Sunday, 26 June 2011

Zindagee ?

जिन्दगी 

उलझी हुई जंजीरों का है जाल ज़िंदगी
सुलझा सका न कोई, वो सवाल  ज़िंदगी

कड़ियाँ सभी इसी की हैं, राजा हों या फकीर
ऐसा नहीं जो बाँच ले, माथे की खुद लकीर 
जीना पड़ेगा आपको हर हाल ज़िंदगी...
उलझी हुई जंजीरों का है जाल ज़िंदगी

हम पर हँसा किये थे वो, मजबूरियां जो थीं
जाहिल समझ लिया हमें, और दूरियां रखीं
अब खुद पे आ पडी है तो, बवाल ज़िंदगी... 
उलझी हुई जंजीरों का है जाल ज़िंदगी

हँसने में नहीं हर्ज जब , सब साथ मिल हंसें
शेरों के साथ घुल-मिल के, जब बकरियां बसें 
पानी मिले एक घाट तो..., निहाल ज़िंदगी...
उलझी हुई जंजीरों का है जाल ज़िंदगी

पानी के बुलबुले हैं, जीवन के चार दिन 
हँस खेल कर गुजार लो, रुसवाइयों के बिन
लड़-कट के मत बनाओ, तुम  मुहाल ज़िंदगी...
उलझी हुई जंजीरों का है जाल ज़िंदगी
सुलझा सका न कोई, वो सवाल  ज़िंदगी

 15/11/2006                                       ...अजय 

Tanee Laathiyan

तनी लाठियाँ

क्यों तनी हैं लाठियाँ
इक दूजे पर बरसने को ?
क्यों खिचीं तलवारें 
मासूमों को कलम करने को ?
क्यों गरजते हैं तमंचे
अमन का क़त्ल करने को ?

पहुँचा दो इन लाठियों को 
शक्तिविहीन वृद्ध हाथों तक 
बन जाएँ जहाँ जाकर ये 
सहारा किसी के चलने को

सजा दो इन तलवारों को
करीने से दीवारों पर 
न बन पायें सबब अब ये
कोई जीवन मिटाने को 

दफ़न कर दो तमंचों को 
कहीं ऐसी गहराई में
न उठ पायें दुबारा ये 
नफ़रत की आग उगलने को
04/07/2004                            ...अजय 

माली सयाना

माली  सयाना...

बादलों के पार शायद ,
है कोई माली सयाना 
जानता है वो हमारे 
गुलशनों में गुल  खिलाना 

फिजा की रानाइयां हों 
या दिशा तूफ़ान की  
जेठ की तपती दुपहरी 
बारिशें वरदान की 
जानता वह कब कहाँ पर 
कैसे कैसे क्या है लाना
बादलों के पार शायद ...

कब किसे खुशियाँ मयस्सर 
गम के साए किसके ऊपर 
किसको बाहों में उठा कर 
किसको यह धरती दिखा कर 
कौन जाने किस घडी में 
पेश कर जाए खज़ाना
बादलों के पार शायद... 

याद रखना यह सदा तुम 
कुछ नहीं बस धूल हैं हम 
उसके हाथों डोर दे कर 
नाचते हैं छम छमा छम 
पुतलियाँ हम उसके घर की
जानता है वह नचाना
बादलों के पार शायद
है कोई माली सयाना
15 मई 2006           ...अजय  

Friday, 24 June 2011

Is Mulaakat Ko...

ग़ज़ल : इस मुलाक़ात को...

