस भरने को,
जिसकी लौ से निकली ऊष्मा,
प्रेरित कर दे मिट- मरने को।


आभा जिसकी फैले ऐसी,
अँधियारे बोलें "त्राहि माम्",
मिट जाये दूरी जन-जन की,
ना रहें "खास", सब बनें आम,

ना ऊँच-नीच का आसन हो,
ना श्वेत-श्याम का भाषण हो,
धरती पर पाँव रहें सबके,
इतना ऊंचा सिंहासन हो।

घर की मिट्टी से दीप बने,
उसमें "पानी" परिपाटी की 
जो तेल जले इस दीपक में,
उसमें खुशबू हो माटी की।

जिस माटी मे मिलना सबको,
उस माटी का सम्मान रहे,
हो स्वाभिमान अंतस्तल में,
जाहिर न कोई अभिमान रहे। 

हर पुत्र सिपाही बन जाये,
इससे   फैले उजियारे में,
ना  रहे भेद-भाव कोई,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में। 


 20 जुलाई 2015        ~~~ अजय।

सियासत के रिश्ते...

सियासत के रिश्ते...

ऐ मेरे दोस्त, इसमें ऐसा क्या अजूबा है ?
वो कल तेरी माशूका थी... वो आज मेरी महबूबा है। 

नया कुछ भी नहीं कि इतना मायूस हो चला है तू,
यहाँ हर शख़्स जितना बाहर, उससे कई गुना डूबा है।

नज़र आता नहीं चेहरा, असल, सियासतदारों का,
जान पाओगे तुम कैसे, कि किसका क्या छुपा मंसूबा है।

रिश्ते कब उग आयें कहाँ, बंजर जमीनों में,
कौन जाने कि वो रकीब है, या कि वो कोई दिलरूबा है।

सियासत खेल जादुई, बहुत अजीब है जानम,
रिश्ते बुलबुले यहाँ, सिर्फ कुर्सी ही एक महबूबा है॥

01 सितंबर 15                             ~~~अजय। 

मुलाक़ात हो गयी...

मुलाक़ात हो गयी... 

जाने कैसे, ये अनजानी बात हो गयी,
वो मिले भी नहीं, ... मुलाक़ात हो गयी। 

ना वो सरगोश थे, ना मैं मदहोश था,
अपनी तनहाई में, मैं भी खामोश था,
ना कली कोई चटकी, न गुल ही खिले,
लब हिले भी नहीं,... और बात हो गयी, 
... वो मिले भी नहीं, मुलाक़ात हो गयी।

बंद आँखों में बस, कुछ खयालात थे,
छाए यादों की ड्योढ़ी, के लम्हात थे,
नींद कब आई आँखों में, किसको खबर,
सोते-जगते ये उजली सी रात हो गयी,
... वो मिले भी नहीं, मुलाक़ात हो गयी।

कौन कहता है नैनों में, पलते हैं ख़ाब,
मेरी आँखों में बसते हैं, बस एक आप,
दीन दुनिया की हमको, खबर ही कहाँ,
वो हंसें तो मेरा दिन, वरना रात हो गयी,
... वो मिले भी नहीं, मुलाक़ात हो गयी।

जाने कैसे, ये अनजानी बात हो गयी,
वो मिले भी नहीं, ... मुलाक़ात हो गयी॥ 

19 जुलाई 2015              ~~~ अजय। 

Sunday, 5 July 2015

चर्चाएं हैं...

चर्चाएं हैं...

चर्चाएं हैं हर लब पे, मेरे गाँव तुम्हारे, आने के;
बागों में कलियाँ मुसकाईं, गोकुल के , बरसाने के॥ 

कान्हाँ जब तुम चले गए थे, साज़ों ने, संगीत भुलाए;
कागा कल मुंडेर पर बोला, कोकिल के सुर, गाने के॥

पेड़ों की सूखी शाखाएँ, अँगड़ाई ले, झूम उठी हैं;
होड़ लगे शाखों में जल्दी, नयी कोंपले, लाने के॥

आज हवाओं में है शामिल, खुशबू तेरे, तन-मन की;
विरहन मन में गुंजन हैं, रस-भरे प्रेम के, गाने के॥

बरखा के बूँदों में भी, तेरे पद-चाप की, आहट है;
तपते मन ने आस जगाए, अपनी प्यास, बुझाने के॥

अब ना कहना श्याम सांवरे, छोड़ के फिर, हमको जाना है;
सहन न होंगे अब हमसे, ये तीर ननद के, ताने के॥

चर्चाएं हैं हर लब पे, मेरे गाँव तुम्हारे, आने के;
बागों में कलियाँ मुसकाईं, गोकुल के , बरसाने के॥

05 जुलाई 15                                          ...अजय। 

संकर्षण जी की कलम के सौजन्य से ....... (आगे ):-
 उमड़ रहे हैं नीर नयन में, मेघ गगन में गरजे हैं !
उर की तपती धरती भीगी, मौसम नैन मिलाने के !!

