Saturday, 2 February 2013


इंतज़ार 

थक गयी है नज़र तेरा इंतज़ार करके,
मगर तू न आई , न ख़त ही पठाया .
दिल की सदा से रही तू ना-वाकिफ ,
भले मैंने तुझको हमेशा बताया .

खतों में , जुबाँ से या नग्मे सुनाकर ,
तेरी नज़र से नज़र को मिलाकर ,
करी लाख कोशिश कि समझा सकूं मैं ,
मगर तू न समझी , न समझा मैं पाया .

19 जुलाई 93                 ...अजय .

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