इस मुलाक़ात  को मत आख़िरी समझ लेना 
फिर किसी मोड़ पे, जाते हुए मिल जाऊँगा 

गीत जो तुमने दिए हैं,  हमारे होंठों को 
उन्ही धुनों को, गुनगुनाते हुए मै आऊंगा 

जहाँ रहो , सदा हंसते, मुस्कराते रहो 
जब भी चाहोगे , तस्सव्वुर में उभर जाऊँगा 

ये जहाँ लाखों सितम ढाए,या जुलम कर ले 
मैं कहीं पास ही, अपना भी घर बनाऊंगा

मौत चाहे तो, यूँ तुमसे मुझे अलग समझे
मैं  तो मर कर भी,बस तेरा ही अब कहाऊंगा 

वक़्त नाराज है मुझसे , तो मेरी राहें खफ़ा
साथ दो गर मेरा , मैं वक़्त को मनाऊंगा

इस मुलाक़ात  को मत आख़िरी समझ लेना 
फिर किसी मोड़ पे जाते हुए मिल जाऊँगा .

 04/11/2010                                       ...अजय 

Wednesday, 22 June 2011

Dil ke Jarjar ...

ग़ज़ल : दिल के जर्जर दरवाजों को ...

दिल के जर्जर दरवाजों  को...धीरे से ही थपकाना 
टूट के गिरने की आदत है ...फिर से ये , गिर जाये ना.

चुरा के खुशबू ले जाती है... रोज सबा इस गुलशन से 
डरते डरते दिल कहता है ... कोई आंधी आए ना .

किसने छेड़ा राग पुराना...दिल में ये झनकार हुई 
अरसा बीता इन पेड़ों पे... कोई कोयल गाये ना .

तूफानों के मंज़र देखे ...हमने कितने याद नहीं
लाख चलायीं थीं पतवारें ...कश्ती साहिल पाए ना .

कह के गए थे फिर आयेंगे...दरवाज़े खोले रखना
राह तकत अँखियाँ पथरायीं कोई मुड़ कर आए ना .

दिल के जर्जर दरवाजों  को...धीरे से ही थपकाना 
टूट के गिरने की आदत है ...फिर से ये , गिर जाये ना.

17/07/1997                                                       ...अजय 


धुआँ-धुआँ

धुआँ-धुआँ...

जाने इस शहर को... हुआ क्या है 
जिधर भी देखिये... धुआँ सा है.

कितने मंदिर हैं , मस्जिदे हैं, कितने गिरिजा हैं
उनसे निकली हुई दुआ क्या है ?

हर कदम पर यहाँ पे शोले हैं ,
फूँक कर कौन, हवा इनको , दे रहा सा है ?

जो खेलते हैं, लहू से , दिलों के टुकड़ों के  ,
उनके खौफ़नाक, ठिकानों का भी , पता क्या है ?

कितने सुर्ख खूँ से, लिखी हैं, इबारतें इनकी ,
ऐसे मदरसों के , मौलवीयों ने , पढ़ा क्या है ?

कतरा- कतरा, सुलग रहा है यहाँ ,
ऐ हकीमों , तुम्ही कहो, कि अब दवा क्या है ?

कौन रोकेगा आज, बहते माँ के अश्कों को ,
लहू के प्यासे , भाइयों की,  अब रज़ा क्या है ?

जाने इस शहर को... हुआ क्या है 
जिधर भी देखिये... धुआँ सा है.

15/12/1999                     ...अजय 




Monday, 20 June 2011

Sajaa

सज़ा... 

इस चश्मे नम को हमने 
कुछ यों सज़ा दिया 
आंसू तो आ गए मगर 
गिरने नहीं दिया .....
इस चश्मे नम को हमने .....

उम्मीद थी हमको कि 
वो तो मेरे ही होंगे
पर चल दिए चुपचाप
अपना घर बसा लिया
इस चश्मे नम को हमने .....

वो दिल नहीं था 
दर्द का दरिया था मेरे पास
कोई देख ना ले इसलिए
परदा  चढ़ा दिया
इस चश्मे नाम को हमने .....

थे कंपकंपाते ओंठ 
और कुछ कांपती जुबान 
वो पास से गुजरे तो ...
"उफ़" भी दबा लिया 
इस चश्मे नम को हमने .....