भूत भविष्यत् वर्त्तमान में हर पल साथ 'निभा'उँगी !
स्वप्न देखती रहती हूँ मैं स्वयं 'अजय' बन जाने के !!

Tuesday, 23 June 2015

बहुरूपिया...

बहुरूपिया...

बदला हमारे दिल से, बा-कायदा लिया,
दुश्मन  था, ... दोस्त बन के उसने फ़ायदा लिया।

तरक़ीब लाजवाब थी, जो उसने चल दिया, ...

कुछ रोज पहले आके उसने जायजा लिया,
धीरे से मेरी रूह में जगह बना लिया,
और फिर मेरे जज़्बात का यूं फ़ायदा लिया।

जब बहने लगे रौ में उसकी,  हम नदी समान,

सपने दिखा के उसने हमसे वायदा लिया,
जब डुबकियाँ लेने लगा ये, मोहब्बत मे दिल,
तब ... मेरी चाहत का, उसने फ़ायदा  लिया । 

बहुरूपिया वो था, जिसे समझ सके ना हम,

उसने हमारे प्यार को अलाहिदा लिया,
जब नाव डोलने लगी नदिया की मौज में,
उसने झटक के दामन हमसे छुड़ा लिया।

बदला  हमारे दिल से, बा-कायदा लिया,
दुश्मन  था, ... दोस्त बन के उसने फ़ायदा लिया।

12 जून 2015                             ...अजय। 


संवेदनहीन...

संवेदनहीन... 

क्यूँ उठाऊंगा मैं, जिम्मेवारियाँ,
क्यूँ थामूंगा हाथ में पतवार मैं,
आशा भरी निगाहें बेधती रहें,
डोलती इक नाव पर सवार मैं। 

सींचा गया हूँ बेल की मानिंद मैं,
इस लिए हूँ लीन गहरी नींद में,
हादसों के हाथ झकझोरें भी तो,
क्यूँ उठाऊँ अपने कांधे भार मैं।

जाने किस आचार के आगोश हूँ,
होश में होते हुये ..... बे-होश हूँ,
दिख रहीं भविष्य की रुसवाइयाँ भी,
फिर भी हूँ अंजाना, बना लाचार मैं।

मत दिखाओ कोई मुझको रास्ते,
मैं हूँ केवल, सिर्फ अपने वास्ते,
जानता हूँ मैं, विषम से बच निकलना,
हूँ मजा हुआ वो कलाकार मैं। 

दर्द है..... तो तुम उठा लो वेदना,
मुझमें न थी, ..... न है, कोइ संवेदना,
मत रखो मुझसे कोई उम्मीद तुम,
हूँ बवंडर, ना कि शीतल बयार मैं। 

11 जून 2015              ...अजय। 

छलियों से सावधान ...

छलियों से सावधान...

छलने वालों से रहना सतर्क साथिया,
उनको आते हैं लाखों सु-तर्क साथिया। 

पास आएंगे, तुमको लुभाएँगे  वो,
रस मे डूबी कहानी सुनाएँगे वो,
उनकी बातों मे जाना, उलझ ना प्रिये,
वो जला लेते हैं, आँसुओं से दिये,
मिर्च बेचते हैं वे, लगा के बर्क साथिया ...
उनको आते हैं लाखों सु-तर्क साथिया। 

उनकी काया के रंग गोरे-गोरे से हैं,
उनके मुखड़े के भाव, बड़े भोले से हैं,
उनकी बातों से मधु सा टपकता दिखे,
पल मे रच देते हैं, मीठे सपने सखे,
"भू-मध्य" को बनाते हैं, "कर्क" साथिया ...
उनको आते हैं लाखों सु-तर्क साथिया। 

10 जून 2015                           ... अजय। 

Saturday, 6 June 2015

वक़्त के फैसले

वक़्त के फैसले...

वक़्त के भी गज़ब के फैसले हैं,
दर्द के हौसले अब बढ़ चले हैं,
सुकूँ तलाशने को अब किधर जाएँ,
कदम-दर-कदम पर तो ज़लज़ले हैं। 

05जून 2015              ....अजय।

Sunday, 31 May 2015

खरीददार...खबरदार !

खरीददार...खबरदार !... 