मिटता नहीं एहसास 
उन खुशहाल पलों का 
जिन  को बेरुखी से
उसने भुला दिया
इस चश्मे नम को हमने .....

19/10/2009                  ...अजय  

Tuesday, 14 June 2011

राजनीति...

राजनीति...

कोई गांधी जी को पढ़ा करे 
कोई काशी जी पर लड़ा करे 
गौ माता यहाँ विलुप्त हुई
कोई हाथी जी को गढ़ा करे

ना जाने कहाँ विकास हुआ
बच्चा नक्कल कर  पास हुआ 
राशन के दाम गगनचुम्बी
हनुमान पूंछ सम बढ़ा करे

हर शहर का आलम है भाई 
बिन ब्याहे बालम और माई
क्यों संस्कार का क़त्ल हुआ
जहाँ बच्चा बच्चा  पढ़ा करे

यह कैसा  है लेखा जोखा
दारू का सरकारी ठेका
"नुकसानदेह" का लेबल है 
पीने को दुनिया लड़ा करे

मंत्री जी को परवाह नहीं
महंगाई पर्वत लांघ रही 
सब अर्थशास्त्री आसन में
जनता लड़ - भिड़ कर मरा करे

अगले चुनाव कल आयेंगे
वे हाथ जोड़ फिर धायेंगे
"मतदान तुम्हारा परम धरम"
ये बार-बार दोहराएंगे

तुमको फुसलाने की खातिर
ये सर्व-कर्म अपनाएंगे
अच्छे से अच्छे हों चाहे 
हों घोर पतित...कर जायेंगे
 
मत देना अपना "मत" यों ही 
उनको जो है सबके दोही
यदि दान किया तुमने मत तो 
ये दोहन में लग जायेंगे

कोई उद्यान बनायेंगे 
कोई प्रतिमा गढ़वायेंगे 
बिजली से जगमग महल हुए
पर गाँव वहीं रह जायेंगे 

20/12/2009                     ...अजय 

Sunday, 12 June 2011

हमारी महानता...

हमारी महानता...

आप तो जानते ही हैं इस देश का नाम हिंदुस्तान है,
और ये भी तो ....की ये देश बड़ा महान है 

सोचता हूँ मैं भी कुछ आपको सवाल दे  दूं
देश की महानता की ही कुछ मिसाल दे दूं

देखिये तो ...लोग कभी दायें पे बायाँ, 
कभी बाएं पे दायाँ  पैर चढ़ाये बैठे हैं
ऐसा लगता है जैसे भीतर ही भीतर,
किसी ख़ास परेशानी से ऐंठे हैं.

तो जान लीजिये कि इस ऐंठन का सबब क्या है
उठे तो... लोग क्या सोचेंगे?...अतः देरी से पेशाब दबाये बैठे हैं
दिखावे कि कला में हमारा कोई जबाब नहीं है
तभी तो सबूतों के बावजूद हम "कसाब" जिलाए बैठे हैं.

यहाँ लोग गुरु का अपमान नहीं करते
तभी तो संसद के षड्यंत्री को आखों पे उठाये बैठे हैं
देश कि अवाम को कंकड़िया चावल मिले न मिले
उधर कसाब भाई बासमती कि आस लगाये बैठे हैं.

नेताजी कमर में तमंचा खोंसे विचरते हैं
पर दफ्तर कि दीवार पर गांधी जी  सजाये बैठे हैं
कभी शहादत के बाद लोग मूर्तियाँ  लगाते थे
आज जीते जी लोग अपनी प्रतिमा गढ़ाए बैठे हैं.

भोंपू लेकर चिंघाड़ते हैं कि हम साम्प्रदायिक नहीं
पार्टी दफ्तर में सम्प्रदायों की फेहरिश्त बनाए बैठे हैं
कहते नहीं थकते कि साम्प्रदायिक दलों के विरोधी हैं
मंत्री अमुक सम्प्रदाय का न हो तो सरकार गिराए बैठे हैं.

नीतियां गढ़ते है जो  लोग हमारी खातिर
एक पत्नी शहर में ...एक घर में बिठाये बैठे हैं
इसे दोहरे माप-दंड का पैमाना कहें या कुछ और
कि बेटियों के दर्द पे कराहते मगर बहुओं को झुलसाए बैठे हैं

दारू-ठेके का लाइसेंस लाखों में बेचते हैं 
भले ही  "स्वास्थ्य को  हानिकारक" लेबल सटाए बैठे हैं
मुद्दे उठाने को भेजा था जिन्हें चुन करके
वे ही अपने प्रश्नों का  दाम लगाये बैठे हैं 

अनगिनत सवाल हैं तुम्हे नींद से जगाने को 
पर क्या मैं ही बकता रहूँ... जब आप चुप्पी लगायेबैठे हैं
इस देश कि महानता में कोई कसर नहीं होगा
यदि मेरे सवालों का आप पर कोई असर नहीं होगा

इस देश कि इकाई हमसे, तुमसे बनती है
इकाई से दहाई,दहाई से सैकड़ा,बढ़ कर गिनती बनती है
तुम जागोगे तब यह  देश जागेगा
तुम कब जागोगे... हम ये आस लगाये बैठे हैं

08/02/2010                                                    .....अजय

Saturday, 11 June 2011

कवि ...

"कवि"...

नमस्कार साथियों ; घबराना मत ; मैं कोई कवि नहीं
मैं जानता हूँ ; कवि की अच्छी छवि नहीं.

मंच मिलते ही ये शुरू हो जाते हैं और तब 
ये अपने गुरु के ही नहीं ,बृहस्पति के भी गुरु हो जाते हैं.

जैसे पीने वाले हाथों में जाम लेते हैं
कवि महोदय झट से माइक को थाम लेते हैं.

फिर भाई का लक्ष्य श्रोता को घोंट के पीना होता है 
जैसे फौजी गोली का लक्ष्य दुश्मन का सीना होता है.

कवि दनादन अपने छंदों की बौछार करता है 
श्रोता कायल हो जाय वो ऐसे वार करता है.

अब श्रोताओं की भी कुछ सुन ही लीजिये
अपने आस - पास का ही जरा जायजा तो लीजिये. 

कोई आँखें मूँद - मूँद के सुनता है 
तो कोई अपने स्थान पर ही कूद- कूद  के सुनता है.

किसी को देखो तो लगता बहुत मगन है 
और किसी के ठहाकों से गूंजता यह गगन है

अगले को देखो तो लगता, अति भाव - विभोर है 
किन्तु  चोर निगाह बगल में बैठी मोहतरमा की ओर है.

कुछ के तालियों की खूब पटपटाहट है
और कुछ के चेहरों पर मंद-मंद  मुस्कुराहट है.

इसी चटपटाहट , मुस्कुराहट से कवि को शक्ति मिलती है
उसे अगली रचना की अगली पंक्ति मिलती है. 

सत्य है कि कवि आपके प्रेम का प्यासा है
रचना आपका दिल छू ले, यही उसकी आशा है.

उसे गलत न समझें,... कविता आसान  नहीं है
क्योंकि बाज़ार में इसकी, कोई दुकान नहीं है. 

बड़े मंथन के बाद एक-एक "रस", "छंद" बनते हैं
कवि ह्रदय निचोड़ कर "पद", "बंद" बनते हैं.

वनस्पति,खनिज, आसव की  कीमत आसमान छूती है
पर कविता की कीमत तो,... सिर्फ कवि का सम्मान छूती है.

यही वज़ह है कि हर  कवि मंच को  पकड़ता है
आप तक खुद को पहुंचा सके इसलिए माइक को जकड़ता है.

और जैसे कठिन है नौजवान के हाथ से बाइक लेना
ठीक वैसे ही क्रूर  है, मंच पर खड़े कवि से माइक लेना

18/03/2010                                                ...अजय 

Friday, 10 June 2011

बिन पेंदी का...