सुन ऐ खरीददार ... खबरदार !
मैं बिकता नहीं हूँ ,
टूट जाऊँ भले एक दिन पर ... 
मैं झुकता नहीं हूँ । 

चलते होंगे करोड़ों के, सिक्के तेरे ... 
फिरते होंगे हज़ार, आगे पीछे तेरे ... 
मैं न चल पाऊँगा तेरी राहें,
तेरा सिक्का नहीं हूँ । 
सुन ऐ खरीददार ... खबरदार ! मैं बिकता नहीं हूँ ।

गा सको मेरे सुर में, तो गाओ ... 
चल सको मेरे संग, तो आ जाओ ... 
कारवाँ हूँ वो, जो चल पड़ा हूँ, 
मैं रुकता नहीं हूँ । 
सुन ऐ खरीददार ... खबरदार ! मैं बिकता नहीं हूँ । 

खोल आँखों को, आर-पार देखो... 
हो रहे हैं वो तार-तार, देखो... 
खुली पुस्तक मेरी जिंदगानी, 
कोई परदा नहीं हूँ। 
सुन ऐ खरीददार ... खबरदार ! मैं बिकता नहीं हूँ । 

31 मई 2015                               ...अजय।

Sunday, 10 May 2015

कुर्सी दोहावली

ॐ कुर्सीयाय नम: ...
  
(1)   कुर्सी के सम्मान में, पेश करूँ मैं छंद। 
        माते को शत-शत नमन, करके आँखें बंद॥ 

(2)  कुर्सी कुर्सी जग रटे, देवी यही विशिष्ट।
       जिनकी सेवा में जुटे, आम कनिष्ठ वरिष्ठ॥

(3)  कुर्सी को हरि जानिए, नित्य कीजिये ध्यान।
       देवी को न बिसारिए, सञ्झा और विहान॥

(4)  चार पाँव दुइ हस्त हैं, पीछे पृष्ठ-उठान ।
       सज्जित आसन गुदगुदा, बैठे ताहि महान॥  

(5)  गृह की  शोभा में सजीं, देवी 'सोफा' नाम। 
       भांति-भांति सूरत सजे, भांति-भांति के दाम॥

(6)  जन-जन को आराम दें, हैं दफ़्तर की शान।
       रूप रंग से दे रहीं, धारक को पहचान ॥

(7)  देवी सुमिरन सम करें, निरबल और सशक्त।
       जिनके घर ये जा बसें, तिनके पलटें वक़्त॥

(8)  नत मस्तक जन-जन हुआ, इनके आगे आज।
       चाहें तो  ये बिगाड़ि दें, चाहें कर दें काज॥

(9)  जिन पर क्रोधित हो गईं, तिनके फूटे भाग।
       सागर को गागर करें, जल को कर दें आग ॥

(10) देवी-अर्जन दौड़ में, टूटीं सारी नीति।
        कुर्सी पाने के लिए, भांति-भांति की प्रीति॥

(11) देवी को रखि हृदय में, झट धरि लीजे पाँव।
       जो चाहें पल में करें, जानत सारे दाँव॥ 

(12)  जिनके दिन कछु कठिन हों, करें  मातु सम्मान।
         कर भरि धारक दान दें, पांवें तुरत निदान॥ 
(एक साथ जोर से बोलिए कुर्सी माता की...... जय)

10 मई 2015                                   .......अजय। 

किताबें झाँकती हैं

किताबें झाँकती हैं ...

किताबें झाँकती हैं...., 
किताबें झाँकती हैं..........
कि आओगे,  कभी तो तुम ... हमें पढ़ने के लिए, .....(2)
आस बाँधे,.... वो रास्ता ताकती हैं ...
किताबें झाँकती हैं,
किताबें झाँकती हैं..........

तुम आओ नहीं आओ, ...है तुम्हारी मर्जी, ......(2)
रोज दिल में ये कुछ "नए पन्ने" टाँकती हैं,
किताबें झाँकती हैं,
किताबें झाँकती हैं..........

10 मई 15                     ...अजय। 

Wednesday, 15 April 2015

अक्षत तुम्हारे नाम

अक्षत तुम्हारे नाम ...


लो पढ़ लो, जो भेजे नहीं थे, ख़त तुम्हारे नाम,
है क्षत-विक्षत हृदय का...अक्षत तुम्हारे नाम।

लिखा  इनको कभी हमने, खयालों की कलम से था, 
शब्द लब पर नहीं आए...मेरी आँखों मे था कलाम।

तुम पढ़ भी लेते थे, बस खामोश नज़रों से,
और चल दिया करते थे, बिना जिक्र बिना दाम।

रुसवा भी कर गए हमें , तुम दे के अपना नाम,
जमाने की मुसकानों में, मेरे दर्द का पयाम। 

लो पढ़ लो, जो भेजे नहीं थे, ख़त तुम्हारे नाम,
है क्षत-विक्षत हृदय का...अक्षत तुम्हारे नाम।

*1.दाम = value, भाव  2.पयाम = संदेश, पैगाम 
15 अप्रैल 2015                            ...अजय।