बिन पेंदी का ...

कभी इधर ढुलक कभी उधर लुढक
कभी चौराहे  कभी सड़क सड़क 
मैं  बहुत खाल का मोटा हूँ 
मैं बिन पेंदी का लोटा हूँ .

चिट्टा कुरता ,चिट्टा जामा 
मैं धवल सजा, शकुनी मामा  
मैं मुख भी दूध से धोता हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

"हारे" से मेरा मेल नहीं
जो जीते वह सर्वे-सर्वा 
उगते की लुगरी धोता हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

मैं हाथ जोड़ने में माहिर 
मैं साथ छोड़ने  में माहिर
घडियाली आंसू रोता हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

कड़-कड़ ठंढी को ताप कहूँ
गदहे  को भी मैं बाप कहूँ 
मैं नाट्य - वस्त्र का गोटा हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

मेरा न कोई ईमान धरम
बस जोड़-तोड़ मेरा है करम 
कल तक जिसको गरियाता था मैं आज उसी की ढोता हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

थूकूं ,  चाटूं , मेरी  मर्जी
 चाहे मैं बन जाऊं  दर्जी 
कटपीस जोड़ सरकार सिलूँ 
फिर चादर तान के सोता हूँ
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ 

है पांच बरस निद्रा  मेरी 
पलटे चुनाव तो लौटा हूँ 
मैं  कुम्भकरण का पोता... हाँ हाँ, कुम्भकरण का पोता हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .

पहचान गए हो तो बोलो 
यदि जान गए हो तो बोलो 
इक बड़े देश की बड़ी शक्ति... कानूनों का मैं पोटा हूँ 
भाई बिन पेंदी का लोटा हूँ .
27/02/2009                                                   ...अजय 

मेरी पतंग...

मेरी पतंग ...


सैकड़ों पतंगें उडती
देखता हूँ फलक पर मैं 
दुआ है... मेरी पतंग को,
कोई नज़र न लगे 

साजिशों की हवा 
बड़ी गर्म है यहाँ 
सहोदर भाइयों की भी
संग संग मेज़ न लगे 

प्रतिस्पर्धा का दौर
अति कठोर है यहाँ 
जहाँ दम्पति की भी साथ-साथ 
सेज न लगे 

अपने माँझे की मजबूती का 
यकीन  तो है मुझे पर
डर है साजिश की 
धार कोई तेज न लगे 

खिल उठेंगे हम जब
मिलेगी मंजिल मेरी पतंग को 
चाहे मेरी ख़ुशी का
 उसे पता लगे न लगे 

08/07/2009                       ...अजय 

Thursday, 9 June 2011

काँच का घर...

काँच का घर...


काँच का घर, काँच का दर, काँच की खिड़की, 
नहीं बयाँ किसी मकान का है, ... है ये घर की लड़की...
काँच का घर, काँच का दर ...

किस तरह सजाऊँ मैं, संवारूँ और सहेजूँ ...इसको,
सिहर उठता हूँ जब भी, कोई बिजली, कड़की
काँच का घर, काँच का दर ...

गया वो वक़्त जो ये, फटकार सुना करते थे, 
आज ये सह नहीं पाते हैं , मामूली, झिड़की
काँच का घर, काँच का दर ...

 मुझे यकीन भी है , मेरी परवरिश पे मगर, 
बे-यकीं समा,... है फिजाओं में, आँधियाँ, भड़की 
काँच का घर, काँच का दर ...

नज़र से बचने का, टीका भी, अब नकारा हुआ,
देखते-देखते छुटकी है, हो चली, बड़की....
नहीं बयाँ किसी मकान का है, ... है ये घर की लड़की...
काँच का घर, काँच का दर ... काँच की खिड़की 


29/11/2010                                        ~~~अजय